*बगलबच्चा पूंजीवाद से माई-बाप पूंजीवाद तक* *(आलेख : राजेंद्र शर्मा)*जे टी न्यूज़
*बगलबच्चा पूंजीवाद से माई-बाप पूंजीवाद तक*
*(आलेख : राजेंद्र शर्मा)*जे टी न्यूज़

क्या क्रोनी कैपीटलिज्म यानी बगलबच्चा पूंजीवाद की संज्ञा पुरानी नहीं पड़ गयी है? क्या विशेष रूप से भारत में हालात अब बगलबच्चा पूंजीवाद से आगे नहीं निकल गए हैं? आम तौर पर देश के राजनीतिक मंच पर और खासतौर पर संसद में पिछले कुछ समय से जो कुछ हो रहा है, उससे तो ऐसा ही लगता है। जहां तक संसद का सवाल है, अब यह करीब-करीब साफ ही हो गया है कि पूरा का पूरा शीतकालीन सत्र मोदी सरकार द्वारा अडानी के बचाव की भेंट चढ़ने जा रहा है।

अमेरिका में अडानी की कंपनियों के खिलाफ प्रतिभूति बाजार नियामक तथा एफबीआई की जांच के बाद, भारत में अडानी ग्रुप की सौर बिजली की खरीद का रास्ता साफ करने के लिए, आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों के अधिकारियों को 2 हजार करोड़ रुपए से अधिक की रिश्वत दिए जाने के प्रकरण के अमेरिका से संबंधित मामले में आरोप तय कर मुकद्दमे की कार्रवाई शुरू किए जाने की खबर आने के बाद, संसद में विपक्ष द्वारा जोरदार तरीके से इस मुद्देे का उठाया जाना स्वाभाविक था। लेकिन, जब सरकार के और उसके अधीन नियामक एजेंसियों तथा विभिन्न जांच एजेंसियों के ‘अडानी जांच से परे है’ की मुद्रा अपनाने से आगे बढ़कर, मोदी राज ने सदनाध्यक्षों के जरिए यह सुनिश्चित किया कि अडानी का नाम संसद में ‘उल्लेख से भी परे’ रहना चाहिए, तभी यह तय हो गया था कि संसद के शीतकालीन सत्र में कम से कम सामान्य तरीके से काम-काज नहीं होने जा रहा है। और वहीं हुआ भी। शीतकालीन सत्र का आधे से ज्यादा हिस्सा, अडानी के मुद्दे पर बहस की विपक्ष की मांग और सत्तापक्ष की किसी भी कीमत पर ऐसी कोई चर्चा नहीं होने देने की जिद के बीच रस्साकशी में ही निकल गया।

बहरहाल, इसी दौरान अपने बगलबच्चा पूंजीपति के बचाव के लिए, मोदी राज के अड़े रहने के सिवा और भी काफी कुछ हो रहा था, जो कम दिलचस्प नह�
