पूरे विश्व में भारत की धर्म व संस्कृति सर्वोतम है:- *डॉ० रीभा तिवारी।* राज कुमार राय/रमेश शंकर झा, बिहार। सब पे नजर, सबकी खबर।

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राज कुमार राय/रमेश शंकर झा, बिहार।

बिहार:- भारतीय जनजीवन में धर्म की महत्ता अपरम्पार है। यह भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का ही नतीजा है कि सब धर्मों को मानने वाले लोग अपने-अपने धर्म को मानते हुए इस देश में भाईचारे की भावना के साथ सदियों से रहते चले आ रहे हैं। यही कारण है कि पूरे विश्व में भारत की धर्म व संस्कृति सर्वोतम है। विभिन्न धर्मों के साथ जुड़े कई पर्व भी हैं, जिसे भारत के कोने कोने में श्रद्धा, भक्ति और धूमधाम से मनाया जाता है। उन्हीं में से एक है नवरात्र। देश भर में आदिशक्ति मां दुर्गा की पूजा-अर्चना और उनकी उपासना का क्रम कल से जारी होगा। हम प्रतिवर्ष मां शक्ति से खुशहाली की कामना करते हैं पर अपने अंतस के दोषों को दूर करने की पहल नहीं करते। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के आरम्भिक नौ दिन मां दुर्गा के नौ रूपों महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती या चामुण्डा, योगमाया, भ्रामरी, रक्तदैतिका, शाकम्भरा, श्रीदुर्गा और चण्डिका के रूप में जाने जाते हैं। मां दुर्गा के समस्त स्वरूपों की उपासना ही नवरात्र कहलाती है।

भारतीय संस्कृति में शारदीय नवरात्र अर्थात मां शक्ति की आराधना का विशेष महत्व है। भारतीय दर्शन में प्रकृति को ही आदिशक्ति माना गया है। मां दुर्गा ही विश्व की आधारभूत शक्ति हैं, जो विष्णु में सात्विक, ब्रह्मा में राजसी और महेश में तामसी शक्ति के रूप में विद्यमान हैं। आद्याशक्ति के रूप में ब्रह्मा की सृष्टि, विष्णु की पोषक तथा महेश की संहारक शक्ति के अलावा सूर्य, अग्नि और वायु में भी दुर्गा अपनी शक्ति का संचार करती हैं। उन्हें ही अम्बिका, महिषासुरमर्दिनी, गौरी, नारायणी, काली आदि नामों से स्मरण किया जाता है। जनश्रुति है कि कलिकाल के पूर्व, द्वापर के अन्त में भगवती योगमाया दुष्ट कंस के हाथों से छूटकर भगवान की सहायता और कलिकाल में भक्तों पर अनुग्रह करने हेतु विविध रूपों व नामों को धारण कर विभिन्न स्थानों पर विराजित हो गर्इं। उनके अवतरण का मुख्य उद्देश्य समाज व राष्ट्र का अनभल करने वाली आसुरी शक्तियों का विनाश कर जन-जन के हृदय में शान्ति, करुणा, पवित्रता, विद्या, बुद्धि, क्षमा, धैर्य और अक्रोध रूप धर्म को स्थापित करना है। मां दुर्गा की कृपा से आसुरी शक्तियों का नाश तो होता ही है, विपदाएं भी टल जाती हैं और मानव के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। प्राचीन परम्परा के अनुसार नवरात्र में दुर्गा ही नहीं, महालक्ष्मी एवं मां सरस्वती की भी प्रतिमाओं की अस्थायी प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है और अलौकिक शक्ति को जीवन्त रूप प्रदान किया जाता है। व्रत रखकर षोडशोपचार से पूजन करके नैवेद्य अर्पित किया जाता है और उक्त तीनों देवियों का आह्वान कर शक्ति, धन एवं ज्ञान की अधिष्ठात्री के रूप में उन्हें प्रसन्न करने हेतु सभी तरह के जतन किए जाते हैं।


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नवरात्र में अष्टमी एवं नवमी तिथि को महागौरी एवं सिद्धिदात्री रूप की उपासना की जाती है। नवमी को सिद्धिदात्री माता से सौभाग्य, आरोग्य और कल्याण की कामना हरेक साधक के मन में होती है। दुर्गा जी दुर्गुणनाशिनी हैं, उन्हें सिंह पर सवार अष्टभुजाधारिणी रूप में दर्शाया जाता है। उनकी अष्ट भुजाएं अष्ट शक्तियों का प्रतीक हैं। शक्ति सर्वोपरि है, उसके बिना कुछ भी सम्भव नहीं। वस्तुत: शक्ति आदि-अनादि, सर्वज्ञ, अनन्त और सर्वत्र है। यह मनुष्य की आस्था पर निर्भर है कि वह उन्हें किस रूप में स्वीकारे और किस विधि से प्रसन्न करे। दरअसल, जब हम अपने जीवन में काम-क्रोध, ईर्ष्या-द्वेष, हिंसा, लोभ आदि विकारों और दुगुर्णों से मुक्त होंगे तभी मां शक्ति प्रसन्न होंगी और हमें अष्ट शक्ति और नौ निधियों का वरदान प्राप्त हो सकेगा। मनुष्य जब तक अपने अंतस के विकारों को दूर नहीं करेगा तब तक पूजा-अर्चना, नवरात्र उपासना और जागरण सब के सब व्यर्थ हैं। भारतीय दर्शन में नौ निधियों को नवदुर्गा के रूप में चित्रित किया गया है। अष्ट शक्तियों और नौ निधियों को देवी के रूप में प्रतिष्ठित करने का आशय यह है कि जैसे नारी स्वभाव से कोमल व चंचल होती है अत: उसे वश में करना कठिन है, उसी प्रकार धन-वैभव, बल-बुद्धि, यश आदि निधियों पर अधिकार कर पाना कठिन है क्योंकि ये सभी नारी के समान स्वभाव वाले अर्थात कोमल, चंचल व अस्थिर होते हैं। उपासक अत्यंत श्रद्धापूर्वक नवदेवियों की पूजा-अर्चना कर वरदानस्वरूप समस्त निधियों या शक्ति की प्राप्ति तभी कर सकता है जब उसके संस्कारों में सच्ची निष्ठा, पवित्रता, कोमलता एवं दिव्यता समाहित हो। नवरात्र का कालखण्ड अपनी आन्तरिक शक्ति की पहचान, परिवार व समाज में स्त्री के सम्मान तथा अपने आत्मिक बल के विकास हेतु प्रेरणा देता है। यह सोचने की बात है कि भारतीय संस्कृति में स्त्री देवी के रूप में पूजी जाती है और अधिकतर पुरुष वर्ग ही उसे पूजता है किन्तु देवी स्वरूपा स्त्री अपने घर, परिवार, समाज में उसी की हिंसा, उपेक्षा और यातनाओं का शिकार है। वर्तमान परिवेश में नारी दया, त्याग, करुणा, ममता आदि की प्रतिमा मात्र नहीं है, वह घर-बाहर के दोहरे दायित्व का भलीभांति निर्वाह करती हुई पुरुषों से कहीं आगे निकल चुकी है। यह सर्वविदित है कि वह भी देवी की तरह मां के रूप में सृजन, पालन और संरक्षण का महत्वपूर्ण दायित्व निभाती है, ऐसे में वह भी सम्मान, विश्वास, आदर और स्नेह की अधिकारिणी है। नवरात्र सिर्फ उपासना का ही पर्व नहीं है, इससे हमें नसीहत लेने की दरकार है। विवेक, अज्ञान और विकारों में लिप्त समाज जब तक जीवन की अधिष्ठात्री स्त्री स्वरूपा देवी की अवहेलना और अनादर करता रहेगा, वह सुखानुभूति नहीं कर सकेगा। शक्ति उपासकों को आडम्बर से परे अपने स्थायी विकारों और दुगुर्णों से मुक्त होने का संकल्प लेना चाहिए। यदि इंसान अपने अंंतस के विकारों को दूर करने का मन बना ले तो वह स्वयं शक्तिमान तो होगा ही उसे कभी किसी शक्ति की याचना नहीं करनी होगी।

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