एक रोटी नहीं मिलने से बेहतर है आधी रोटी का मिलना –स्वामी विवेकानंद

एक रोटी नहीं मिलने से बेहतर है आधी रोटी का मिलना –स्वामी विवेकानंद


आलेख–प्रभुराज नारायण राव
जे टी न्यूज़ l स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को आज ही दिन कोलकाता में हुआ था। वह समाज के दबे कुचले लोगों को ऊपर उठाने के हिमायती थे। वह मुख्य रूप से समाज के हर व्यक्ति को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकार को देना चाहते थे। वे सभी प्रकार के शोषण और विशेषाधिकारों के विरोधी थे। उनका मानना था कि असमानता से ही शोषण की प्रक्रिया शुरू होती है। उनका लक्ष्य था की समाज में किसी प्रकार की जाति, धर्म ,लिंग या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं हो ।वह सभी को समान अधिकार और न्याय के पक्षधर थे। हालांकि उनके विचारों की समाजवादी सोच में मार्क्सवादी विचार की कोई चर्चा नहीं है ।यह इसलिए की 18 वीं सदी में मार्क्सवाद विकसित नहीं हुआ था। लेकिन 1886 में अमेरिका के शिकागो में वहां के मजदूरों ने 8 घंटे काम के अधिकार के लिए आंदोलन शुरू किया।शिकागो के सड़कों पर उतरे।जिन पर अमेरिकी साम्राज्यवाद ने गोलियां चलाई। जिसमें पांच श्रमिक शहीद हो गए। गोलियों की खून से लथपथ श्रमिक के कपड़े को दूसरा श्रमिक लेकर आगे बढ़ने लगा और उसको भी गोलियों से भून दिया गया।इस तरीके से वहीं से श्रमिकों के लाल झंडे की उत्पत्ति हुई। जिसका असर स्वामी विवेकानंद के विचारों में भी देखने को मिलता है। वह व्यक्ति द्वारा व्यक्ति के शोषण की नियति के घोर विरोधी थे। वे गरीबों के दयनीय स्थिति से काफी व्यथित रहते थे और उनके अंदर सुधार को ही राष्ट्र का विकास मानते थे। वे सभी के लिए समान अवसर और समतापूर्ण, शोषण विहीन समाज की व्यवस्था का निर्माण करना चाहते थे। उन्होंने कहा कि सच्चे धर्म में अंधविश्वास जैसा विश्वास या आस्था नहीं होती।मूर्ख लोग इस या उस महापुरुष के अनुयाई होने का दंभ भरते हैं। वे सारी मानवता को आंखें बंद करके विश्वास करने का उपदेश देते हैं।उनका कहना था कि तुम नास्तिक भले बन जाओ।परंतु बिना सोचे विचारे विश्वास मत करो। वरना आने वाले पीढ़ी को भी हानि पहुंचाओगे।

उन्होंने कहा कि हम मनुष्य जाति को उस मुकाम पर पहुंचाना चाहते हैं। जहां ना कोई वेद हो,ना बाइबिल हो, ना कुरान हो।मगर यह वेद,बाइबिल और कुरान के समन्वय से ही हो सकता है।उनका कहना था कि सांप्रदायिकता की नफरत में सत्ता का सिंहासन हासिल करने वाले अगर विवेकानंद का जय जयकार करें तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि कहां तुम्हारी डगर और कहां स्वामी विवेकानंद के विचार ।स्वामी विवेकानंद खुद को भी समाजवादी कहने से नहीं हिचकते थे।उनका कहना था कि इक्कीसवीं सदी श्रमिकों की है।क्योंकि मानव समाज चार जातियों में बटा हुआ है।जिसमें पुरोहित,योद्धा,व्यापारियों का शासनकाल समाप्त हो चुका है।अब श्रमिकों यानि शूद्रों का राज्य आएगा।अब इनको यह सत्ता मिलनी चाहिए।अब इनको कोई रोक नहीं सकता।उन्होंने यह भी कहा कि मैं समाजवादी हूं।यह इसलिए नहीं कि मैं इसे पूर्ण रूप से निर्दोष व्यवस्था मानता हूं।बल्कि एक रोटी नहीं मिलने से बेहतर है कि आधी रोटी मिल जाय l 

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