आज के भारत में असहिष्णुता : परिभाषा, परिदृश्य और समाधान – बिमल सर्राफ
आज के भारत में असहिष्णुता : परिभाषा, परिदृश्य और समाधान – बिमल सर्राफ

जे टी न्यूज़, रक्सौल पूर्वी चंपारण: भारत सदियों से विविधताओं का देश रहा है। यहां अनेक धर्म, भाषाएँ, संस्कृतियाँ, जातियाँ और विचारधाराएँ साथ-साथ विकसित हुई हैं। यही विविधता भारत की सबसे बड़ी शक्ति मानी जाती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में “असहिष्णुता” शब्द सार्वजनिक चर्चा का एक प्रमुख विषय बन गया है। यह केवल राजनीतिक बहस का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों से भी जुड़ा प्रश्न है। उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322 ई के जोनल चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
असहिष्णुता क्या है?
असहिष्णुता का अर्थ है— किसी व्यक्ति, समुदाय या विचार से केवल इसलिए असहमति नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करने से इनकार करना, उसके प्रति घृणा, उपेक्षा या हिंसक व्यवहार अपनाना। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, किंतु मतभेद को मनभेद में बदल देना असहिष्णुता की शुरुआत है।
वर्तमान भारत का परिदृश्य
आज भारत में राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और वैचारिक मुद्दों पर तीखी बहसें होती हैं। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का मंच दिया है, लेकिन इसके साथ कटु भाषा, अफवाहें, ट्रोलिंग और व्यक्तिगत हमलों की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। कई बार किसी व्यक्ति की पहचान उसके विचारों से नहीं, बल्कि उसकी जाति, धर्म या राजनीतिक झुकाव से तय की जाने लगती है। यह लोकतांत्रिक संवाद के लिए चिंताजनक स्थिति है।

हालाँकि यह भी उतना ही सत्य है कि भारत में प्रतिदिन करोड़ों लोग विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के साथ शांतिपूर्वक जीवन जीते हैं। इसलिए पूरे देश को असहिष्णु कहना भी उचित नहीं होगा। चुनौती यह है कि कुछ घटनाएँ समाज में अविश्वास और ध्रुवीकरण का वातावरण बना देती हैं।
लोकतंत्र में असहमति का महत्व
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि नागरिक बिना भय के अपनी बात कह सकें और दूसरों की बात भी सुन सकें। किसी विचार से असहमत होना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उस विचार को रखने वाले व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। स्वस्थ समाज वही है जहाँ संवाद, तर्क और संवेदनशीलता को महत्व दिया जाए।
असहिष्णुता के प्रमुख कारण
– राजनीतिक और वैचारिक ध्रुवीकरण।
– सोशल मीडिया पर भ्रामक सूचनाओं और नफ़रत फैलाने वाली सामग्री का प्रसार।
– संवाद और धैर्य की संस्कृति में कमी।
– धार्मिक, जातीय और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर बढ़ती कटुता।
– आलोचना को व्यक्तिगत या शत्रुतापूर्ण दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति।
समाधान क्या हो सकता है?
असहिष्णुता का समाधान कानून से अधिक समाज की सोच में परिवर्तन से आएगा। परिवारों और विद्यालयों में सहिष्णुता, संवैधानिक मूल्यों और संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देना होगा। राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक नेताओं और मीडिया को भी संयमित भाषा और जिम्मेदार व्यवहार अपनाना चाहिए। सोशल मीडिया का उपयोग अभिव्यक्ति के लिए हो, न कि वैमनस्य फैलाने के लिए।

निष्कर्ष
भारत की वास्तविक पहचान उसकी विविधता और सह-अस्तित्व की संस्कृति है। असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, जबकि असहिष्णुता उसकी कमजोरी। यदि हम विचारों से लड़ने के बजाय विचारों पर संवाद करना सीख जाएँ, तो समाज अधिक मजबूत और लोकतंत्र अधिक परिपक्व होगा। आज आवश्यकता किसी एक विचारधारा की जीत की नहीं, बल्कि भारतीय संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय के आदर्शों को व्यवहार में उतारने की है। यही भारत को एक सशक्त, समावेशी और विकसित राष्ट्र बनाने का सबसे प्रभावी मार्ग है।

