आरपीसीएयू को हाईकोर्ट से झटका: ट्रांसफर अपील खारिज
कुलपति की स्थानांतरण शक्ति पर पटना हाईकोर्ट की अहम टिप्पणीबाद में मिला अधिकार पुराने आदेश को वैध नहीं कर सकता
आरपीसीएयू को हाईकोर्ट से झटका: ट्रांसफर अपील खारिज
कुलपति की स्थानांतरण शक्ति पर पटना हाईकोर्ट की अहम टिप्पणीबाद में मिला अधिकार पुराने आदेश को वैध नहीं कर सकता

जे टी न्यूज, पटना/पूसा:
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा को स्थानांतरण विवाद में पटना हाईकोर्ट से बड़ा कानूनी झटका लगा है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने विश्वविद्यालय की Letters Patent Appeal (LPA) No. 1054 of 2025 खारिज करते हुए एकलपीठ के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें सहायक प्राध्यापक डॉ. गीता कुमारी के स्थानांतरण और कार्यमुक्ति आदेश को निरस्त किया गया था। फैसला 8 सितंबर 2026 को सुनाया गया।
विवाद का केंद्र यह था कि 18 मई 2025 को डॉ. गीता कुमारी का माइक्रोबायोलॉजी विभाग से केला अनुसंधान केंद्र, गोरौल, वैशाली स्थानांतरण करने का अधिकार उस समय विश्वविद्यालय के कुलपति के पास था या नहीं। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद कहा कि विश्वविद्यालय के बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट ने कुलपति को कर्मचारियों के स्थानांतरण की शक्ति प्रदान नहीं की थी।
क्या था पूरा मामला?

डॉ. गीता कुमारी आरपीसीएयू के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत थीं। विश्वविद्यालय की ओर से ऑफिस ऑर्डर संख्या 76, दिनांक 18 मई 2025 के जरिए उनका स्थानांतरण केला अनुसंधान केंद्र, गोरौल, वैशाली कर दिया गया। इसके बाद 28 मई 2025 को उन्हें विभाग से कार्यमुक्त कर दिया गया। रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने 29 मई 2025 को गोरौल स्थित केंद्र में योगदान भी दिया था।
डॉ. गीता कुमारी ने स्थानांतरण आदेश को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी। 11 सितंबर 2025 को एकलपीठ ने स्थानांतरण और कार्यमुक्ति आदेश को रद्द करते हुए विश्वविद्यालय को उन्हें माइक्रोबायोलॉजी विभाग में सहायक प्राध्यापक के उनके पूर्व पद पर वापस लेकर योगदान स्वीकार करने का निर्देश दिया।
इसके बाद विश्वविद्यालय ने इस फैसले के खिलाफ खंडपीठ में एलपीए दायर की।
विश्वविद्यालय ने किस आधार पर बचाव किया?

विश्वविद्यालय की ओर से दलील दी गई कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 2016 की धारा 12(2) के तहत कुलपति विश्वविद्यालय के प्रधान कार्यकारी एवं शैक्षणिक अधिकारी हैं। उन्हें विश्वविद्यालय के मामलों पर सामान्य पर्यवेक्षण और नियंत्रण की शक्ति प्राप्त है।
विश्वविद्यालय का तर्क था कि उस समय शिक्षकों और कर्मचारियों के स्थानांतरण के संबंध में अधिनियम या Statutes में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। इसलिए कुलपति ने अपने सामान्य पर्यवेक्षण और नियंत्रण की शक्ति के तहत विश्वविद्यालय के हित और केला अनुसंधान केंद्र के सुचारु संचालन के लिए स्थानांतरण आदेश जारी किया था।
विश्वविद्यालय ने यह भी तर्क दिया कि स्थानांतरण दंडात्मक नहीं था और इससे डॉ. गीता कुमारी के वेतन या सेवा शर्तों में कोई प्रतिकूल बदलाव नहीं हुआ।
हाईकोर्ट ने माना—बोर्ड ने कुलपति को ट्रांसफर की शक्ति नहीं दी थी
खंडपीठ ने विश्वविद्यालय के Statutes के Section 12(4)(xv) का उल्लेख किया। इसके तहत बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट अपनी शक्तियों को कुलपति, डीन, निदेशक, रजिस्ट्रार या अन्य अधिकारियों को प्रत्यायोजित कर सकता है।

लेकिन इस मामले में अदालत ने रिकॉर्ड पर पाया कि बोर्ड ने कुलपति को कर्मचारियों के स्थानांतरण की शक्ति प्रदान नहीं की थी।
यही बिंदु विश्वविद्यालय की अपील के लिए निर्णायक साबित हुआ।
20 दिसंबर 2025 की अधिसूचना बनी सबसे अहम कड़ी
मामले में 20 दिसंबर 2025 की Gazette Notification विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। अदालत के अनुसार इस अधिसूचना के जरिए पहली बार Statute में Section 3(7) जोड़ा गया, जिसके तहत कुलपति को विश्वविद्यालय के कर्मचारियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने की शक्ति दी गई। अधिसूचना पर कुलपति के हस्ताक्षर थे और इसे विश्वविद्यालय के Visitor की स्वीकृति प्राप्त थी।
लेकिन जिस स्थानांतरण को चुनौती दी गई थी, वह 18 मई 2025 का था—यानी नई अधिसूचना से करीब सात महीने पहले।
हाईकोर्ट ने इस अंतर को निर्णायक माना और साफ शब्दों में कहा कि 20 दिसंबर 2025 की अधिसूचना से कुलपति को मिली शक्ति 18 मई 2025 को पारित स्थानांतरण आदेश को वैध नहीं बना सकती।
‘बाद में मिला अधिकार’ पुराने आदेश का आधार नहीं बन सकता
फैसले का व्यापक प्रशासनिक महत्व इसी बिंदु में है। अदालत ने विश्वविद्यालय की ओर से प्रस्तुत दलीलों को स्वीकार नहीं किया और एकलपीठ के 11 सितंबर 2025 के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई।
अदालत ने अंततः कहा कि एलपीए में कोई मेरिट नहीं है और उसे खारिज किया जाता है। लंबित आवेदन भी निस्तारित कर दिए गए।
फैसले का महत्व
यह फैसला केवल एक कर्मचारी के स्थानांतरण विवाद तक सीमित नहीं है। इसमें विश्वविद्यालयों में वैधानिक अधिकार, प्रशासनिक शक्ति और उसके प्रत्यायोजन के बीच अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है।
मामले में विश्वविद्यालय ने कुलपति की general supervision and control की शक्ति को स्थानांतरण अधिकार के आधार के रूप में पेश किया था। लेकिन अदालत ने रिकॉर्ड में पाया कि स्थानांतरण की विशिष्ट शक्ति पहले से बोर्ड द्वारा कुलपति को प्रत्यायोजित नहीं थी और बाद में, 20 दिसंबर 2025 को, Statute में अलग से यह शक्ति जोड़ी गई।
इस तरह आरपीसीएयू की एलपीए खारिज होने के साथ डॉ. गीता कुमारी के पक्ष में एकलपीठ का आदेश कायम रहा।

