सांसो की डोर

सांसो की डोर

 


जे टी न्यूज़
जीवन मांझे में,
अटकी सांसो की डोर।
निभाये कसमें, रस्में,
फड़फड़ाये, पर हो आत्मविभोर।

कित्ती बार कटे,
लेकिन फिर, देखो उड़े।
हजारों टुकडों में बंटे,
लालायित, होकर भी नहीं मुड़े।

अपने दम पे चाहे,
सदैव ही, आगे बढ़ना।
इसीलिए ढूँढे, वो राहें,
जहाँ सफ़लता का हो ठिकाना।

चाहे खुला, गगन,
“तिलंगी” जरा सी ढील।
मगर देख होता हनन,
लेता उसकी सब खुशियां लील।

हुई जब, विक्षिप्त,
छोड़कर तब सभी कुछ।
होना चाहती विलुप्त,
“गिल” समझकर स्वयं को तुच्छ।

नवनीत गिल
एम.ए (इतिहास,राजनीति शास्त्र), बी.एड, एम.एड, एल.एल.बी।
पूर्व प्राचार्य सीबीएसई विद्यालय (उत्तर प्रदेश)।

Related Articles

Back to top button