पंचायतों को अधिकार, संसाधन और जवाबदेही मिले, तभी मजबूत होगा जमीनी लोकतंत्र
लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 124वीं जयंती पर नई दिल्ली में परिचर्चा, ग्राम स्वराज और विकेंद्रीकरण पर विशेषज्ञों ने रखे विचार
पंचायतों को अधिकार, संसाधन और जवाबदेही मिले, तभी मजबूत होगा जमीनी लोकतंत्र
लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 124वीं जयंती पर नई दिल्ली में परिचर्चा, ग्राम स्वराज और विकेंद्रीकरण पर विशेषज्ञों ने रखे विचार
जे टी न्यूज,
नई दिल्ली। लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की 124वीं जयंती के अवसर पर पंचायतों को सशक्त बनाने, लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत करने और ग्राम स्वराज की अवधारणा को साकार करने के मुद्दे पर नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर के गुलमोहर हॉल में एक महत्वपूर्ण परिचर्चा आयोजित की गई। प्रयास जेपी सोसाइटी, इंडिया हैबिटेट सेंटर (आईएचसी) और एसोसिएशन ऑफ वॉलंटरी एजेंसिज फॉर रूरल डेवलपमेंट (ए वी ए आर डी) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित परिचर्चा का विषय था— “जमीनी स्तर से लोकतंत्र और विकास: पंचायती राज संस्थाएं और लोकनायक जयप्रकाश नारायण का दृष्टिकोण—नागरिक समाज संगठनों की भूमिका।”
परिचर्चा में वक्ताओं ने जेपी के ग्राम स्वराज, विकेंद्रीकरण और लोकशक्ति संबंधी विचारों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि पंचायतों को केवल प्रशासनिक इकाई बनाकर नहीं, बल्कि स्थानीय स्वशासन की प्रभावी संस्था के रूप में विकसित करना समय की आवश्यकता है। इसके लिए पंचायतों को पर्याप्त अधिकार, वित्तीय संसाधन और प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध कराने के साथ-साथ जनभागीदारी तथा सामाजिक अंकेक्षण को मजबूत करना होगा।
संविधान की 11वीं अनुसूची के 29 विषयों का हस्तांतरण जरूरी
परिचर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि संविधान की 11वीं अनुसूची में शामिल 29 विषयों का पंचायतों को पूर्ण हस्तांतरण किया जाना चाहिए। इसके साथ पंचायतों को पर्याप्त वित्तीय संसाधन, अधिकार और कर्मचारी उपलब्ध कराने की आवश्यकता बताई गई। वक्ताओं ने वर्ष में कम-से-कम छह ग्रामसभा बैठकें आयोजित करने, जनभागीदारी बढ़ाने और सामाजिक अंकेक्षण को प्रभावी बनाने के सुझाव दिए।
पंचायती राज को समवर्ती सूची में शामिल करने, न्याय पंचायतों की स्थापना, निर्वाचित प्रतिनिधियों—विशेषकर महिलाओं—के लिए व्यवस्थित प्रशिक्षण, विकेंद्रीकृत योजना निर्माण, बैंकिंग और सूक्ष्म वित्त तक बेहतर पहुंच तथा स्थानीय संस्थाओं की जवाबदेही मजबूत करने जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में रहे। वक्ताओं ने कहा कि नागरिक समाज संगठनों को पंचायतों का विकल्प बनने के बजाय उनके सहयोगी के रूप में काम करना चाहिए।

ग्राम स्वराज के लिए नागरिक समाज की सक्रिय भूमिका जरूरी
प्रयास जेपी सोसाइटी के संस्थापक एवं मार्गदर्शक अमोद के. कंठ ने कहा कि भारत के बच्चों, युवाओं और महिलाओं के सामने आने वाली अनेक चुनौतियों की जड़ें ग्रामीण भारत में हैं, जहां देश की बड़ी आबादी निवास करती है। उन्होंने कहा कि मजबूत पंचायतों के बिना वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करना कठिन होगा। नागरिक समाज संगठनों को निर्वाचित स्थानीय सरकारों के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि उनके सहयोगी के रूप में कार्य करना चाहिए।
पूर्व केंद्रीय पर्यटन मंत्री सुबोध कांत सहाय ने पंचायती राज व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि कई राज्यों में पंचायतों को अब भी अधिकारों का पूर्ण हस्तांतरण नहीं हुआ है। निर्वाचित प्रतिनिधियों, विशेषकर महिलाओं के प्रशिक्षण, विकेंद्रीकृत योजना निर्माण, बैंकिंग सुविधाओं तक बेहतर पहुंच और जवाबदेही को मजबूत करना आवश्यक है। उन्होंने पंचायत सुधार को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने की बात कही।
गांधी के ग्राम स्वराज और जेपी के विचारों को जोड़ने पर जोर
वरिष्ठ पत्रकार एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ट्रस्ट के अध्यक्ष राम बहादुर राय ने पंचायती राज की अवधारणा को महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के विचारों और जेपी के आह्वान से जोड़ते हुए कहा कि गांवों से जुड़े फैसले वहां के लोगों द्वारा लिए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि 73वें संविधान संशोधन से पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला, लेकिन व्यवहार में वे अब भी अपेक्षित भूमिका से दूर हैं। कई जगह ग्रामसभाएं कागजों तक सीमित रह जाती हैं और पंचायतों के अधिकार सीमित बने हुए हैं।
उन्होंने पंचायतों को समवर्ती सूची में शामिल करने, नियमित ग्रामसभा बैठकें आयोजित करने, जनभागीदारी बढ़ाने और गांवों में न्याय उपलब्ध कराने के लिए न्याय पंचायतों की स्थापना पर विचार करने का सुझाव दिया। उन्होंने राजनीतिक इच्छाशक्ति, सामाजिक अंकेक्षण और नागरिक पहलों को मजबूत करने की आवश्यकता भी रेखांकित की।
नैतिक मूल्यों और नागरिक भागीदारी से ही वास्तविक विकास
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने
कहा कि जेपी की विरासत केवल राजनीतिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध व्यक्ति और समाज में सकारात्मक बदलाव से भी है। उन्होंने कहा कि सरकारें अकेले हर सामाजिक समस्या का समाधान नहीं कर सकतीं। इसके लिए नागरिकों की जिम्मेदारी, नैतिक मूल्य और सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने नैतिक पुनर्जागरण, जिम्मेदार आचरण और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी को वास्तविक विकास का आधार बताया।
पूर्व सांसद एवं शिक्षाविद् प्रो. संजय पासवान ने पंचायतों में मुखियाओं की अनुपस्थिति की बढ़ती प्रवृत्ति और स्थानीय शासन में प्रभावशाली जातियों के वर्चस्व पर चिंता जताई। उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों के नेतृत्व प्रशिक्षण तथा सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका को मजबूत करने पर जोर दिया।
सामूहिक प्रयास से मजबूत होंगी पंचायतें
समापन वक्तव्य में ए वी ए आर डी के महासचिव दुर्गा प्रसाद सिंह ने सामूहिक प्रयासों के माध्यम से जनभागीदारी बढ़ाने और पंचायती राज संस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए साझा मंच विकसित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने जागरूकता बढ़ाने, स्थानीय नेतृत्व को प्रोत्साहित करने और समावेशी ग्रामीण विकास में सामुदायिक भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया।
परिचर्चा में यह भी रेखांकित किया गया कि वर्ष 1988 में स्थापित प्रयास जेपी सोसाइटी वंचित बच्चों, युवाओं और महिलाओं के साथ काम करती है तथा बाल श्रम, बाल विवाह, मानव तस्करी, शिक्षा और बाल संरक्षण जैसे मुद्दों पर सक्रिय है। वहीं, वर्ष 1958 में स्थापित ए वी ए आर डी का लोकनायक जयप्रकाश नारायण से पुराना संबंध रहा है। संस्था ग्रामीण विकास, स्वैच्छिक प्रयासों और ग्राम स्वराज को आगे बढ़ाने के लिए कार्य करती है।
परिचर्चा का निष्कर्ष रहा कि ग्राम स्वराज की अवधारणा आज भी सहभागी, जवाबदेह और जन-केंद्रित शासन के लिए प्रासंगिक है। पंचायतों को वास्तविक अधिकार और संसाधन उपलब्ध कराने, नागरिकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने तथा नागरिक समाज संगठनों के साथ निरंतर सहयोग बढ़ाने से ही समावेशी ग्रामीण विकास और विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को मजबूती मिल सकती है।

