चुनाव जीतने के लिए “फ्री की रेवड़ियाँ” असली विकास फाइलों और भाषणों में ही सीमित रह जाती – मुकेश

जे टी न्यूज़, समस्तीपुर : चुनाव आते ही “जनसेवा” अचानक तेज़ हो जाती है। मुफ्त योजनाओं की ऐसी बरसात शुरू होती है कि लगता है जैसे देश नहीं, कोई ऑफर सीज़न चल रहा हो,कहीं बेरोजगारों को हर महीने भत्ता देने का वादा, कहीं महिलाओं
को नकद सहायता, कहीं किसानों के कर्ज़ माफ, कहीं मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त राशन, मुफ्त लैपटॉप, मुफ्त स्कूटी। यानी हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ “फ्री” तैयार है। पहले कहा जाता है,बेरोजगारों को इतने हज़ार हर महीने मिलेंगे, महिलाओं
को इतने हज़ार मिलेंगे, किसी को इतना, किसी को उतना… जैसे मेहनत और काबिलियत की नहीं, बल्कि सिर्फ वादों की कीमत रह गई हो। सुनने में ये सब बहुत अच्छा लगता है, लेकिन सच ये है कि इन योजनाओं का बोझ आखिरकार उसी टैक्स
देने वाले आम आदमी पर आता है, जो पहले ही महंगाई, फीस, इलाज और रोज़मर्रा के खर्चों से जूझ रहा है। ऊपर से देश पर बढ़ता कर्ज़,वर्ल्ड बैंक से लिया गया कर्ज़ भी लगातार बढ़ रहा है, जो असल में शिक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे मजबूत
कामों में लगना चाहिए था, लेकिन कई बार वही पैसा चुनावी वादों और तात्कालिक फायदे में खर्च होता दिखता है। आज राहत मिलती है, लेकिन उसका बिल आने वाली पीढ़ियों को चुकाना पड़ता है। धीरे-धीरे ये व्यवस्था लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के
बजाय उन्हें इन पैसों पर निर्भर बना देती है। मेहनत और स्किल बढ़ाने की जगह इंतजार और उम्मीद बढ़ने लगती है,कि अगली बार भी कुछ “फ्री” मिल ही जाएगा। और सच भी है, जिसे मिलता है उसे अच्छा ही लगता है… आखिर मुफ्त की चीज़ छोड़ना
कौन चाहता है? इसका सबसे बड़ा नुकसान ये होता है कि असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। सरकारी स्कूलों में आज भी बच्चों के पास अभी भी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, अस्पतालों में इलाज से पहले लाइन और लापरवाही मिलती है,बेड नहीं है स्ट्रेचर नहीं
है स्टाफ नहीं है ।रोजगार के मौके पैदा करने की बजाय अस्थायी राहत देकर काम चलाया जाता है। अगर यही पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्किल डेवलपमेंट पर लगाया जाए, तो लोग खुद अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं और उन्हें किसी
मदद की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
पर असली बदलाव में मेहनत और समय लगता है, और चुनाव जीतने के लिए “फ्री की रेवड़ियाँ” ज्यादा आसान और तेज़
तरीका है। इसलिए हर बार वादों का वही सिलसिला दोहराया जाता है, और असली विकास फाइलों और भाषणों में ही सीमित रह जाता है। अंत में टैक्स देने वाला आम आदमी बस यही सोचता रह जाता है,उसका पैसा देश के भविष्य को मजबूत बना रहा
है, या सिर्फ अगले चुनाव की तैयारी में खर्च हो रहा है।



