70 वर्षों में कारपोरेट और मनुवाद के शिकार सबसे अधिक आदिवासी रहे हैं: मीना

70 वर्षों में कारपोरेट और मनुवाद के शिकार सबसे अधिक आदिवासी रहे हैं: मीना


जेटी न्यूज/अरुण नारायण
बहुजन दावेदारी सम्मेलन
भाग: 3
पिछले 70 वर्षोे में मनुवाद और काॅरपोरेट के सामूहिक हमले के सबसे अधिक शिकार यहां के आदिवासी हुए हैं। जब संविधान सभा का निर्माण हो रहा था तो हमारे पुरखे लड़ाका जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा के समक्ष यह उम्मीद जताई थी कि आदिवासियों के साथ बेहतर सलूक किया जाएगा। उन्हें भी बराबरी का हक-हुकूक दिया जाएगा लेकिन यह सम्मान उन्हें नहीं मिला।’

ये बातें दिल्ली विश्वविद्यालय से आये जितेंद्र मीना ने पिछले दिनों पटना के आई.एम.ए हाॅल में कहीं। सामाजिक न्याय आंदोलन बिहार की पहल पर आयोजित यह कार्यक्रम चैतरफा बढ़ते मनुवादी, सांप्रदायिक हमले व काॅरपोरेट कब्जा के खिलाफ बहुजन दावेदारी सम्मेलन के रूप में आहूत की गई थी।

बिहार सहित कई राज्यों से आये इस सम्मेलन को पत्रकार उर्मिलेश पूर्व राज्यसभा सदस्य अली अनवर अंसारी, चर्चित पत्रकार अनिल चमड़िया, आंदोलनकारी प्रो लक्ष्मण यादव, सिद्धार्थ रामू, प्रो. शिवजतन ठाकुर, वाल्मीकि प्रसाद, डाॅ. पी.एन.पी.पाल, जितेंद्र मीणा, सुमित चैहान, बलवंत यादव, राजीव यादव, अयूब राईन, विजय कुमार चैधरी, आईडी पासवान, नवीन प्रजापति, रामानंद पासवान, केदार पासवान, राजेंद्र प्रसाद, और डाॅ विलक्षण रविदास ने भी संबोधित किया।

वक्ताओं ने देशभर में बढ़ते भगवा हमले, आदिवासियों के विस्थापित होने और बहुजन राजनीति के ए टू जेड में तब्दील होने के कारणों पर गहराई से चिंतन मनन किया।

 

जितेंद्र मीना ने कहा कि मिक्स इकोनाॅमी का आइडिया भी ड्राॅप कर दिया गया। मोदी सरकार ने प्राइवेट इकोनाॅमी के रास्ते खोल दिये। जिसके फलस्वरूप अर्थव्यवस्था में सरकार की हिस्सेदारी कम कर दी गई सिर्फ एडमिस्ट्रेशन के जरिये वह काम हो रहा है।

सबको प्राइवेट हाथों में सौंप दिया गया।
जितेंद्र ने कहा कि जल, जंगल जमीन से आदिवासियों को बेदखल करने की लड़ाइयां इस देश के कई हिस्सों में बदस्तूर जारी हैं लेकिन वह यहां की मीडिया के लिए खबर नहीं है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में देश में 193 कोयला खदानें चल रही हैं।

देश में हजारों लाखों हेक्टेयर खादानें हैं जिसमें से 55 खदानों को मंजूरी दी गई है। इसमें से 80 से 85 प्रतिशत आदिवासी इलाके हैं। इसमें हर तरह के नियम कानूनों की अवमानना की गई है।

पिछले 20 सालों में 77 लाख लोगों को अपनी जमीन से विस्थापित किया गया जिसमें 60 प्रतिशत आदिवासी हैं। जितेंद्र ने माना कि शिक्षा का निजीकरण करके सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि जिसकी हैसियत है वे शिक्षा लें।

इस शिक्षा नीति के तहत आदिवासी पहले ही बाहर कर दिये गए। वे कर्ज लेकर शिक्षा के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं? ऐसे में सहज सवाल है कि आदिवासी पहले अपना अस्तित्व बचाएगा या शिक्षा की सोचेगा?

सैन्यीकरण से चर्चा करते हुए जितेंद्र ने बतलाया कि अपने देश की बजट का 16 प्रतिशत सुरक्षा पर खर्च हो रहा है। उन्होंने कहा कि पिछले 5-7 सालों में पुलिस कैम्प 80 प्रतिशत आदिवासी इलाकों में खुले हैं।

एक संघर्ष पिछले 17 मई से छतीसगढ़ में चल रहा है। वहां आदिवासियों के 1 लाख 74 हेक्टेयर के जंगल अडानी को दे दिया गया। सरकार का नियम है कि इन इलाकों में किसी तरह के जंगल को नही काटा जाएगा। इस आंदोलन के साल भर होने को है वहां 4 आदिवासियों की जान अब तक जा चुकी हैं, लेकिन यह यहां की मीडिया के लिए खबर नहीं है।

गुजरात की चर्चा करते हुए जितेंद्र ने बतलाया कि वहां नर्मदा तापी लिंक परियोजना में आदिवासियों की 8 लाख हेक्टेयर जमीन को छिना जा रहा है। एक स्टैच्यू निर्माण के लिए 50-60 गांवों को रिप्लेस किया गया। यही हाल उड़िसा का है।

वहां 93 से ही आदिवासियों का आंदोलन चल रहा है। उन्होंने कहा कि यह देश सामूहिक आत्महत्या की तरफ बढ़ रहा है इसे हम बहुजन ही सामूहिक आत्महत्या से बचा सकते हैं।

उतर प्रदेश से आये बलवंत यादव ने बतलाया कि भारत का लोकतंत्र लेटरर इंट्री के द्वारा जनता के दुश्मनों के कब्जे में चला गया है। आज दोस्त दुश्मन की पहचान जिसे हम भाजपा, राजद के रूप में समझ रहे हैं दरअसल वह नहीं है उसके पीछे छिपी वह काॅरपोरेट शक्तियां हैं जिनके चंगुल में भारत की राजनीतिक पार्टियां कैद हैं।

प्रतीकात्मक दुश्मन खड़ा करके वास्तविक दुश्मन को छिपाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि आर्थिक संसाधन इस देश के सभी लोगों को बुनियादी तौर पर तो उपलब्ध हों।

बलवंत ने तेजी से निजीकरण में प्रवेश करते देश की नाजुक हालात को लक्षित कर एक भोजपुर गीत-‘नोट से वोट किनाता जी, यही लोकतंत्र कहाता जी’ सुनाया जिसे बहुजन दावेदारी सम्मेलन में आये साथियों ने करतल ध्वनि से स्वागत किया।

दरभंगा से आये लेखक अयूब राईन ने कहा कि पिछले 20-25 वर्षों से पसमांदा आंदोलन इस देश में चल रहा है, लेकिन इसके बावजूद इन्हें सिस्टम में जो हिस्सेदारी मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली।

उन्होंने कहा कि हिन्दू समाज की तरह ही 85 प्रतिशत मुस्लिम बहुजन भी हाशिये पर हैं आज जरूरत इस बात की है कि हिन्दू मुस्लिम दोनों बहुजन तबकों की एकता कायम हो और हिस्सेदारी के सवाल को प्रमुखता के साथ आंदोलन का रूप दिया जाए।

उन्होंने कहा कि रामनवमी की जुलूस में हड़बोंग करने वाले कौन लोग होते हैं, ये वही बहुजन हैं जो सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा गुमराह किये जाते रहे हैं।
श्री रामानंद पासवान ने कहा कि आज देश विकट परिस्थिति में चला गया है।

इससे मुक्ति तभी संभव है जब यहां बुद्धिजीवियों और मजदूर किसानों की व्यापक एकता बनाई जाए। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण से कार्यकर्ता पैदा होता है लेकिन यह आज सिरे से गायब है यह अकारण नहीं कि हमारे नये लोग सामाजिक न्याय के क्षत्रपों के झांसे से बाहर नहीं निकल पा रहे।

अरवल से आये सुबोध यादव ने कहा कि सामाजिक न्याय आंदोलन बिहार के साथियों की बहुजन दावेदारी का यह मुहिम 23 मार्च से भागलपुर से शुरू हुआ है और चाहते हैं कि जगदेव प्रसाद की शहादत तिथि तक बिहार में इसके कम से कम 50 कार्यक्रम और हों।

 

वाल्मीकि प्रसाद ने अपसब मोर्चा का दृष्टि पत्र उपस्थित वक्तओं से लोकार्पित करवाया और कहा कि इस देश के 5 चोर हैं जो इस समाज को विनष्ट करने में लगे हैं। हमारा पहला दुश्मन आर.एस.एस है दूसरा भाजपा और तीसरा सुप्रीम कोर्ट है। चैथा और पांचवा दुष्मन नरेंद्र मोदी और अमित शाह है। उन्होंने कहा कि ये ऐसी शक्तियां हैं जो संविधान को नष्ट करने के हर कुचक्र को संभव करती रही हैं।

झारखंड से आये आईडी पासवान ने कहा कि जो व्यक्ति समाज अपने प्रतीक का सम्मान करना नहीं जानता, वह समाज कभी सुरक्षित नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि मनुवाद की सांप्रदायिकता कोई नई बात नहीं है वह जन्मजात है।

उन्होंने कहा कि आज शूद्रों को गजालत से बाबा साहब का संघर्ष, आदर्श और उद्वेश्य ही बाहर निकाल सकता है। एक पुष्यमित्र ने पूरे बौद्ध संस्कृति को मिटा दिया, एक विभीषण ने दलितों के संरक्षक रावण का नाश कर दिया हमें इन खलनायकों को पहचानने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि 2024 में अगर यह सांप्रदायिकता जीत गई तो हमारा संविधान भी नहीं रहेगा। क्योंकि उनका तो एजेंडा ही है सारी संपति प्राइवेट कर दो और दलितों के गांव में मंदिर बनवा दो।

 

इस मौके पर सभा को इंजीनियर राजेंद्र प्रसाद, विलक्षण रविदास, हरिश्चंद्र आदि वक्ताओं ने भी संबोधित किया। सभा में मौजूद लोगों में महेंद्र सुमन, रंजन कुमार गुप्ता, ब्रजनंदन यादव, इंजीनियर नागेंद्र यादव, सुनील, गौतम आनंद, मीरा यादव, विष्णुदेव मोची, ललित यादव, उत्पल बल्लभ, सूरज यादव, रंजन यादव, मृणाल, सोनम राव आदि मुख्य थे।

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