उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद का 146 वां जयंती मनाया गया, किया कोटि-कोटि नमन – याद

मुंशी प्रेमचंद सच्चे अर्थों में उपन्यास सम्राट, स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी चिंतक, प्रखर साहित्यकार, युगद्रष्टा, आदर्शवादी यथार्थवादी प्रगतिशील लेखक, शिल्पकार थे - किरण देव यादव

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद का 146 वां जयंती मनाया गया, किया कोटि-कोटि नमन – याद

मुंशी प्रेमचंद सच्चे अर्थों में उपन्यास सम्राट, स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी चिंतक, प्रखर साहित्यकार, युगद्रष्टा, आदर्शवादी यथार्थवादी प्रगतिशील लेखक, शिल्पकार थे – किरण देव यादव

जे टी न्यूज, अलौली, खगड़िया: देश बचाओ अभियान, ऑल इंडिया मिशन आर्टिस्ट एसोसिएशन एवं सामाजिक संगठन फरकिया मिशन के तत्वाधान में श्री युवक प्रखंड पुस्तकालय के सभागार में मुंशी प्रेमचंद का 146 वां जयंती मनाया गया।
इस अवसर पर उनके तैल चित्र पर माल्यार्पण पुष्पांजलि समर्पित कर कोटि-कोटि नमन एवं याद किया गया तथा आज के साहित्यकारों पत्रकारों से उनके जीवनी व्यक्तित्व कृतित्व से सीख लेने का संकल्प दोहराया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता ऐमा – मिशन के अध्यक्ष किरण देव यादव ने किया। उन्होंने संबोधित करते हुए कहा कि मुंशी प्रेमचंद सच्चे अर्थों में स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी चिंतक, उपन्यासकार, कहानीकार, प्रगतिशील लेखक, पत्रकार साहित्यकार एवं उपन्यास सम्राट तथा साहित्य के अमर शिल्पकार, युगद्रष्टा थे।
श्री यादव ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही गाँव में हुआ था तथा 8 अक्टूबर 1936 में निधन हुआ था। उनका नाम धनपत राय श्रीवास्तव उर्फ प्रेमचंद था। माता आनंदी देवी और पिता मुंशी अजायबराय (डाकमुंशी) थे।
उनका पहला विवाह कम उम्र में हुआ जो असफल रहा; 1906 में बाल विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह हुआ। वे पहले शिक्षक व बाद में स्कूल इंस्पेक्टर बने। 1921 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन पर नौकरी छोड़ दी।
उनका प्रमुख उपन्यास गोदान, गवन, निर्मला, सेवा सदन, कर्मभूमि, रंगभूमि, प्रेम आश्रम तथा उनका प्रमुख कहानी ‘मानसरोवर’ में लगभग 300 कहानियाँ जैसे पूस की रात, कफन, ईदगाह, नमक का दरोगा, पंच परमेश्वर, आदि है।
उन्होंने हंस’, ‘मर्यादा’, ‘माधुरी’ और ‘जागरण’ पत्रिकाओं का संपादन किया।
उनके लेखन में उस दौर के समाज सुधार आन्दोलनों, स्वाधीनता संग्राम तथा प्रगतिवादी आन्दोलनों के सामाजिक प्रभावों का स्पष्ट चित्रण है। उनमें दहेज, अनमेल विवाह, पराधीनता, लगान, छूआछूत, जाति भेद, विधवा विवाह, आधुनिकता, स्त्री-पुरुष समानता, आदि उस दौर की सभी प्रमुख समस्याओं का चित्रण मिलता है। आदर्श उन्मुख यथार्थवाद उनके साहित्य की मुख्य विशेषता है। उक्त कालखण्ड को प्रेमचन्द युग’ कहा जाता है।
कार्यक्रम में दानवीर यादव सरवन कुमार शशिकांत पासवान अनुज कुमार बृजेंद्र महेश्वरी दिनेश उमेश विष्णु देव आदि ने भाग लिया।

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