शून्य-सी धरती हमारी,

शून्य-सी धरती हमारी,

जे टी न्यूज़,

शून्य नभ-विस्तार है।

शून्य से शुरुआत सबकी,

शून्य अनंत अपार है।

शून्य में सब कुछ समाया,

जल, थल, नभ, संसार है।

शून्य अकेला तन में बसता,

विस्तृत लिए आकार है।

शून्य का है खेल निराला,

भाषा, गणित, विज्ञान है।

तर्क और चिंतन मन का,

शून्य स्वयं ब्रह्मांड है।

शून्य स्वयं में शून्य होकर,

शून्य ही स्वभाव है।

ना समय का मान रखता,

पर भावों का भराव है।

वह अकेला खेल रचाता,

दाएँ-बाएँ हाथ का।

कब बड़े को छोटा कर दे,

अंक अपने साथ का।

साधते जब लक्ष्य अपना,

मन बन जाता शून्य है।

फिर पहुँचते अंतर्मन में,

शून्य से ही पूर्ण है।

शून्य से ही जन्म सृष्टि का,

शून्य ही सबका मूल है।

शून्य ही आधार जग का,

अंततः सब शून्य है।

 

दिव्या पाण्डेय

प्रयागराज

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