कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय में फर्जी नियुक्तियों और पीएचडी घोटाले का बड़ा खुलासा
आरटीआई कार्यकर्ता ने निगरानी विभाग को सौंपे 82 पृष्ठों के साक्ष्य
कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय में फर्जी नियुक्तियों और पीएचडी घोटाले का बड़ा खुलासा
आरटीआई कार्यकर्ता ने निगरानी विभाग को सौंपे 82 पृष्ठों के साक्ष्य

जे टी न्यूज,मधुबनी : 29.05.2026 बिहार की शिक्षा व्यवस्था और विशेष रूप से संस्कृत शिक्षा जगत को झकझोर देने वाला एक गंभीर मामला सामने आया है। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय (KSDSU) के अधीन विभिन्न विभागों, अंगीभूत और संबद्ध संस्कृत महाविद्यालयों में बड़े पैमाने पर कथित फर्जी नियुक्तियों, पीएचडी घोटाले, परिवारवाद और प्रशासनिक अनियमितताओं का खुलासा हुआ है।
आरटीआई कार्यकर्ता पंकज कुमार ने इस संबंध में बिहार निगरानी विभाग को 82 पृष्ठों का एक विस्तृत शपथ-पत्र और ठोस दस्तावेजी साक्ष्य सौंपे हैं।
घोटाले के मुख्य बिंदु:
पंकज कुमार द्वारा दी गई शिकायत में कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं:
नियमों की अनदेखी: विश्वविद्यालय से संबद्ध 40 से अधिक उपशास्त्री और 60-70 शास्त्री महाविद्यालयों के साथ-साथ 31 अंगीभूत महाविद्यालयों में नियुक्ति नियमों को दरकिनार कर अवैध नियुक्तियां की गई हैं।
भाई-भतीजावाद: कई नियुक्तियों में प्रभावशाली अधिकारियों, प्रबंधन से जुड़े लोगों और रसूखदार व्यक्तियों के परिजनों को अनुचित लाभ पहुँचाया गया है।
बैक-डेट में नियुक्तियां: शिक्षा विभाग द्वारा वर्ष 2022 में नियुक्तियों पर रोक लगाने के बावजूद, वर्ष 2023 में साक्षात्कार आयोजित कर बैक-डेट से नियुक्तियां की गई हैं।
पीएचडी मानकों का उल्लंघन: बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) के नियमों के विपरीत, बिना वैध पीएचडी और आवश्यक शैक्षणिक दस्तावेजों वाले अभ्यर्थियों को ‘प्रोविजनल एलिजिबल’ घोषित कर चयन प्रक्रिया में शामिल किया गया।
हितों का टकराव: चयन प्रक्रिया में शामिल सिंडिकेट सदस्य ही शासी निकाय (GB) के प्रतिनिधि बनकर बैठे हैं, जो प्राकृतिक न्याय और प्रशासनिक मर्यादा के विरुद्ध है।
विज्ञापन संख्या 01/2025 पर तत्काल रोक की मांग
पंकज कुमार ने श्री रामप्रकाश संस्कृत महाविद्यालय, वैशाली के विज्ञापन संख्या 01/2025 पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने की मांग की है। उनका आरोप है कि रोस्टर और बैकलॉग प्रक्रिया का पालन किए बिना ही मनमाने ढंग से पद सृजन और नियुक्तियां की जा रही हैं।
अगली रणनीति: उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL)
इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पंकज कुमार ने कहा, “यह लड़ाई केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं, बल्कि देवभाषा संस्कृत की गरिमा और उसकी शिक्षा व्यवस्था की शुचिता को बचाने के लिए है।”
उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि निगरानी विभाग द्वारा अगले 30 दिनों के भीतर इन साक्ष्यों के आधार पर कोई ठोस और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की जाती है, तो वे मामले को लेकर माननीय उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL) दायर करेंगे।
संस्कृत शिक्षा जगत के विशेषज्ञों और छात्रों की नजरें अब निगरानी विभाग और राज्य सरकार द्वारा की जाने वाली अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।



