सरकारी घोषणा के बावजूद शिक्षक-कर्मियों की दीपावली फीकी, खातों में नहीं पहुंचा अनुदान
सितंबर में 461 करोड़ रुपये जारी करने की घोषणा, फिर भी भुगतान का इंतजार; बच्चों की फीस, परिवार का इलाज और त्योहार की खुशियां सब अधर में
सरकारी घोषणा के बावजूद शिक्षक-कर्मियों की दीपावली फीकी, खातों में नहीं पहुंचा अनुदान
सितंबर में 461 करोड़ रुपये जारी करने की घोषणा, फिर भी भुगतान का इंतजार; बच्चों की फीस, परिवार का इलाज और त्योहार की खुशियां सब अधर में
जे टी न्यूज,
पटना: बिहार के संबद्ध एवं वित्त रहित महाविद्यालयों के शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के लिए इस बार दीपावली भी निराशा और आर्थिक तंगी के बीच गुजर गई। सितंबर 2026 में राज्य सरकार ने इन संस्थानों के कर्मियों के भुगतान के लिए 461 करोड़ रुपये के सहायक अनुदान की घोषणा की थी। इस घोषणा से वर्षों से आर्थिक संकट झेल रहे हजारों परिवारों को उम्मीद जगी थी कि दीपावली और छठ से पहले उनके खातों में राशि पहुंच जाएगी। लेकिन विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में पर्व की छुट्टियां हो गईं, दीपावली भी बीत गई, मगर अनेक शिक्षक-कर्मियों को भुगतान नहीं मिला।
शिक्षक-कर्मियों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार ने शिक्षक स्नातक निर्वाचन को ध्यान में रखकर अनुदान की घोषणा की थी? यदि ऐसा नहीं था, तो फिर घोषणा के बावजूद समय पर भुगतान क्यों नहीं हुआ? चुनाव के दौरान उम्मीद जगाने वाली घोषणा के बाद भी यदि शिक्षक अपने बकाया के लिए तरस रहे हैं, तो सरकार की मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सबसे दुखद स्थिति यह है कि वर्षों से सेवा दे रहे इन शिक्षक-कर्मियों को अपने ही पारिश्रमिक के लिए बार-बार इंतजार करना पड़ रहा है। एक दशक के बाद अनुदान की घोषणा हुई, लेकिन उनके परिवारों की बुनियादी जरूरतें आज भी पूरी नहीं हो पा रही हैं। उनके बच्चों की स्कूल फीस कैसे जमा होगी? परिवार में कोई बीमार पड़ जाए तो इलाज का खर्च कहां से आएगा? घर का राशन, बिजली का बिल और रोजमर्रा की जरूरतें कैसे पूरी होंगी? क्या सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन ने कभी इन सवालों पर गंभीरता से विचार किया है?
दीपावली पर हर माता-पिता की इच्छा होती है कि बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदें, मिठाइयां लाएं और परिवार के साथ खुशियां बांटें। लेकिन जिनके घर में नियमित आमदनी का भरोसा नहीं, उनके लिए त्योहार भी चिंता का कारण बन जाता है। बाजारों में रोशनी थी, घरों में दीप जल रहे थे, लेकिन अनेक शिक्षक-कर्मियों के मन में अपने परिवार की जरूरतें पूरी नहीं कर पाने का दर्द था। आखिर बच्चों को क्या जवाब दें कि सरकार ने राशि जारी करने की घोषणा तो की, लेकिन उनके पिता के खाते तक वह आज भी नहीं पहुंची?
सरकार ने अनुदान के उपयोग, वेतन भुगतान, आर टी जे एस/ नेफ्ट से राशि हस्तांतरण तथा उपयोगिता प्रमाण-पत्र और अंकेक्षण प्रतिवेदन से संबंधित नियम निर्धारित किए हैं। पारदर्शिता के लिए इन नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन इन प्रक्रियाओं को समय पर पूरा कराना सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन की भी जिम्मेदारी है। प्रशासनिक देरी की सजा उन शिक्षक-कर्मियों को क्यों मिले, जो पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों में जीवन बिता रहे हैं?
सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन को यह समझना होगा कि शिक्षक एवं शिक्षकेत्तर कर्मचारी भी परिवार वाले इंसान हैं। उन्हें भी सम्मानपूर्वक जीवन जीने, बच्चों को अच्छी शिक्षा देने और बीमार परिजनों का इलाज कराने का अधिकार है। वर्षों तक शिक्षा व्यवस्था को अपनी सेवा देने वालों को अपने ही पारिश्रमिक के लिए इस तरह प्रतीक्षा कराना बेहद पीड़ादायक है।
अब केवल घोषणाओं और आश्वासनों से काम नहीं चलेगा। सरकार अनुदान वितरण की स्थिति सार्वजनिक करे और विश्वविद्यालय प्रशासन समयबद्ध तरीके से भुगतान सुनिश्चित करे। जिन महाविद्यालयों की औपचारिकताएं पूरी हैं, वहां तत्काल राशि हस्तांतरित की जाए।

आखिर शिक्षक-कर्मी सरकार से कोई खैरात नहीं मांग रहे हैं। वे अपने श्रम और वर्षों की सेवा के बदले मिलने वाली सहायता राशि मांग रहे हैं। याद रखिए, घोषणा से घर का चूल्हा नहीं जलता, बच्चों की फीस जमा नहीं होती और मरीज का इलाज नहीं होता। इसके लिए खाते में पैसा पहुंचना जरूरी है। अब शिक्षक-कर्मियों को आश्वासन नहीं, उनका बकाया भुगतान चाहिए।


