राम सुदिष्ट यादव ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन पर दी बधाई
राम सुदिष्ट यादव ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन पर दी बधाई

जे टी न्यूज, मधुबनी: 11 जून सामाजिक न्याय योद्धा, बहुजन के मसीहा, पूर्व मुख्यमंत्री माननीय लालू प्रसाद यादव जी का जन्म दिन है । इस अवसर पर राम सुदिष्ट यादव समाजवादी विचारक मधुबनी बिहार की ओर से हार्दिक बधाई एवं सादर कोटि-कोटि प्रणाम। उन्होंने इस अवसर पर लालू जी की हिम्मत, साहस के साथ चौतरफा सामंती वर्चस्व के खिलाफ लड़ते हुए बहुजनों की आवाज बनकर सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक क्षेत्र में परिवर्तनकारी कार्यों पर प्रकार डालते हुए कहा कि—
लालू प्रसाद यादव बिहार के राजनीतिक इतिहास के उन नेताओं में रहे हैं जिनके “खलनायकत्व” से 1990 के दशक से लेकर अब तक की हिंदी क्षेत्र की मुख्यधारा का इतिहास, साहित्य, मीडिया, अकादमिक जगत और समकाल भरा-पूरा है । भारत के इतिहास में अभी तक शायद ही कोई ऐसा व्यक्तित्व हुआ जिसको “खलनायकत्व” की इतनी तरह की भ्रांतियों से धूल-धूसरित किया गया हो । निर्णायक ढंग से अभी भी उन्हें बदनाम करने का यह अभियान थमा नहीं है । लेकिन सच यह भी है कि उन्हें खलनायक के रूप में चित्रित करने की जितनी कोशिशें होंगी, उनके नायकत्व में और ज्यादा निखार आएगा । उनके शासनकाल को “जंगलराज” कहा गया । इस तरह के नैरेटिव गढ़े जाने के पीछे सवर्ण जातियों का वह दुराग्रह रहा है जो 90 के पहले बिहार की राजनीति और सिस्टम में छाए उनके वर्चस्व से जुड़ा है । लालू प्रसाद यादव ने सदियों से कायम उसी सवर्ण वर्चस्व की राजनीति को तोड़ा । बिहार में अरसे से चली आ रही अभियान राजनीति को हमेशा के लिए हास्य पर डाल दिया । ओबीसी के सशक्तिकरण का जो एजेंडा वर्षों के त्रिवेणी संघ आंदोलन, पिछड़ा वर्ग आंदोलन, समाजवादी आंदोलन और अर्जक संघ आंदोलन द्वारा पूरे नहीं किये जा सके थे – लालू प्रसाद ने उसे पूरी तरह कार्यान्वित करने की मुहिम में बदल दिया ।
मंडल कमीशन लागू होने के पहले राजनीति में बहुजन वर्ग समूह हाशिए पर थे । कांग्रेस या दूसरे दलों में उनकी हैसियत पिछलग्गू की थी ।इस घटना के फलस्वरुप राजनीति में बहुजन नेताओं का बड़े पैमाने पर उभार हुआ । लालू प्रसाद यादव इस उभार के बड़े प्रेरक श्रोत बने । यह वहीं समय था जब केंद्र और राज्य की नीतियों को वे सीधे प्रभावित करते थे। उनकी सहमति की अनदेखी कर कुछ भी करना संभव नहीं रह गया था । यह लालू, मुलायम ही थे जिनकी अगुवाई में बहुत सारे बहुजन सांसदों ने महिला आरक्षण बिल को (बिना ओबीसी, एससी, एसटी वर्ग को आरक्षण के) पास नहीं होने दिया । यही वह दौर है जब पूरे भारतीय राजनीति में ओबीसी वर्ग के आरक्षण को सर्वानुमति मिली और पूरे देश में बहुजन वैचारिकी को बल मिला । ज्योतिबा फुले, डॉ अंबेडकर, डॉ लोहिया और पेरियार रामास्वामी जैसे समाज सुधारक के विचार को फिर से पढ़े जाने लगे । उनके साहित्य लेखन विचार का प्रचार-प्रसार बढ़ा। इसी दौर में कम्युनिस्ट और भाजपा जैसी स्वर्ण नेतृत्व वाली पार्टियों में हाशिये की जातियों का वर्गीय दखल बढ़ा । मंडल परिघटना का यह प्रभाव यही तक सीमित नहीं रहा, अपितु इसकी अनुगूंज पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में सुनाई देने लगी । यह अकारण नहीं हुआ कि गैर सवर्ण एचडी देवगौड़ा भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं और नेपाल में मधेशी आंदोलन से आए रामवरन यादव राष्ट्रपति बनते हैं ।
20 वीं सदी के अंतिम दशक में भारत के आठवें प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने 1980 से केन्द्र सरकार द्वारा ठंडे बस्ते में डाल दी गई मंडल कमीशन रिपोर्ट में से एक सिफारिश केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण को लागू करने की घोषणा की। तो उसकी काट में सवर्ण वर्चस्व बरकरार रखने की राजनीति करने वाली भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने आरएसएस मुख्यालय गुजरात से “रामरथ यात्रा” निकाल कर देश में साम्प्रदायिक माहौल बनाने लगी। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने उनकी रथयात्रा को समस्तीपुर जिला में रोक दी और लालकृष्ण आडवाणी जी को गिरफ्तार कर हेलिकॉप्टर से मसानजोर आईबी में सुरक्षित सम्मान के साथ रख दी। फलस्वरुप भाजपा ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया और 10 नवंबर 1990 को जनता दल की बीपी सिंह के नेतृत्व में बनी सरकार गिर गई । इस घटना ने पूरे देश को गृह युद्ध जैसी स्थिति में ला दिया । आजाद भारत में अगड़े और पिछड़े दो भागों में बंट गये । यहां की बौद्धिक जमात एक दूसरे के खिलाफ जहर उगल रही थी । सर्वत्र आगजनी और सरकारी संपत्ति की तोड़फोड़ की जा रही थी। शिक्षण संस्थाओं, राज्य की राजधानियों, जिला मुख्यालयों और प्रखंड मुख्यालयों तक में सरकार के इस निर्णय के समर्थन और विरोध में प्रदर्शन जारी थी ।
सवर्ण इस आरक्षण को अपने सरकारी नौकरियों को अघोषित अधिकारों पर हुए कुठाराघात के रूप में देख रहे थे और अवर्न/ओबीसी अपने संवैधानिक अधिकारों के हासिल होने के सबसे उपयुक्त मौके के तौर पर देख रहे थे। आश्चर्यजनक पहलू यह है कि एक- दूसरे के घोर विरोधी रहे कम्युनिस्ट और जनसंघ इस घटना पर एकमत थे। संसदीय बहस इसका गवाह है। मंडल परिघटना ने दकियानूसी और प्रगतिशीलता की विभाजन रेखा को पूरी तरह से मिटा दिया । इस देश के बहुसंख्यक समाज में भी एक नई चेतना पैदा हुई । पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों एवं समाजवादी विचारधारा के उदारवादी सवर्ण का एक वर्ग उभरा जिसने लालू प्रसाद यादव को सर आंखों पर बैठाया । इस घटना ने लालू प्रसाद को इस देश के बहुजन समाज का नायक बना दिया । यही कारण है कि यहां के प्रतिक्रियावादी _सर्वण बौद्धिकों के लिए वे आज भी खलनायक है । और बहुजन आबादी के लिए उतने ही बड़े सामाजिक न्याय के पक्षधर, भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाले अपराजित योद्धा माने जाते हैं।
भारत के सर्वश्रेष्ठ विद्वान डॉ भीमराव अंबेडकर ने संविधान लेखन का कार्य संपन्न हो जाने के पश्चात कहा था कि– अगर राजनीति में सामाजिक पहलू की उपेक्षा की गई तो वोट की समानता तो होगी, लेकिन आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक जीवन में समानता नहीं होगी । इससे भारतीय समाज में बेचैनी पैदा होगी । कांग्रेस ने आजादी के बाद सत्ता संभाली और इस खाई को और चौड़ा ही करता गया । परिणाम स्वरुप देश भर में उनके खिलाफ विपक्षी पार्टियों का गठबंधन गैर कांग्रेसवाद अस्तित्व में आया ।जिसकी परिणति हमें 1967 के चुनाव में नजर आती है ।
लालू प्रसाद भारत में पैदा हुए इसी बेचैनी के दौर में समाजवादी छात्र आंदोलन से निकलते हैं । बिहार आंदोलन में जेपी ने इस युवक में एक संभावना देखी थी । वह कांग्रेस की सामंतों और सवर्ण जातियों तक सीमित राजनीति को विस्तारित करना चाहते थे । इसलिए एक नई राजनीति की परिकल्पना उनके अंदर अंगड़ाई ले रही थी । इसकी प्रतिक्रिया बिहार में इस रूप में हुई कि कांग्रेस सत्ता से बेदखल हुई । और इसके बाद ही कर्पूरी ठाकुर, जगदेव प्रसाद और लालू प्रसाद यादव जैसे नेता उभर कर सामने आये जिन्होंने इस सामाजिक गैर बराबरी को अपने तरीके से पाटने का प्रयास किया । लालू यादव के द्वारा जो सामाजिक न्याय की राजनीतिक पिच तैयार की गई, जिसके कारण पिछले 35 सालों से बिहार में पिछड़े वर्ग के नेतृत्व में सरकारें चल रही है, चाहे सरकार कोई भी पार्टी की हो।
ज्ञातव्य है कि लालू प्रसाद को जेपी साहब की सिफारिश पर लोकसभा का टिकट मिला और पहले सांसद बने, फिर विधायक, नेता प्रतिपक्ष, मुख्यमंत्री और केंद्रीय रेल मंत्री उनका पूरा राजनीतिक सफर समाजवादी राजनीति में अपनी तरह का रहा । मंडल का दौर आया तो लालू ने बीपी सिंह को मजबूती के साथ पकड़े रहा। उन्होंने जातिवाद के वर्चस्व एवं छुआ-छूत को तोड़ने की राजनीति की उनकी पूरी राजनीति समाजवादी संघर्ष का नमूना है । लालू प्रसाद के इस संपूर्ण राजनीति सफर को हम राष्ट्रीय और बिहार के परिपेक्ष में दो धरातलों पर विकसित होते देखते हैं। क्रमशः


