*वर्तमान*
*वर्तमान*

किसी ने क्या खूब कहा है-
“बदल गया परिवेश देश का,
बदल गए आचार-विचार,
खान-पान भी बदल गया,
बदले हैं नैतिक आधार।”
आज यदि हम विश्व पटल के वर्तमान परिदृश्य पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि विश्व वसुंधरा पर छाई आसुरी प्रवृत्तियों ने धरती की प्राकृतिक सौंदर्य को अपने विकराल जाल में जकड़ने की पूर्ण तैयारी कर ली है। आज विश्व में धन-वैभव के मूल्य बढ़ गए हैं और नैतिकता का मूल्य शून्य हो गया है। गरीब की गरिमा, सादगी का सौंदर्य, संघर्ष की खुशी,समता का स्वाद,आस्था और आनन्द की अनुभूति, परोपकार की भावना, निःस्वार्थ प्रेम सभी जनसाधारण के आचरण से पतझड़ के पत्तों की भांति झड़ गए हैं। उद्देश्य रहित चिंतन, स्वार्थपूर्ण व्यवहार, आदर्श रहित चरित्र नारकीय वातावरण उत्पन्न कर रहा है। सत्य अंधकार में विलीन हो गया है। भ्रष्टाचार, कदाचार, अनियंत्रित यौनाचार, मायाचार आदि पापाचारों के आचार का स्वाद लोगों को अत्यधिक भाने लगा है। हिंसा,झूठ, डाके,चोरी,राहजनी,आगजनी, कालाबाजारी,तस्करी,नशावृत्ति आदि अनेक सामाजिक कुरुतियाँ बिना किसी अंकुश के आगे बढ़ती जा रही है।आधुनिक शासक रक्षक बनने के बजाय भक्षक बनते जा रहे हैं। भाई-भतीजावाद ने न्याय व्यवस्था की धज्जियाँ बिखेर दी है। अपरिग्रह का आदर्श पुस्तकों में बंद हो गया है,ब्रह्मचर्य की भावना आधुनिक विलासता के आवरण में लुप्त होती जा रही है। आवागमन की साधनों की बहुलता ने विश्व की दूरी को अवश्य कम कर दिया है लेकिन मानव-मानव के मध्य दिलों की दूरी को बढ़ा दिया है। शस्त्र निर्माण की विध्वंसक प्रवृत्ति सम्पूर्ण मानव जाति की अंतिम यात्रा की तैयारी कर ली है। प्रदूषण फैल रहा है, पर्यावरण दूषित हो रहा है, प्राकृतिक सुंदरता भस्म हो रही है। आज की नारियाँ नारी स्वातंत्र्य के नाम पर उच्छ्रंखल होती जा रही है तथा आज की युवापीढ़ी संस्कारों के अभाव में गुमराह होते जा रहे हैं। भौतिकी,बौद्धिकी, और औद्योगिकी प्रगति ने भले ही सुविधा-साधनों के पर्वत खड़े कर दिए हैं परंतु आज का मानव अंदर से खोखला, भावविहीन और बाहर से ढकोसला मात्र रह गया है। अणु आयुधों की सैन्य सज्जा ने अवश्य ही इन्द्र के वज्रों को पीछे छोड़ दिया है परन्तु आज का मानव इतना आतंकित, आशंकित व असुरक्षित है जितना कि आदिम युग में रहा होगा।
परन्तु अब प्रश्न यह उठता है कि वर्तमान को इतना भयावह बनाने में जिम्मेवार कौन हैं? अपने अंतर्मन में झाँका तो पाया कि-
“इस वर्तमान को पाने के लिए,
कितने जप-तप किये हमने अतीत में,
आज क्यों रूह काँप रहा है,
इस वर्तमान के लक्षण देखकर।”
भौतिकवादी सुखों की प्राप्ति के लिए हमने नैतिक मूल्यों को ताक पर रख दिया। अब समय आ गया है कि हम अपने अंदर झाँके और अपने मन-मस्तिष्क पर फैले अवसरवादिता के चादरों को समेटे और अपने बच्चों को मानव बनने की सीख दें। ताकि हमारा भविष्य और उनका जो वर्तमान होगा वो सतयुगी काल का पुनर्निर्माण हो सके।
कुमकुम कुमारी ‘काव्याकृति’
मुंगेर, बिहार

