राजनीति का खेल निराला

राजनीति का खेल निराला
जे टी न्यूज़, डॉक्टर सोनी कुमारी

पत्रकार( मोतिहारी)

राजनीति का खेल निराला
कल का डाकू
आज बना रखवाला
हाथ जोड़ विनती करता है।
तुम मुझे वोट दे मैं
खोल दूंगा तेरे भाग्य
का ताला।
: राजनीति का….
कल का डाकू ….
फँस जाती है भोली जनता
उन पाखंडियों की बातों में।
दे देती है कीमती वोट अपना
वो बातों ही बातों में।
राजनीति का खेल…
कल का डाकू …
कुर्सी पा कर ये नेता
इतने मगरूर हो जाते हैं
याद भी नहीं रहता कि
हमने किये कुछ वादे हैं।
राजनीति का खेल …
कल का डाकू ….
बड़ी-बड़ी बातें हैं उनकी
है बड़े लंबे चौड़े भाषण।
मगर सच होता नहीं कुछ भी
यह सब कहने की बातें हैं।
राजनीति का…


कल का डाकू बना..
कितनी भोली लगती है सूरत
जब वोट मांगने आते हैं।
जब जीत जाते हैं इलेक्शन में
वो आँख फेर चले जाते हैं।
राजनीति का खेल. ..
कल का डाकू बना. .. ..
वो सत्ता की चाह में
तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं
मर्डर दंगा और कभी तो
बूथ कैपचरिंग भी करवाते हैं।
राजनीति का खेल ..
कल का डाकू…..
पढ़ा है हमने प्रजातंत्र में
प्रजा का शासन होता है।
प्रजा की इच्छा के विरुद्ध
कोई भी काम ना पूरा होता है।
राजनीति का खेल ….
कल का डाकू बना..
लेकिन आजकल प्रजातंत्र के
अर्थ ही बदल गए हैं।
जिसकी लाठी उसकी भैंस
कहावत चरितार्थ होने लगे हैं।
राजनीति का खेल…
कल का डाकू .
दबा दिया जाता उनकी बातों को सच बोलना जो चाहते हैं।
मिटा दिया जाता है उनको
जो किसी के खिलाफ मोर्चा बनाते हैं।


राजनीति का खेल…..
कल का डाकू ….
झूठी बातों से कब तक
भोली जनता को बहलाओगे
सच सामने आएगा तो
एक दिन बहुत पछताओगे।
राजनीति का खेल …
कल का डाकू …..
नेताओं के तन पर उजले वस्त्र सुशोभित होते हैं
असंख्य दाग हैं फिर भी
वह खुद को पवित्र कहते हैं।
राजनीति का खेल …..
कल का डाकू बना …..

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