विश्वविद्यालयों में शिक्षा या वैचारिक एजेंडा? नुक्कड़ नाटक को लेकर उठे तीखे सवाल
विश्वविद्यालयों में शिक्षा या वैचारिक एजेंडा? नुक्कड़ नाटक को लेकर उठे तीखे सवाल

जे टी न्यूज, दरभंगा: ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में आयोजित नुक्कड़ नाटक “सोच कर देखिए…!” अब विवादों के घेरे में आ गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इसे वैश्विक संकट और आर्थिक चुनौतियों के प्रति जागरूकता का प्रयास बताया गया, लेकिन कई शिक्षाविदों और छात्र संगठनों ने इसे “संघ विचारधारा और सरकारी एजेंडा” को विश्वविद्यालय परिसर में लागू करने की कोशिश करार दिया है।
नाटक में ईरान-अमेरिका युद्ध, रूस-यूक्रेन संघर्ष और उससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों को आधार बनाकर प्रधानमंत्री की अपीलों—वर्क फ्रॉम होम, तेल की खपत कम करने, विदेश यात्रा रोकने, पेट्रोल-डीजल बचाने, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और सोने की खरीददारी रोकने—को मंचित किया गया। आलोचकों का कहना है कि यह किसी स्वतंत्र शैक्षणिक विमर्श की बजाय सीधे-सीधे सरकारी प्रचार जैसा प्रतीत होता है।
विरोध करने वालों का तर्क है कि बिहार के विश्वविद्यालय पहले ही बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं—न पर्याप्त शिक्षक, न प्रयोगशालाएं, न इंफ्रास्ट्रक्चर—लेकिन इन मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय छात्रों को वैचारिक और राजनीतिक संदेश देने का माध्यम बनाया जा रहा है।
छात्र संगठनों ने सवाल उठाया कि अमेरिका-ईरान या रूस-यूक्रेन युद्ध से बिहार के विश्वविद्यालयों का प्रत्यक्ष सरोकार क्या है? उनका आरोप है कि विश्वविद्यालयों को शोध, शिक्षा और रोजगार के सवालों से हटाकर “राष्ट्रवाद और प्रचार” की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है।

आलोचकों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर भी हमला बोलते हुए कहा कि 3 वर्षीय स्नातक कोर्स को 4 वर्षीय बनाने और सेमेस्टर प्रणाली लागू करने से छात्रों पर आर्थिक बोझ बढ़ा है। जो कोर्स पहले 4-5 हजार रुपये में पूरा हो जाता था, अब उस पर 20-30 हजार रुपये तक खर्च आने लगा है। ऐसे में गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा और कठिन होती जा रही है।
वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन पढ़ाई की अवधारणा पर भी सवाल उठाते हुए कहा गया कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। आलोचकों का आरोप है कि “कमजोर शिक्षा व्यवस्था” अंततः ऐसी पीढ़ी तैयार करेगी जो सवाल पूछने के बजाय केवल राजनीतिक प्रचार को स्वीकार करे।

