एन डी ए सरकार की अदूरदर्शी नीतियों के कारण हमारा बिहार कंगाल होने के कगार पर – तेजस्वी यादव
एन डी ए सरकार की अदूरदर्शी नीतियों के कारण हमारा बिहार कंगाल होने के कगार पर – तेजस्वी यादव

जे टी न्यूज, पटना: हम सभी के लिए अत्यंत चिंता का विषय है कि एनडीए की दिवालिया राजनीति और दिवालिए नेतृत्व के कारण प्रदेश की बिगड़ चुकी वित्तीय स्थिति, घटता राजस्व, बढ़ता राजकोषीय घाटा, अत्यधिक कर्ज, भारी ब्याज अदायगी तथा खोखली व अदूरदर्शी नीतियों के कारण हमारा बिहार कंगाल होने के कगार पर है। खज़ाना खाली होने के कारण प्रदेश में अराजकत वित्तीय हालात है।
नौसिखिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में सरकार का बजटीय प्रबंधन इतना बुरा, वित्तीय स्थिति इतनी बदतर और परिस्थितियां इतनी भयावह है कि वित्तीय वर्ष 𝟐𝟎𝟐𝟔-𝟐𝟕 के मात्र तीन महीने ही बीते है और सामान्य मासिक पेंशन दिए जाने वाले जैसे रूटीन भुगतान और कार्यों के लिए भी आकस्मिक निधि (𝐂𝐨𝐧𝐭𝐢𝐧𝐠𝐞𝐧𝐜𝐲 𝐅𝐮𝐧𝐝) से 𝟑𝟔𝟔𝟐 करोड़ रुपए की निकासी करनी पड़ रही है।
सरकार को वित्तीय संकट की सच्चाई स्वीकार कर, आम जनता को गुमराह करने के बदले राज्यवासियों को स्पष्टता से बताना चाहिए कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई कि रूटीन भुगतान के लिए नियमित बजटीय व्यवस्था की बजाय आकस्मिकता निधि का सहारा लेना पड़ रहा है ?
मेरे तथ्यात्मक, वास्तविक, तर्कपूर्ण सवालों का जवाब देने की बजाय एनडीए सरकार भ्रामक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बचकाने कार्य कर रही है।

सरकार में बैठे लोगों को आकस्मिकता निधि के संबंध में सर्वप्रथम संविधान के अनुच्छेद 𝟐𝟔𝟕(𝟏) एवं (𝟐) में अंकित प्रावधानों का अवलोकन करना उचित होगा। संविधान के अनुसार, “
संवैधानिक प्रावधानों के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि अर्थात् नार्मल और रूटीन मामलों में इस फंड का इस्तेमाल नहीं किया जाना है। राज्य में अचानक आए किसी संकट से निपटने के लिए राज्यपाल इस निधि से अग्रिम राशि की मंजूरी दे सकते हैं
ऐसी स्थिति में सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि सामाजिक सुरक्षा पेंशन जो दशकों से नियमित तरीके से हर महीने लाभुक के खाते में जाती रही है, अब बिना व्यवस्था परिवर्तन ऐसी क्या विचित्र वित्तीय परिस्थिति उत्पन्न हो गई कि सामान्य मासिक पेंशन दिए जाने के लिए भी आकस्मिक निधि का इस्तेमाल किया गया। अगर सरकार को सामान्य और नियमित खर्च के लिए भी आकस्मिक निधि का उपयोग करना पड़ रहा है तो फिर विकास कार्यों और अन्य परियोजनाओं के लिए धनराशि कहाँ से आएगी?
क्या पेंशन कोई आकस्मिक खर्च है? पेंशनधारक और हमारे सम्मानित बुजुर्ग और माता-बहने आपदा नहीं हो सकते जिनके लिए आपको आपदा राशि से भुगतान करना पड़े? सरकार इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की जगह मामले को दिग्भ्रमित करने का प्रयास कर रही है।
बिहार सरकार द्वारा इसे बजटीय प्रबंधन मात्र बताकर इसके सैद्धांतिक पक्ष और मूल कारण बताने से बचने का प्रयास किया गया है। सरकार की आर्थिक स्थिति दयनीय है इसलिए पब्लिक डोमेन में सरकार इसे स्वीकार करने से डर रही है।
बिहार के वित्तीय हालात को लेकर जो संकेत मिल रहे हैं वो चिंताजनक है। वित्तीय वर्ष 𝟐𝟔-𝟐𝟕 बजट में बताया गया है कि वर्ष 𝟐𝟓-𝟐𝟔 में बिहार का राजकोषीय घाटा (𝐅𝐢𝐬𝐜𝐚𝐥 𝐃𝐞𝐟𝐢𝐜𝐢𝐭) 𝟏𝟏.𝟖% के चिंताजनक स्तर पर पहुँच चुका है। इस संबंध में यह स्पष्ट करना जरूरी है की 𝐅𝐑𝐁𝐌 𝐀𝐜𝐭 (राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम) के तहत राजकोषीय घाटा 𝟑% से अधिक नहीं होना चाहिए परंतु बिहार सरकार का राजकोषीय घाटा लक्ष्य के तीन से पाँच गुना तक अधिक हो रहा है।
बिहार में वित्तीय प्रबंधन को लेकर सवाल पहले से ही उठ रहे हैं, लेकिन अब एक ऐसा प्रावधान सामने आया है जो केवल वित्तीय अनुशासन ही नहीं बल्कि प्रशासनिक विवेक पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
कुछ माह पूर्व 𝐍𝐃𝐀 सरकार एक संशोधन लेकर आयी है , जिसके तहत प्रावधान किया गया कि बिहार आकस्मिकता निधि का आकार किसी भी वित्त वर्ष में उस वर्ष के बजटीय व्यय के 𝟏𝟎% तक बढ़ाया जा सकता है।
पहले बिहार आकस्मिकता निधि का आकार 𝟑𝟓𝟎 करोड़ रुपये था। सामान्य समझ यही कहती है कि आकस्मिकता निधि का उद्देश्य सीमित होना चाहिए क्योंकि इसका इस्तेमाल केवल अप्रत्याशित और आपात परिस्थितियों में किया जाना है लेकिन बिहार सरकार ने ऐसा प्रावधान कर दिया है कि आवश्यकता पड़ने पर इस निधि को हजारों करोड़ रुपये तक बढ़ाया जा सकता है और सदन को अंधेरे में रखकर मनमाने तरीके से खर्च किया जा सकता है।

इसे ऐसे समझिए कि वित्त वर्ष 𝟐𝟎𝟐𝟔-𝟐𝟕 के कुल अनुमानित बजटीय व्यय 𝟑,𝟐𝟒,𝟗𝟐𝟓 करोड़ रुपये का 𝟏𝟎% अर्थात् 𝟑𝟐,𝟒𝟗𝟐 करोड़ रुपये आकस्मिकता निधि के रूप में उपलब्ध कराया जा सकता है जबकि इस समय भारत की राष्ट्रीय आकस्मिकता निधि का आकार 𝟑𝟎,𝟎𝟎𝟎 करोड़ रुपए है।
दूसरे शब्दों में कहें, तो बिहार सरकार ने ऐसा प्रावधान बना लिया है, जिसके तहत बिहार की आकस्मिकता निधि का आकार पूरे देश की आकस्मिकता निधि से भी बड़ा हो सकता है। यहाँ सवाल केवल आँकड़ों का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जो इस तरह के प्रावधान के पीछे काम कर रही है।
आकस्मिकता निधि का मूल उद्देश्य क्या है? संविधान में इसका विचार इसलिए रखा गया था ताकि अचानक उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों में सरकार तत्काल खर्च कर सके। यह कोई समानांतर बजट नहीं है। यह कोई दूसरा खजाना नहीं है। यह कोई ऐसा साधन नहीं है, जिसके जरिए सामान्य वित्तीय प्रबंधन की खामियों और असफल नीतियों को ढका जा सके?
सोचिए, जिस राज्य का राजकोषीय घाटा लगातार लक्ष्य से कई गुना ऊपर जा रहा हो, जिस राज्य को पेंशन जैसे नियमित भुगतान के लिए भी आकस्मिकता निधि का सहारा लेना पड़ रहा हो, उसी राज्य की सरकार अपने हाथ में 𝟑𝟐 हजार करोड़ रुपए से अधिक की आकस्मिक निधि रखने की शक्ति हासिल कर लेती है।
सरकार कह सकती है कि यह केवल एक सक्षमकारी प्रावधान है और इसका मतलब यह नहीं कि पूरी राशि का उपयोग किया जाएगा लेकिन फिर सवाल यह है कि ऐसी व्यवस्था की जरूरत ही क्यों पड़ी?
और सबसे दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रीय आकस्मिकता निधि राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में आती है, जबकि राज्य की आकस्मिकता निधि राज्यपाल के माध्यम से संचालित होती है। परिणाम यह है कि बिहार सरकार ने ऐसा कानूनी ढाँचा तैयार कर लिया है, जिसमें एक राज्यपाल के नियंत्रण वाली आकस्मिकता निधि का आकार राष्ट्रपति के नियंत्रण वाली राष्ट्रीय आकस्मिकता निधि से भी ज़्यादा हो सकता है
यह बताता है कि बिहार में आकस्मिकता निधि की अवधारणा कितनी असामान्य दिशा में ले जाई गयी है।

वास्तव में किसी भी लोकतांत्रिक वित्तीय व्यवस्था का आधार पारदर्शिता और विधायिका की निगरानी होता है। बजट इसलिए बनाया जाता है, ताकि जनता और विधानसभा को पता रहे कि पैसा कहाँ से आयेगा और कहाँ खर्च होगा? बिहार सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर ऐसी कौन सी संभावित परिस्थितियाँ हैं जिनके लिए 𝟑𝟓𝟎 करोड़ रुपये की निधि को बढ़ाकर 𝟑𝟐,𝟖𝟒𝟐 करोड़ रुपये तक ले जाने की शक्ति अपने पास रखी गयी है? क्या डबल इंजन सरकार में बिहार ऐसी आपदा का सामना कर रहा है जिसके लिए राष्ट्रीय आकस्मिकता निधि से भी बड़ी व्यवस्था की जरूरत पड़े? यदि नहीं, तो फिर इस प्रावधान का औचित्य क्या है।
वित्तीय प्रबंधन में एक सिद्धांत होता है कि असाधारण शक्तियाँ केवल असाधारण परिस्थितियों के लिए होनी चाहिए लेकिन बिहार में ऐसा लगता है कि पहले शक्ति हासिल कर ली गयी है और बाद में उसके औचित्य की तलाश की जा रही है।
आशा है एनडीए का नौसिखिया और अनाड़ी नेतृत्व मेरे सवालों का जवाब देगा।
