तेजी से बढ़ रही विधवा सहित एकल महिलाओं की आबादी
सरकारी नीतियों में भलाई के लिए नहीं हो रही कोई कारगर पहल - हेमलता म्हस्के
तेजी से बढ़ रही विधवा सहित एकल महिलाओं की आबादी
सरकारी नीतियों में भलाई के लिए नहीं हो रही कोई कारगर पहल – हेमलता म्हस्के

जे टी न्यूज
भारतीय समाज में विधवाओं और खासकर एकल महिलाओं (तलाकशुदा, परित्यक्त या अविवाहित) की स्थिति पितृसत्तात्मक ढांचे के कारण चुनौतीपूर्ण और असुरक्षित हो गई है। अब तो ऐसी महिलाओं की संख्या भी कई कारणों से लगातार बढ़ती जा रही है । अपने देश में ऐसी एकल महिलाओं की संख्या विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक आज करीब 12 करोड़ से ज्यादा हो गई है। इसके बावजूद सरकारी नीतियों,चर्चाओं, विमर्श और कानून से लेकर कारपोरेट गाइडलाइंस तक में इन एकल महिलाओं की अनदेखी हो रही है।
एकल महिलाएं वे होती हैं, जो अपनी इच्छा या परिस्थितियों की वजह से अविवाहित हैं या फिर परित्यक्त या तलाक और विधवा हो जाने के चलते अकेली हो गई हैं। एकल महिलाओं में वह महिला भी शामिल हैं, जिसने कभी विवाह किया नहीं और अगर किया भी तो अब विवाह के दायरे से बाहर हो गई हैं और बिना जीवन साथी के अकेली रह रही हैं।
बताते हैं कि एकल महिलाओं की संख्या में भारी बढ़ोतरी की वजह है, मौजूदा सामाजिक रुझान । अब युवा पीढ़ी विवाह से दूरी बनाने लगी है। परिवार में पितृ सत्तात्मक ढांचे से कई तरह की समस्याएं पैदा होने लगी हैं, जिसका जल्दी से कोई समाधान भी नहीं निकलता है। इसी के साथ अब विवाह की आयु में भी बढ़ोतरी होने लगी है। सभी उम्र में तलाक के मामले भी पहले से ज्यादा होने लगे हैं। शिक्षा, जागरूकता, बदलती सोच और नई नई अपेक्षाओं के कारण भी एकल महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। शहरों और कस्बों में अब ज्यादातर लड़कियां आत्मनिर्भरता और शादी के मामले में कोई जल्दीबाजी नहीं करने लगी हैं। अगर यही हाल रहा तो अनुमान से भी कई गुना ज्यादा एकल महिलाओं की संख्या में वृद्धि होगी। अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी विवाह दर लगातार घट रही है अमेरिका में 2023 तक 25 से 34 आयु वर्ग की 41% महिलाएं अकेली हो गई थीं। यह प्रवृत्ति केवल भारत में ही नहीं अब पूरी दुनिया में दिखाई पड़ रही है। एकल महिलाओं की इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद मौजूदा नियम कानून में उनकी कोई पहचान नहीं है। विवाहित या विधवा महिलाओं को पेंशन और योजनाओं के लाभ मिलते हैं पर अविवाहित महिलाओं के लिए ऐसी आर्थिक सुरक्षा नहीं है। इससे उनकी सामाजिक आर्थिक असुरक्षा भी बढ रही है।
अब समय आ गया है कि एकल महिलाओं को सरकारी नीतियों में उचित जगह मिले, कल्याणकारी योजनाओं का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए और आर्थिक सामाजिक सुरक्षा के बारे में पूरी संवेदना के साथ सोचा जाना चाहिए।
एकल महिलाओं में विधवाओं को न केवल गहरे सामाजिक कलंक और अकेलेपन का सामना करना पड़ता है, बल्कि आर्थिक तंगी और संपत्ति के अधिकारों से वंचित रहने जैसी समस्याओं से भी जूझना पड़ता है। कई ग्रामीण और पारंपरिक इलाकों में विधवाओं को आज भी अशुभ माना जाता है। उन्हें शुभ कार्यों, त्योहारों और सामाजिक समारोहों में भाग लेने से रोका जाता है। पति या परिवार के पुरुष सदस्य की मृत्यु, अलगाव या अनुपस्थिति के बाद इन महिलाओं की आय का साधन छिन जाता है। संपत्ति के कानूनी अधिकार होने के बावजूद, अक्सर उन्हें पारिवारिक संपत्ति से बेदखल कर दिया जाता है। समाज में ‘विवाह-केंद्रित’ दृष्टिकोण होने के कारण एकल महिलाओं को मुख्यधारा से अलग-थलग कर दिया जाता है, जिससे वे मानसिक तनाव और अवसाद का शिकार हो जाती है। आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर होने के कारण, विधवाओं और एकल महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, हिंसा और संपत्ति हड़पने की घटनाएं अक्सर होती है। देखा जा रहा है समय बदलने के साथ उनके सामने कई चुनौतियां बढ़ गई है। वैसे तो इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि अनेक घरों में पति के साथ रहते हुए भी महिलाएं मानसिक तौर पर प्रताड़ित होती रहती हैं जब एकल महिलाओं की समस्याएं ही नहीं खत्म हो रही है तो उन पर कोई क्या ध्यान देगा।

