225 संबद्ध महाविद्यालयों के साथ वादा या विश्वासघात?
अनुदान की घोषणाएं फाइलों में दफन, हजारों शिक्षक-कर्मचारी संकट में
225 संबद्ध महाविद्यालयों के साथ वादा या विश्वासघात?
अनुदान की घोषणाएं फाइलों में दफन, हजारों शिक्षक-कर्मचारी संकट में

जे टी न्यूज, पटना: बिहार सरकार एक ओर हर प्रखंड में नए डिग्री महाविद्यालय खोलने और उच्च शिक्षा के विस्तार का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य के 225 संबद्ध डिग्री महाविद्यालय आज भी सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। वर्षों से अनुदान के नाम पर घोषणाएं, समितियां और आश्वासन दिए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर हालात यह हैं कि हजारों शिक्षक और कर्मचारी आर्थिक असुरक्षा के बीच जीवन गुजारने को मजबूर हैं।
शिक्षक संगठनों का आरोप है कि सरकार ने पहले छात्रों के परीक्षा परिणामों के आधार पर दो वित्तीय वर्षों का अनुदान दिया। इसके बाद बड़े जोर-शोर से घोषणा की गई कि राज्य के सभी संबद्ध महाविद्यालयों को एकमुश्त एक करोड़ रुपये की सहायता राशि प्रदान की जाएगी। लेकिन यह घोषणा भी अन्य सरकारी वादों की तरह कागजों और भाषणों तक सीमित रह गई।
गौरतलब है कि शिक्षा विभाग के तत्कालीन सचिव असंगबा चुबा आओ ने अनुदान वितरण के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसमें आरटीजीएस/एनईएफटी के माध्यम से सीधे शिक्षकों एवं कर्मचारियों के खातों में भुगतान, महाविद्यालयों के लिए वेबसाइट निर्माण, वेतन संबंधी सूचनाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन तथा अनुदान प्रक्रिया को ऑनलाइन करने के लिए विशेष पोर्टल विकसित करने की घोषणा की गई थी। सरकार ने पारदर्शिता और जवाबदेही का दावा भी किया था।
लेकिन वर्षों बाद भी न तो नियमित अनुदान व्यवस्था लागू हो सकी और न ही हजारों शिक्षकों-कर्मचारियों को कोई स्थायी राहत मिल सकी। कई संबद्ध महाविद्यालय आज वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं। शिक्षकों का कहना है कि महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन सरकार की ओर से केवल आश्वासन मिल रहा है, समाधान नहीं।

दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के संभावित प्रत्याशी आर. के. राय ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की गई थी। उस समय दावा किया गया था कि संबद्ध महाविद्यालयों की समस्याओं का स्थायी समाधान निकाला जाएगा। लेकिन चुनाव खत्म होते ही समिति की रिपोर्ट, उसकी अनुशंसाएं और कार्रवाई सब रहस्य बनकर रह गई। आज तक सरकार ने यह नहीं बताया कि समिति ने क्या सुझाव दिए और उन पर क्या निर्णय लिया गया।
उन्होंने कहा कि यह मामला मुख्यमंत्री के जनता दरबार से लेकर बिहार विधान परिषद तक पहुंचा। जदयू के विधान पार्षद संजीव कुमार सिंह ने भी इस मुद्दे को सदन में उठाया था, जिस पर तत्कालीन शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी ने सकारात्मक आश्वासन दिया था। लेकिन आश्वासनों की लंबी सूची के बावजूद संबद्ध महाविद्यालयों की स्थिति जस की तस बनी हुई है।
शिक्षक नेताओं का कहना है कि सरकार यदि वास्तव में उच्च शिक्षा को मजबूत करना चाहती है तो सबसे पहले उन संस्थानों को बचाना होगा, जो दशकों से लाखों विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। उनका आरोप है कि संबद्ध महाविद्यालयों को अनुदान से वंचित रखकर हर प्रखंड में नए डिग्री कॉलेज खोलने की नीति केवल दिखावटी विकास है। जब पुराने संस्थान ही आर्थिक संकट में हैं, तब नए महाविद्यालय खोलने की घोषणा जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसी प्रतीत होती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार स्वयं अनुदान नीति बना चुकी है, दिशा-निर्देश जारी कर चुकी है और सदन में आश्वासन भी दे चुकी है, तो फिर 225 संबद्ध महाविद्यालयों के हजारों शिक्षक एवं कर्मचारी आज भी अपने अधिकार की राशि के लिए क्यों भटक रहे हैं?

अब उच्च शिक्षा जगत की निगाहें सरकार पर टिकी हैं। शिक्षक संगठनों ने मांग की है कि मुख्य सचिव समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, लंबित अनुदान का तत्काल भुगतान हो और संबद्ध महाविद्यालयों के लिए स्थायी वित्तीय नीति घोषित की जाए। अन्यथा यह मुद्दा आने वाले दिनों में बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था और राजनीति दोनों में बड़ा प्रश्न बन सकता है।
“घोषणाएं बहुत हुईं, अब जवाब चाहिए — आखिर 225 संबद्ध महाविद्यालयों का दोष क्या है?”
