225 संबद्ध महाविद्यालयों के साथ वादा खिलाफी? अनुदान पर सरकार की चुप्पी, शिक्षक-कर्मचारी आज भी इंतजार में

225 संबद्ध महाविद्यालयों के साथ वादा खिलाफी? अनुदान पर सरकार की चुप्पी, शिक्षक-कर्मचारी आज भी इंतजार में

पटना। बिहार के 225 संबद्ध डिग्री महाविद्यालयों को अनुदान देने के नाम पर वर्षों से घोषणाएं, दिशा-निर्देश और आश्वासन तो दिए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति आज भी संतोषजनक नहीं है। शिक्षक संगठनों का आरोप है कि दो वित्तीय वर्षों में अनुदान राशि का भुगतान करने के बाद सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की और उसके बाद से केवल बयानबाजी तथा कागजी कवायद चल रही है।

गौरतलब है कि शिक्षा विभाग के तत्कालीन सचिव असंगबा चुबा आओ ने राज्य के सभी परंपरागत विश्वविद्यालयों को अनुदान वितरण को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसमें स्पष्ट कहा गया था कि अनुदान राशि का भुगतान शिक्षकों एवं शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के खातों में आरटीजीएस/एनईएफटी के माध्यम से किया जाएगा। साथ ही महाविद्यालय के आंतरिक स्रोत की 70 प्रतिशत राशि को सरकारी अनुदान के साथ जोड़कर वेतन भुगतान सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई थी।

सरकार ने यह भी निर्देश दिया था कि केवल विधिवत नियुक्त शिक्षक एवं शिक्षकेत्तर कर्मचारी ही अनुदान के पात्र होंगे। पारदर्शिता के लिए महाविद्यालयों को अपनी वेबसाइट बनाने, वेतन संबंधी सूचनाएं सार्वजनिक करने तथा अनुदान प्रक्रिया को ऑनलाइन करने हेतु पोर्टल विकसित करने की भी घोषणा की गई थी।

लेकिन शिक्षक संगठनों का आरोप है कि इन घोषणाओं का अधिकांश हिस्सा फाइलों तक ही सीमित रह गया। उनका कहना है कि राज्य के 225 संबद्ध महाविद्यालयों में कार्यरत हजारों शिक्षक एवं कर्मचारी आज भी नियमित अनुदान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कई महाविद्यालय आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं और शिक्षकों के समक्ष जीवन-यापन तक की समस्या उत्पन्न हो गई है।

दरभंगा शिक्षक निर्वाचन के संभावित प्रत्याशी श्री आर. के. राय का कहना है कि विधानसभा चुनाव से पहले सरकार ने संबद्ध महाविद्यालयों की समस्याओं के समाधान के लिए एक समिति का गठन किया था। उस समय इसे बड़ा कदम बताते हुए उम्मीद जगाई गई थी कि वर्षों से लंबित अनुदान और अन्य मुद्दों का समाधान होगा। लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद उस समिति की रिपोर्ट का क्या हुआ, क्या अनुशंसाएं दी गईं और उन पर क्या कार्रवाई हुई—इसकी जानकारी आज तक सार्वजनिक नहीं हो सकी है।

शिक्षक नेताओं का कहना है कि मामला मुख्यमंत्री के जनता दरबार से लेकर बिहार विधान परिषद तक पहुंचा। विधान परिषद में जदयू के विधान पार्षद संजीव कुमार सिंह ने इस मुद्दे को उठाया था, जिस पर सरकार की ओर से तत्कालीन शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी ने सकारात्मक आश्वासन भी दिया था। बावजूद इसके स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है।

संबद्ध महाविद्यालयों के शिक्षकों का सवाल है कि जब सरकार स्वयं अनुदान वितरण की नीति बना चुकी है और पारदर्शिता के लिए दिशा-निर्देश भी जारी कर चुकी है, तो फिर वर्षों से लंबित भुगतान क्यों नहीं किया जा रहा है? आखिर 225 महाविद्यालयों के हजारों शिक्षक और कर्मचारी कब तक सरकारी आश्वासनों के भरोसे रहेंगे?

अब उच्च शिक्षा जगत की निगाहें सरकार पर टिकी हैं। शिक्षक संगठनों ने मांग की है कि सरकार समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करे, लंबित अनुदान का भुगतान सुनिश्चित करे और संबद्ध महाविद्यालयों के भविष्य को लेकर स्पष्ट नीति घोषित करे। अन्यथा यह मुद्दा आने वाले समय में शिक्षा जगत के बड़े आंदोलनों का कारण बन सकता है।

Related Articles

Check Also
Close
Back to top button