एलएनएमयू में आरक्षित वर्ग पर ‘तबादला प्रहार’! 30 में एक भी सामान्य वर्ग नहीं, कुलपति की नीयत पर उठे बड़े सवाल
एलएनएमयू में आरक्षित वर्ग पर ‘तबादला प्रहार’! 30 में एक भी सामान्य वर्ग नहीं, कुलपति की नीयत पर उठे बड़े सवाल
जे टी न्यूज, दरभंगा: दरभंगा। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय द्वारा नवस्थापित 30 प्रखंड डिग्री महाविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों के स्थानांतरण को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन और कुलपति की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे “आरक्षित वर्ग के प्रति पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण रवैया” बताया जा रहा है।
विश्वविद्यालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार 30 सहायक प्राध्यापकों का तबादला किया गया है, जिनमें 27 बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग और 3 बिहार लोक सेवा आयोग से नियुक्त शिक्षक शामिल हैं। लेकिन सबसे बड़ा विवाद इस सूची की सामाजिक संरचना को लेकर खड़ा हुआ है।
आरोप है कि स्थानांतरित किए गए 30 शिक्षकों में 24 अति पिछड़ा वर्ग, 4 अनुसूचित जाति और 2 पिछड़ा वर्ग से हैं, जबकि सामान्य वर्ग का एक भी शिक्षक सूची में शामिल नहीं है। इसे लेकर शिक्षकों और सामाजिक संगठनों के बीच भारी नाराजगी देखी जा रही है।

यह स्थानांतरण कुलपति की “दोहरी मानसिकता” और आरक्षित वर्ग के प्रति “वैमनस्यपूर्ण सोच” को उजागर करती है। सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर सामान्य वर्ग के किसी भी शिक्षक को क्यों नहीं चुना गया? क्या सिर्फ आरक्षित वर्ग के नव नियुक्त शिक्षकों को ही ग्रामीण कॉलेजों में भेजना विश्वविद्यालय प्रशासन की नीति बन गई है?
विवाद का दूसरा बड़ा पहलू यह है कि जिन शिक्षकों को भेजा गया है, वे अधिकांशतः नव नियुक्त हैं। न तो उन्हें कॉलेज प्रशासन चलाने का अनुभव है और न ही उनकी सेवा अभी स्थायी रूप से संपुष्ट हुई है। ऐसे में आरोप लगाया जा रहा है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इन युवा शिक्षकों को “प्रयोगशाला” बनाकर उनके भविष्य को संकट में डाल रहा है।
सूत्रों के अनुसार बिहार सरकार और राजभवन की ओर से अनुभवी शिक्षकों को ग्रामीण कॉलेजों में प्रतिनियुक्त करने का निर्देश था, ताकि नवस्थापित महाविद्यालयों को स्थिर शैक्षणिक आधार मिल सके। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन निर्देशों को दरकिनार कर अपेक्षाकृत नए और अस्थायी स्थिति वाले शिक्षकों को स्थानांतरित कर दिया।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि अगर यह निर्णय वापस नहीं लिया गया, तो इसे आरक्षण व्यवस्था की भावना के खिलाफ माना जाएगा। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि इससे बिहार सरकार के “सात निश्चय भाग-3” के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा विस्तार की योजना भी प्रभावित हो सकती है।

अब मांग उठ रही है कि महामहिम कुलाधिपति और उच्च शिक्षा विभाग इस मामले में हस्तक्षेप करें और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी वर्ग विशेष के साथ भेदभाव न हो। विश्वविद्यालय की यह सूची अब केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और उच्च शिक्षा व्यवस्था के बीच टकराव का बड़ा मुद्दा बनती जा रही है।
