जनसंख्या नहीं, मानव पूंजी बनाइए
जनसंख्या नहीं, मानव पूंजी बनाइए

11 जुलाई को पूरी दुनिया विश्व जनसंख्या दिवस मनाती है। यह दिन केवल बढ़ती आबादी पर चिंता व्यक्त करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह सोचने का भी समय है कि क्या हमारी जनसंख्या देश की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। आज जब भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, तब यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हम अपनी जनसंख्या को मानव पूंजी में बदल पा रहे हैं?
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत की जनसंख्या लगभग 146 करोड़ तक पहुंच चुकी है। लेकिन इस आंकड़े से भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। लगभग 68% आबादी 15 से 64 वर्ष के कार्यशील आयु वर्ग में है और औसत आयु लगभग 29 वर्ष है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश कहते हैं। यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल और रोजगार मिले तो यही आबादी भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी कम गंभीर नहीं है। आज भी देश का बड़ा युवा वर्ग रोजगार की तलाश में है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस), 2023–24 के अनुसारके अनुसार स्थिति में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन शिक्षित युवाओं में रोजगार की गुणवत्ता और स्थायित्व अभी भी बड़ी चुनौती है। दूसरी ओर, भारत कौशल रिपोर्ट, 2025 बताती है कि बड़ी संख्या में डिग्रीधारी युवाओं के पास उद्योगों की जरूरत के अनुरूप कौशल नहीं है। यानी हमारे पास युवा तो हैं, लेकिन उन्हें अवसरों के अनुरूप तैयार करना अभी बाकी है।
जनसंख्या बढ़ने का असर केवल रोजगार तक सीमित नहीं है। शहरों में बढ़ती भीड़, ट्रैफिक जाम, महंगे मकान, अस्पतालों में लंबी कतारें, स्कूलों पर दबाव और जल संकट जैसी समस्याएं भी कहीं न कहीं बढ़ती आबादी और संसाधनों पर बढ़ते दबाव का परिणाम हैं। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता बोझ भविष्य की चिंता को और गंभीर बना देता है।
हालांकि भारत ने पिछले तीन दशकों में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि भी हासिल की है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण – 5 के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर घटकर 2.0 रह गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से भी कम है। इसका अर्थ है कि भारत में अब समस्या केवल जनसंख्या वृद्धि नहीं, बल्कि जनसंख्या की गुणवत्ता अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। अब बहस “कितने लोग” पर नहीं, बल्कि “कैसे लोग” पर होनी चाहिए।
आज आवश्यकता है कि हम जनसंख्या नियंत्रण की चर्चा से आगे बढ़कर मानव विकास की बात करें। यदि हर बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले, हर युवा को कौशल प्रशिक्षण मिले, हर महिला को स्वास्थ्य और निर्णय लेने का अधिकार मिले तथा हर परिवार को सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध हो, तो यही जनसंख्या भारत की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन सकती है।
इस दिशा में सरकार की कई योजनाएं—स्किल इंडिया मिशन, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020—महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। लेकिन इन योजनाओं की वास्तविक सफलता तभी होगी जब इनका लाभ गांव-गांव और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
विश्व जनसंख्या दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि जनसंख्या केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, समाज, शैक्षणिक संस्थान और प्रत्येक नागरिक की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। हमें बेटियों की शिक्षा, महिलाओं के स्वास्थ्य, परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता और युवाओं के कौशल विकास को सामाजिक आंदोलन बनाना होगा।
आज दुनिया भारत को केवल सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में नहीं, बल्कि सबसे अधिक संभावनाओं वाले देश के रूप में देख रही है। यह संभावना तभी वास्तविकता बनेगी जब हम अपनी युवा आबादी को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और नवाचार से जोड़ सकेंगे।
विश्व जनसंख्या दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम केवल जनसंख्या नहीं बढ़ाएंगे, बल्कि मानव पूंजी का निर्माण करेंगे। क्योंकि किसी भी देश की वास्तविक ताकत उसकी आबादी की संख्या नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य और उत्पादकता होती है।
अंततः, भारत के सामने चुनौती जनसंख्या नहीं है; चुनौती है जनसंख्या को अवसर में बदलने की। यदि हम यह कर सके, तो विकसित भारत का सपना केवल सपना नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले वर्षों में एक सशक्त वास्तविकता बन जाएगा ।
— डॉ. विजय कुमार गुप्ता
वरीय सहायक प्राध्यापक (अर्थशास्त्र), वीमेंस कॉलेज, समस्तीपुर


