जब चुनावी लोकतंत्र खुद ही सवालों के घेरे में आ जाए (आलेख : संपृक्ता बोस, अनुवाद : संजय पराते)
जब चुनावी लोकतंत्र खुद ही सवालों के घेरे में आ जाए
(आलेख : संपृक्ता बोस, अनुवाद : संजय पराते)

जे टी न्यूज़
पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजिनगर उपचुनावों के इर्द-गिर्द जो हो रहा है, वह आम राजनीतिक दुश्मनी से कहीं ज़्यादा है। उम्मीदवारों का अचानक अपना नाम वापस लेना, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नाम और चुनाव-चिन्ह पर रोक लगाना, विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार करने के लिए दशकों पुराने पुलिस प्रकरणों को फिर से शुरू करना, और भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के अंदर बढ़ता अंदरूनी संकट, ये सब मिलकर एक गंभीर व्यवस्थागत खतरे की ओर इशारा करते हैं। हमारे गणतंत्र के सामने स्पष्ट रूप से सबसे बड़ा सवाल यह है कि : चुनावी लोकतंत्र का कैसे बचेगा, जब इसे सुरक्षित रखने वाले संस्थान ही पक्षपातपूर्ण नियंत्रण का हथियार बन जाएंगे?
राज्य मशीनरी का हथियार के रूप में उपयोग
हालांकि टीएमसी के शासन का जो रिकॉर्ड है, उसके कारण उसके प्रति कोई राजनैतिक सहानुभूति नहीं हो सकती, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों की पूरी तरह से रक्षा करना ज़रूरी है। मतदान, प्रतिनिधित्व और चुनाव-चिन्ह का अधिकार बुनियादी लोकतांत्रिक गारंटी हैं, न कि सत्ताधारी सरकार की सुविधा के हिसाब से स्वीकृत शर्तों के अधीन दिए गए अधिकार। जब राज्य मशीनरी का इस्तेमाल आज किसी एक राजनैतिक ताकत की चुनाव में हिस्सेदारी को रोकने के लिए किया जाता है, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक विपक्ष को निशाना बनाने के लिए कल एक खतरनाक मिसाल कायम कर सकता है।
हाल की घटनाओं में चुनाव से संबंधित मामलों में छेड़छाड़ साफ़ तौर पर दिख रही है :l चुनाव-चिन्ह की जब्ती : चुनाव आयोग ने गुटीय झगड़े के बीच टीएमसी के ‘जोरा घास फूल’ निशान पर रोक लगा दी है, ममता बनर्जी के गुट को ‘फ़ुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव-चिन्ह दे दिया है और दूसरे गुट को ‘लिफ़ाफ़ा’ चुनाव-चिन्ह दे दिया है।

नंदीग्राम में लक्षित गिरफ्तारी : टीएमसी उम्मीदवार संचिता प्रधान डे के नाम वापस लेने के बाद और ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस के उम्मीदवार मिलन प्रधान का समर्थन करने के बाद, राज्य पुलिस ने 2007 के भूमि अधिग्रहण आंदोलन के वारंट का इस्तेमाल करके प्रधान को तुरंत गिरफ्तार कर लिया।
रेजीनगर में दमन : निर्दलीय उम्मीदवार सैफुल इस्लाम को 2021 के एक मामले में गिरफ्तार किया गया, जबकि हुमायूं कबीर और एजेयूपी के राज्य सचिव आशिक इकबाल को एकदम अलग, पुराने आरोपों को लेकर अचानक पुलिस की ज़बरदस्ती वाली कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।
हालांकि आपराधिक मामलों को राजनैतिक मक़सद से अलग रखना चाहिए, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इन गिरफ्तारियों को सोचे-समझे समय पर करना प्रशासनिक दबाव के ज़रिए राजनैतिक माहौल बदलने की एक साफ़ रणनीति को दिखाता है।
सांस्थानिक संकट
लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए अब सबसे बड़ा खतरा खुद चुनाव आयोग से है। एक संवैधानिक निकाय, जिसकी विश्वसनीयता पूरी तरह से उसकी निष्पक्षता पर टिकी है, वह अभी ऐसे अंदरूनी कलह में फंसी हुई है, जो पहले कभी नहीं हुई। हाल की जांच रिपोर्टों से पता चलता है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया के बारे में दस महीनों में कम से कम 14 बार अपनी आधिकारिक आपत्तियां दर्ज करवाई हैं।
असहमति रखने वाले आयुक्तों ने बिना इजाज़त चुनावी ढांचे में किए गए बदलावों पर गंभीर रूप से लाल झंडी दिखाई है। ऐसे मामलों में शामिल हैं :
* मतदाताओं के नामों को “गैर-कानूनी” रूप से और बिना इजाज़त के जोड़ना और हटाना।

* प्रपत्र 6 पंजीकरण प्रक्रिया में मनमाने बदलाव किए गए।
* मतदाताओं के डेटाबेस पहुंच का नई दिल्ली के स्तर पर केंद्रीकरण, जिससे क्षेत्रीय और ज़िला स्तर की जांच को आसानी से नज़रअंदाज़ किया जा सके।
इस तीन-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में औपचारिक रूप से और बार-बार असहमति होने से संस्था की ईमानदारी का भ्रम टूट जाता है। अपनी प्रतिक्रिया में, सीपीआई(एम) पोलिट ब्यूरो ने सही मांग की है कि ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर बने नहीं रहना चाहिए। पार्टी ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को तुरंत निलंबित करने और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में तुरंत ढांचागत बदलाव करने की मांग की है। एक संस्था, जिसका काम निष्पक्ष अंपायर का काम करना है, वह सत्ताधारी पार्टी का हिस्सा बनकर काम नहीं कर सकती।
नव फासीवादी परियोजना
इन सांस्थानिक गड़बड़ियों को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता ; ये आरएसएस-भाजपा शासन के मॉडल को परिभाषित करने वाली व्यापक नव-फासीवादी विशेषताओं के लक्षण हैं। यह परियोजना शक्तियों के व्यवस्थित संकेंद्रण, डेमोक्रेटिक स्पेस के सिकुड़ने और भयावह तानाशाही पर निर्भर करती है।
केंद्रीकरण की यह मुहिम ‘एक राज्य, एक चुनाव’ और आगामी परिसीमन की कवायद में पूरी तरह से दिखाई देती है। चुनावों को एक ही चक्र में एक साथ करना कोई प्रशासनिक सुविधा नहीं है ; यह प्रचार के संसाधनों पर एकाधिकार जमाने, राजनैतिक विचार-विमर्श पर प्रभुत्व जमाने और सरकारों को बार-बार जवाबदेह ठहराने के अधिकार से मतदाताओं को वंचित करने की एक सोची-समझी चाल है। इसी तरह, परिसीमन के लक्षित जनसांख्यिकी और इलाकों के राजनैतिक रसूख को व्यवस्थित तरीके से कम करने का एक औजार बनने का खतरा है। अगर वोटर डेटाबेस, चुनाव की समय-सारिणी और चुनाव क्षेत्र की सीमाओं पर नियंत्रण पूरी तरह से केंद्रीकृत है, तो यह रास्ता बिना किसी शक के लोकतंत्र विरोधी है।
संप्रभु मतदाता की रक्षा
सांस्थानिक कब्ज़े की इस पृष्ठभूमि में, आगामी 6 अक्टूबर को होने जा रहे उपचुनावों में वामपंथ एक स्पष्ट, सैद्धांतिक राजनैतिक विकल्प के साथ हस्तक्षेप कर रहा है। सीपीआई(एम) ने रेजिनगर से सईद असद अली को, जबकि सीपीआई ने नंदीग्राम से शांति गोपाल गिरी को मैदान में उतारा है, और मतगणना 9 अक्टूबर को होनी है।

मुख्य लड़ाई इस बात से कहीं ज़्यादा है कि कौन-सा गुट चुनाव-चिन्ह हासिल करता है या कौन सी पार्टी स्थानीय मुकाबला जीतती है। यह दरअसल मतदाता के संप्रभुता की लड़ाई है। लोकतंत्र को एक कमजोर प्रशासन की छाया में इलेक्ट्रॉनिक बटन दबाने की यांत्रिक रस्म तक सीमित नहीं किया जा सकता। मतदाता बिना किसी शर्त के मतदाता सूची में सुरक्षित रूप से बने रहने, चुनाव के लिए बराबरी के मैदान में वास्तविक राजनैतिक विकल्प की जांच पड़ताल करने, और चुनावी मशीनरी के पूरी तरह स्वतंत्र रहने पर भरोसा करने का अधिकार चाहते हैं। जब इन बुनियादी गारंटियों को खत्म कर दिया जाता है, तो लड़ाई सिर्फ़ एक चुनाव के लिए नहीं रह जाती, बल्कि खुद गणतंत्र को बचाने की हो जाती है।
(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)





