शटअप अमारिला, ये जो गौरवर्ण की लुनाई है, वह आपने इन्हीं से चुराई है …! *(आलेख : बादल सरोज)*
शटअप अमारिला, ये जो गौरवर्ण की लुनाई है, वह आपने इन्हीं से चुराई है …!
*(आलेख : बादल सरोज)*

जे टी न्यूज
गौरवर्ण की जिस लुनाई पर गुमान कर रही हैं, वह आपकी कमाई नहीं है मोहतरमा, उनमें करोड़ों के नरसंहार से जमा की गई हड्डियों के फास्फोरस से चुराई गयी चमक है!!*
फुटबॉल मुकाबले के राउंड ऑफ़ 16 में पैराग्वे की हार के बाद बिफरी वहां की सीनेटर सेलेस्टे अमारिला ने फ्रांस के कप्तान किलियन एम्बाप्पे को लेकर बेहूदा नस्लीय टिप्पणियाँ की और उनकी पृष्ठभूमि को लेकर अपमानजनक बातें कहीं। इसे लेकर स्वाभाविक ही था कि लोग खिन्न हुए, कुछ नाराज भी हुए, मगर जैसा कि होता है, जल्दी ही इसे एक “विवाद” बताया जाने लगा। एम्बाप्पे के जवाबी जुमले को अमारिला के आपराधिक शब्दों के बराबर रखकर पश्चिमी मीडिया अपना खेल खेलने लगा।
कालों और अश्वेतों के प्रति यह द्वेष नया नहीं है, बहुत पुराना है। लुटेरे जब इतिहास लिखते हैं, तब सिर्फ इतिहास भर नहीं लिखते : वे भाषा भी गढ़ते हैं। मनुष्यता के शिकार में की गयी अपनी हिंसक, बर्बर, जघन्य और घोर आपराधिक ज्यादतियों पर पर्दा डालने के लिए भाषा को भी नुकीले खंजर की तरह वापरते हैं। दुष्टई को प्रचलन में लाकर आम बना देते हैं। जैसे जो चीज खराब है, वह नियमतः काली होगी : काले क़ानून, काली करतूतें, कालिख पोत देना, मुंह काला कर देना। जिस तरह वर्चस्वकारी दर्शन और विचार वही होते हैं, जो शासकवर्ग के होते हैं : इसी तरह भाषा, मुहावरे, लोकोक्तियाँ, कहावतें, यहाँ तक कि व्याकरण भी वे ही कमबख्त तय करते हैं।
हिन्दुस्तानियों – इस पूरे प्रायद्वीप — को यह याद दिलाने की जरुरत नहीं। अपने यहाँ की, किसी भी भाषा की गालियों, कहावतों पर निगाह डाल लीजिये, पता चल जाएगा। उधर वाले कुंठित आत्ममुग्ध अमूमन रंग से खेलते हैं, इधर वालों के पास रंग के अलावा वर्ण है, जाति है, स्त्री है, यहाँ तक कि शारीरिक विकलांगता और रोग भी हैं। सेलेस्टे अमारिला के मुंह से निकला गरल इसी का प्रवाह था।
मगर मादाम यह भूल गयी कि सत्य वह होता है, जो तथ्यों में दर्ज और खुली आँखों से दृष्टव्य होता है। वे यह भी भूल गयीं कि जिस एम्बाप्पे की अफ्रीकी देशों से जुड़ी जड़ें उन्हें चुभ रहीं हैं — कैमरून के पिता और अल्जीरिया की माँ का बेटा होना इन्हें उसके कमतर होने का आधार नजर आ रहा है – वह एम्बाप्पे अकेला नहीं है। बहुत पहले कभी, तब तक की फुटबॉल के सबसे महान खिलाड़ी पेले ने कहा था कि इस शताब्दी के अंत तक कोई अफ्रीकी देश फुटबॉल विश्वकप जीतकर जाएगा। उनका कहा उस तरह तो नही, किंतु कुछ इस तरह सच हुआ कि पूरा फीफा वर्ल्ड कप ही अफ्रीकियों और प्रवासियों का होकर रह गया।
डियागो माराडोना ने 2018 के विश्वकप को “अब तक का सर्वाधिक आप्रवासी खिलाड़ियों वाला विश्व कप” बताया था। विस्तार से बचने के लिए पुराने उदाहरणों को गिनाने की बजाय इसी – फीफा 2026 – मुकाबले को ले लेते हैं और राउंड ऑफ़ 16 के बाद क्वार्टर फाइनल में पहुंची 8 टीमों के प्रोफाइल पर ही नजर डाल लेते हैं।
फ्रांस से ही शुरू करते हैं। क्वार्टर फाइनल में मोरक्को पर किलियन एम्बाप्पे के अलावा जिन उस्मान डेम्बेल ने गोल दागा था, उनके पिता माली से और उनकी माँ मॉरिटानिया और सेनेगल मूल की हैं। फ्रांस की 26 सदस्यीय टीम में से 21 खिलाड़ी अफ्रीकी हैं या मिश्रित हैं या काले हैं। 2018 की फ्रांस की विश्व विजेता टीम के 14 खिलाड़ी और 2022 की टीम के 13 खिलाड़ी अफ्रीकी मूल के थे। अल्जीरिया, कैमरून, अंगोला, कांगो, बेनिन, गिनी बिसाऊ, माली, मोरक्को, सेनेगल और मॉरितानिया आदि देश उनका मूल उद्गम थे। इस बार इनकी संख्या और बढ़ी ही है 26 में से 21 हो गयी है।
जिस मोरक्को को उन्होंने हराया, उसके 26 में से 19 खिलाड़ी विदेशों में जन्मे हैं। इनमें एक को छोड़ दें तो 18 खिलाड़ी आप्रवासी हैं : डायस्पोरा हैं। बाहर से आये हैं। इनके कप्तान और शानदार खिलाड़ी अशरफ हकीमी स्पेन में जन्मे हैं। फ़्रांस में जन्मे 6, नीदरलैंड और बेल्जियम में जन्मे 3-3 हैं।
अभी-अभी सुबह शानदार खेल के बाद भी क्वार्टर फाइनल हारे स्विट्ज़रलैंड का हाल और भी निराला है। इनके 2 खिलाड़ी कैमरून, 1 इंग्लैंड का है। इतना ही नहीं, बाकी 23 खिलाडियों के रोस्टर का 90% उन खिलाडियों से बना है, जो विदेशी मूल के हैं।
आज ही इंग्लैंड से हारी नॉर्वे के 7 खिलाड़ी ऐसे हैं, जो मोरक्को, कोटे डी आइवर, गाम्बिया, वियतनाम और नाईजीरिया से ताल्लुक रखते हैं।
इंगलैंड के 26 में से 15 खिलाड़ी या तो अफ्रीकी मूल के हैं या कैरबियन देशों से आये हैं। अपने गोरेपन पर गुरियाने वाले अंग्रेज अपने ही देश की टीम में अल्पमत में हैं।
स्पेन तक की टीम में 2 अश्वेत अफ्रीकी हैं। इसके लातिन अमरीका के पूर्व उपनिवेशों के मूल वाले खिलाड़ियों की सूची निकालेंगे, तो बोलिविया से मैड्रिड तक सीमोन द बोलिवर की संतानों की खटियायें बिछ जायेंगी।
बेल्जियम की टीम में सेनेगल के एमाडोऊ ओनामा सहित 9 खिलाड़ी अफ्रीकी मूल के हैं।

सिर्फ अर्जेंटीना ऐसी टीम है, जिसमें इटली में जन्मे सिमेओन और अर्जेंटीनी माँ-बाप से मैड्रिड में जन्मे निकोलस पाज़ को छोड़कर बाकी सभी अर्जेंटीनी हैं। अर्जेंटीना की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में अश्वेत खिलाड़ियों की अनुपस्थिति कोई संयोग नहीं है, बल्कि यह काफी हद तक इस देश के नृशंस इतिहास से जुड़ा हुआ है। 19वीं और 20वीं सदी के अंत में, अर्जेंटीना के तानाशाहों ने बड़े पैमाने पर यूरोपीय प्रवासियों को न्यौता और गैर-यूरोपीय, यहाँ तक कि लैटिन अमरीका के ही नागरिकों को खदेड़ा : नरसंहार भी किये गए। नतीजे में देश की अश्वेत आबादी का प्रतिशत काफी कम हो गया, जिसका प्रभाव आज की खेल टीमों में भी दिखाई देता है।
बहरहाल ओलंपिक्स के सारे खेलों से लेकर सारे फुटबॉल मुकाबलों में इन देशों की टीमें देख लीजिए। फीफा की 8 टीमों की विवरणिका ऊपर दी है, बाकी के भी यही हाल हैं। यूरोप हो या अमरीका का संयुक्त राज्य अमरीका – गोरे रंग पे गुमान करने वाला कोई भी देश बिना कालों के एक मैच नहीं जीत सकता।
इसके बाद भी इन आप्रवासी खिलाड़ियों का महेरी में साझे खीर में न्यारे का दर्द है । पिछले विश्वकप के बाद लुकाकु अपने ब्लॉग में लिख चुके हैं कि “जब मैं अच्छा खेलता हूँ, तो मुझे बेल्जियन स्ट्राइकर कहा जाता है, जब नही खेल पाता, तो मेरा परिचय कांगो मूल के बेल्जियम खिलाड़ी का रह जाता है।“ इतने ही पाखंडी हैं ये नस्लवादी!!
यह सच आज जोर से दोहराना जरूरी है, क्योंकि इन्हीं देशों के कुछ नेता अपने देश केआप्रवासियों के खिलाफ जहरीली मुहिम छेड़े हुए हैं। हिन्दुस्तान की तरह ये देश भी कॉरपोरेट की गोद मे बैठी नव-नाजीवादी, फासिस्टी, रंगभेदवादी, नस्लवादी संकीर्ण राजनीति और ओछे ठगों की चपेट में हैं।
अमारिला मैम, विक्टिम कार्ड खेलने के लिए महिला होने की आड़ मत लीजिये। आपकी टिप्पणी के जवाब में एम्बाप्पे ने “घृणित महिला, जो जिस पद पर है, उस पद के योग्य नहीं है” कहा। आप की जगह कोई पुरुष होता तो वह घृणित महिला की जगह घृणित आदमी बोलता । इसमें जेंडर नहीं क्लास है।
सदियों तक अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमरीका के देशों, उनकी संपदा की चोरी और उनके नागरिकों की गुलामी के दम पर खड़ी हुयी हैं यूरोप और ट्रम्प वाले अमरीका की अट्टालिकाएं। आज भी उनकी चमचमाहट में न जाने कितनी पीढ़ियों का खून शामिल है। अमीर देश और उनके अमीर क्लब्स अफ्रीका से सिर्फ सोना-हीरा-खनिज और सम्पदा चुराकर ही नहीं ले जाते। इन अफ्रीकियों की देह के बल के दम पर खिताब भी जीतते हैं। यही देश आज भी इन्ही पूर्व-गुलामों और उनके आज के वंशजों की मेहनत और ताकत के दम पर मजे उड़ा रहे हैं।
हमारे यहाँ एक निराले कवि हुए हैं, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, वे आप और आप जैसों को संबोधित करते हुए कह गए हैं कि “अबे सुन बे गुलाब / भूल मत गर पाई खुशबू रंगो आब / रक्त चूसा खाद का तूने अशिष्ट / डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट”।
फीफा के चमचमाते स्टेडियम्स, होटल, सड़कों, वाशरूम्स, खिलाड़ियों और दर्शकों की देखरेख जैसे अनदिखे कामों के पीछे भी आप्रवासी मजदूरों का श्रम है। इनमें विराट बहुमत उनका है, जो यूं ही यहां-वहां काम करते भटक रहे हैं। फीफा कुछ हजार करोड़ कमाएगा, टेलीकास्ट करने वाली कंपनियां और मीडिया भी करोड़ों अपनी अन्टी में डालेगी। मगर इस मुनाफे को उजाला देने वालों में आप्रवासी मजदूरों का 80-85% हैं, तो सिर्फ इसलिए कि उन्हें न न्यूनतम वेतन देना पड़ता है, न किसी जोखिम से बचाव की गारंटी।
यहां खेल से द्वेष नहीं है — फुटबॉल से तो किसी भी तरह का मलाल होने का प्रश्न ही नहीं उठता। मगर जब उसके बहाने अफ्रीकियों, एशियाईयों, लातिनी अमरीकियों का मजाक उड़ाया जाता है, उन्हें तंज़ मारा जाता है, तो बदरंग को बदरंग कहना जरूरी हो जाता है। रोशनी के स्वयंभू ठेकेदारों की रोशनी के उन स्रोतों को देखना जरूरी हो जाता है, जिन्हे अँधेरे में पहुंचा कर तिलिस्मी चौंध हासिल की गयी है।
भोपाल के शायर फज़ल ताबिश कह गए हैं कि जो दिख रहा है उससे चमत्कृत होने की बजाय ; “रेशा रेशा उधेड़ कर देखो / रोशनी किस जगह से काली है।”
मैडमजी, यही वे देश हैं, जो शरणार्थियों, आप्रवासियों की ताकत पर टिके हैं, जिनकी पोर-पोर, ईंट-ईंट इनके पसीने से बनी है ; मगर पाखंडी इस कदर हैं कि उन्हीं देशों के नागरिकों के आने पर कोहराम मचाते हैं। पिछले दशकों से इन शरणार्थियों और रोजगार की तलाश में आये आप्रवासियों के साथ वैसा ही बर्ताब करते हैं, जैसा इधर दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के साथ किया जाता है। हाल के दिनों में तो ट्रम्प ने अमरीका में और उसके जैसों ने यूरोपीय देशों में प्रवासियों के खिलाफ उन्मादी राजनीति का तूमार खडा किया हुआ है। नस्लवादी फासिस्ट राजनीति में बढ़त बना रहे हैं, कई देशों में तो सत्ता में भी पहुँच गए हैं।
मगर ऐसा हमेशा नहीं रहेगा। एक दिन आएगा जब अफ्रीकी, एशियाई और लातिन अमरीकी देशों के नागरिक मिलकर कहेंगे कि मैदान हमारा, फुटबॉल हमारी, गोल हमारे, तो फिर तू कौन-सा खामखां है भाई!! और जब वे ऐसा कहेंगे, तब यूरोप और यूएसए के मेहनतकश और गरीब भी उनके साथ होंगे और मिलकर “एक खेत नहीं, एक देश नहीं, वे सारी दुनिया मानेंगे।” हम इन्तजार करेंगे!!
क्योंकि दुनिया गोल है, फुटबॉल की तरह गोल और सुंदर। बाकी सारे विभाजन आभासीय हैं, फुटबॉल पर बनी धारियों की तरह!!
और हाँ, मैच खत्म होने के बाद, पैराग्वे के गोलकीपर ऑरलैंडो गिल ने एमबाप्पे से हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन फ्रांसीसी कप्तान ने उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया और उनके चेहरे पर चिल्लाए भी। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह इस शानदार खिलाडी की निहायत आपत्तिजनक बदतमीजी थी।
खेल भावना का सलीका और शऊर सीखने के लिए जनाब एम्बाप्पे को लिओनिल मैसी के पास बैठना चाहिए।
(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)*


