पंचायती राज में नारी शक्ति, संसद में अब भी इंतज़ार क्यों?
पंचायती राज में नारी शक्ति, संसद में अब भी इंतज़ार क्यों?

जे टी न्यूज, समस्तीपुर: पंचायती राज व्यवस्था का विचार महात्मा गांधी के उस स्वप्न से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने ग्राम स्वराज की परिकल्पना की थी। ऐसा शासन जहाँ निर्णय नीचे से ऊपर की ओर हों और स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर ही किया जाए। यह सपना संविधान में 73वें संशोधन के माध्यम से साकार हुआ, जिसने देश में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था—ग्राम पंचायत, पंचायत समिति (प्रखंड स्तर) और जिला परिषद को संस्थागत रूप दिया।
इस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है शक्ति का विकेंद्रीकरण। जब शासन स्थानीय स्तर पर कार्य करता है, तो वहाँ के प्रतिनिधि जनता की वास्तविक समस्याओं को बेहतर समझते हैं और उनका समाधान भी अधिक प्रभावी ढंग से कर पाते हैं। यही कारण है कि पंचायती राज ने लोकतंत्र को जड़ों तक मजबूत किया है।
लेकिन इस व्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि है—महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण। लंबे समय तक महिलाएँ सामाजिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर रहीं। उन्हें न तो निर्णय लेने का अवसर मिलता था और न ही सार्वजनिक जीवन में भागीदारी। पंचायती राज में आरक्षण के माध्यम से आज महिलाओं को 50% तक प्रतिनिधित्व मिला है, जिसने उन्हें न केवल निर्णय लेने का अधिकार दिया, बल्कि नेतृत्व करने का आत्मविश्वास भी प्रदान किया।
आज हम देखते हैं कि गाँवों की महिलाएँ मुखिया, सरपंच और जिला परिषद सदस्य के रूप में न केवल अपने क्षेत्र का नेतृत्व कर रही हैं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं। यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि अवसर मिलने पर महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकती हैं।
इसके विपरीत, जब हम राष्ट्रीय स्तर विशेषकर संसद की बात करते हैं, तो स्थिति अभी भी संतोषजनक नहीं है। जहाँ कई देशों जैसे रवांडा, स्वीडन और क्यूबा में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी 50% से अधिक है, वहीं भारत में अभी भी महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की व्यवस्था पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सकी है। यह स्थिति विचारणीय है, विशेषकर तब जब हम 21वीं सदी में समानता और अधिकारों की बात करते हैं।

इतिहास भी इस बात का साक्षी है कि महिलाओं ने हर महत्वपूर्ण परिवर्तन में अपनी भूमिका निभाई है। फ्रांसीसी क्रांति हो या स्वतंत्रता आंदोलन, महिलाओं ने हर जगह अग्रणी योगदान दिया, लेकिन उन्हें राजनीतिक अधिकार बहुत देर से मिले। यह विडंबना आज भी किसी न किसी रूप में बनी हुई है।
महिलाएँ परिवार से लेकर समाज और राष्ट्र तक हर स्तर पर अपना योगदान देती हैं, लेकिन जब निर्णय लेने की बात आती है, तो उन्हें पीछे कर दिया जाता है। यह केवल सामाजिक असमानता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की कमजोरी भी है। बिना शक्ति के सशक्तिकरण संभव नहीं, और बिना प्रतिनिधित्व के अधिकार अधूरे रह जाते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम महिलाओं को केवल भागीदारी ही नहीं, बल्कि निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति दें। जिस प्रकार एक परिवार का संचालन महिलाओं के सहयोग के बिना संभव नहीं है, उसी प्रकार राष्ट्र निर्माण भी महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना अधूरा है।
अंततः, हमें यह समझना होगा कि समाज और देश एक गाड़ी की तरह हैं, जो तभी संतुलित रूप से आगे बढ़ सकती है जब उसके दोनों पहिए—पुरुष और महिलाएँ—समान रूप से मजबूत और सक्रिय हों। यदि हम आधी आबादी को उपेक्षित रखेंगे, तो समावेशी विकास की कल्पना अधूरी ही रहेगी।
अब समय आ गया है कि हम केवल नारी सशक्तिकरण की बात न करें, बल्कि उसे व्यवहार में उतारें—ताकि लोकतंत्र वास्तव में सभी के लिए हो, न कि केवल कुछ के लिए।
डॉ सुनीता कुमारी
असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग
वीमेंस कॉलेज, समस्तीपुर।
