लालू प्रसाद यादव : गरीबों की आवाज और सामाजिक न्याय के प्रतीक
लालू प्रसाद यादव : गरीबों की आवाज और सामाजिक न्याय के प्रतीक
जन्मदिवस विशेष
डॉ. सीता कुमारी
सहायक प्राध्यापक, गृह विज्ञान विभाग,
जी के पी डी महाविद्यालय, कर्पूरीग्राम, समस्तीपुर।

भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने केवल सत्ता नहीं चलाई, बल्कि समाज के उपेक्षित और वंचित वर्गों को राजनीतिक पहचान भी दिलाई। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राष्ट्रीय जनता दल के संस्थापक लालू प्रसाद यादव ऐसे ही नेताओं में शामिल हैं। उनके समर्थक उन्हें गरीबों, पिछड़ों, दलितों और वंचितों की आवाज मानते हैं। उनके जन्मदिवस के अवसर पर उनके राजनीतिक और सामाजिक योगदान को याद करना प्रासंगिक है।
लालू प्रसाद यादव ने 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। उस समय बिहार में सामाजिक असमानता गहरी थी और राजनीति तथा प्रशासन में कुछ चुनिंदा वर्गों का प्रभाव अधिक माना जाता था। लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। उन्होंने पिछड़े, अति पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया। उनके शासनकाल में पहली बार बड़ी संख्या में ग्रामीण और वंचित समाज के लोगों को यह महसूस हुआ कि उनकी भी सत्ता और प्रशासन में भागीदारी है।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि सामाजिक आत्मविश्वास का निर्माण माना जाता है। गांवों के गरीब, खेतिहर मजदूर, रिक्शा चालक और वंचित वर्ग के लोग खुलकर अपनी बात रखने लगे। पंचायतों और स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों की भागीदारी बढ़ी। सामाजिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में उनका योगदान आज भी चर्चा का विषय है।

लालू प्रसाद यादव ने शिक्षा और रोजगार में आरक्षण नीति का खुलकर समर्थन किया। मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के पक्ष में उनकी मजबूत भूमिका ने पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अवसर दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके समर्थकों का मानना है कि आज जो बड़ी संख्या में पिछड़े वर्ग के लोग प्रशासनिक सेवाओं, शिक्षा और राजनीति में दिखाई देते हैं, उसमें सामाजिक न्याय की उस राजनीति का बड़ा योगदान है।
गरीबों के लिए सस्ती और सुलभ व्यवस्था पर भी उन्होंने जोर दिया। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार की दिशा में कई योजनाएं शुरू की गईं। हालांकि संसाधनों की कमी और प्रशासनिक चुनौतियों के कारण अपेक्षित परिणाम हर क्षेत्र में नहीं मिल सके, लेकिन गरीबों और कमजोर वर्गों के हितों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है।
रेल मंत्री के रूप में भी लालू प्रसाद यादव ने अपनी अलग पहचान बनाई। उनके कार्यकाल में भारतीय रेलवे ने उल्लेखनीय वित्तीय सुधार दर्ज किए। कई नई ट्रेनों की शुरुआत हुई और रेलवे को घाटे से उबारने के उनके प्रयासों की चर्चा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई। प्रबंधन संस्थानों में उनके रेलवे मॉडल पर अध्ययन भी किए गए।

लालू प्रसाद यादव की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि उन्होंने गरीबों और वंचितों को केवल वोटर नहीं, बल्कि सत्ता में भागीदारी का अधिकार रखने वाला नागरिक माना। यही कारण है कि आज भी बिहार के बड़े वर्ग में उनकी लोकप्रियता बनी हुई है।
निस्संदेह, उनके शासनकाल को लेकर आलोचनाएं और विवाद भी रहे हैं। कानून-व्यवस्था, विकास और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर विपक्ष ने हमेशा सवाल उठाए। लेकिन यह भी सच है कि बिहार की सामाजिक संरचना में जो बदलाव आया और वंचित वर्गों का जो राजनीतिक सशक्तिकरण हुआ, उसमें लालू प्रसाद यादव की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उनके जन्मदिवस पर यह कहना उचित होगा कि लालू प्रसाद यादव केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। गरीब, पिछड़े और वंचित समाज को आवाज देने तथा उन्हें लोकतंत्र की मुख्यधारा में लाने के उनके प्रयास भारतीय राजनीति में लंबे समय तक याद किए जाते रहेंगे।



