पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर चोट करती दिखी नाटक बेटी

पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर चोट करती दिखी नाटक बेटी

*बेटा सिर्फ एक कुल,पर दो-दो कुलों को रोशन करती हैं बेटियां*

जेटी न्यूज

भागलपुर : रंगग्राम जन सांस्कृतिक मंच भागलपुर द्वारा आयोजित भागलपुर रंग महोत्सव-2022 के तीसरे दिन समापन के अवसर पर उच्च न्यायालय इलाहाबाद के अधिवक्ता रंगकर्मी रंग निर्देशक आईपी रामबृज द्वारा निर्देशित प्रबुद्ध फाउंडेशन की नाट्य प्रस्तुति “बेटी” का मंचन हुआ।
नाटक में अजन्मी बेटी रिया मौर्या द्वारा मां की कोख से पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था और पुरुषों की बेटी के प्रति नकारात्मक मानसिक सोच पर चोट करता कथोपकथन कि आज तो बेटी को बचाएंगे, कल गंदी सोच के लोग दामिनी की तरह उसको भी नोच खाएंगे। वहां से बच गए तो दहेज के नाम पर जिंदा जलायेंगे। अगर कोख से बुढ़ापा तक रोना ही था तो क्यों आए हम यहां? यहां सबको मां चाहिए, बहन चाहिए, बीवी चाहिए मगर बेटी किसी को नहीं चाहिए। ओस की बूंद होती है बेटियां मां-बाप को दर्द हो तो रोती है बेटियां। बेटा सिर्फ एक कुल, दो-दो कुलों को रोशन करती है बेटियां। लेकिन किसी को नहीं चाहिए बेटियां। क्यों? क्यों नहीं चाहिए बेटियां ? आखिर हमारा कुसूर क्या है ?
नाटक बेटी भारत की पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था पर गहरी चोट पहुंचाता है। एक ओर जहां रामेश्वर दलित समाज से है तो वही दूसरी ओर उसका घनिष्ट दोस्त दिनेश ओबीसी समाज से है। रामेश्वर की बेटी अभी हाल ही में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की है तो उधर दिनेश का बेटा हाल ही में पीडब्ल्यूडी में जेई के पथ पर नियुक्त हुआ है। बहुजन महापुरुषों की वैचारिकी कि पच्चासी प्रतिशत बहुजन समाज इस देश के हुक्मरान थे, शासक थे लेकिन वर्णाश्रम व्यवस्था के चलते इंसान को चार वर्गों में विभाजित कर शूद्रो को 6743 जातियों में बांट दिया गया।

भारतीय परिदृश्य बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के पुराने गौरव को वापस लाने की दिशा में दिनेश और रामेश्वर व्यवहारिक रूप से अपने बच्चों का रोटी बेटी का रिस्ता कायम कर बहुजन समाज को एकबार पुनः समता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व पर आधारित जातिविहीन समाज के निर्माण और संगठित कर देश का हुक्मरान बनाने का व्यवहारिक पहल की शुरुआत अपने घरों से किये किन्तु दिनेश की पत्नी गंगा जो पुराने खयालात की है जो दहेज की लोभी भी है लेकिन गुणवान और एमबीबीएस बहू उसके खयालात और दहेज रूपी सोच बदल देती है। गंगा को सोनोग्राफी की रिपोर्ट से जैसे पता चलता है कि उसकी बहू ज्योति माँ बनने वाली है उसे बेटी है उस पर आग बबूला हो जाती है। गंगा अपने पुत्र रोहित को बहू के पेट में पल रही बेटी को मारने को कहती है। रोहित और उसकी पत्नी ज्योति के मध्य बेटी को न चाहते हुये उसे मारने को लेकर काफी जद्दोजहद होता है। ज्योति के कोख में पल रही अजन्मी बेटी अपने कथोपकथन से अपने पिता रोहित के नकारात्मक सोच को बदल देती है। अंत में ज्योति और उसका पति रोहित मिलकर समाज सेवा के माध्यम से बेटी को बचाने का संकल्प लेते हैं।
रिया मौर्या- बेटी, आंचल – पड़ोसन, डॉक्टर, रिया- गंगा, प्रज्ञा रश्मि गौतम- ज्योति, इशांत चौधरी- दिनेश बाबू, श्रेष्ठ चौधरी- रोहित, राजू राव- रामेश्वर बाबू, संगीत हिमांशु जैसवार, रूप सज्जा रीना गौतम ने अपने रोल के साथ न्याय किया। नाटक बेटी का निर्देशन उच्च न्यायालय के अधिवक्ता समाजसेवी रंगकर्मी रंग निर्देशन आईपी रामबृज ने किया।

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