तरक्की के बीच रुपया क्यों कमजोर पड़ रहा है? प्रधानमंत्री की अपील आखिर आम लोगों के लिए क्या मायने रखती है? – डॉ. विजय कुमार गुप्ता वीमेंस कॉलेज, समस्तीपुर
तरक्की के बीच रुपया क्यों कमजोर पड़ रहा है?
प्रधानमंत्री की अपील आखिर आम लोगों के लिए क्या मायने रखती है? – डॉ. विजय कुमार गुप्ता वीमेंस कॉलेज, समस्तीपुर

जे टी न्यूज़, समस्तीपुर : भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से उभरती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और “विकसित भारत” का सपना धीरे-धीरे वास्तविकता का रूप लेता दिखाई दे रहा है। निवेश, उपभोग और तकनीकी विस्तार ने देश की आर्थिक गति को नई ऊर्जा दी है। किंतु इस चमकती तस्वीर के पीछे एक गंभीर चिंता भी लगातार गहराती जा रही है—रुपया कमजोर पड़ रहा है, डॉलर लगातार महंगा होता जा रहा है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि तेज़ आर्थिक विकास के बावजूद यह स्थिति क्यों बन रही है? साथ ही, हाल के दिनों में प्रधानमंत्री द्वारा तेल बचाने, स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने और अनावश्यक विदेशी खर्च कम करने की जो अपील की गई है, उसका आम नागरिकों के जीवन और देश की अर्थव्यवस्था से क्या संबंध है? दरअसल, भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। भारत में विकास का बड़ा आधार लोगों का खर्चा है। जब लोग गाड़ी खरीदते हैं, मोबाइल लेते हैं, ज्यादा बिजली और पेट्रोल इस्तेमाल करते हैं, तो बाजार चलता है और अर्थव्यवस्था बढ़ती है। लेकिन समस्या यह है कि इन चीजों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात होता है। पेट्रोल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य तेल, सोना और कई कच्चे माल के लिए भारत को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है।
यही कारण है कि जैसे-जैसे देश की अर्थव्यवस्था बढ़ती है, वैसे-वैसे डॉलर की जरूरत भी बढ़ जाती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के आयात में तेज वृद्धि हुई है, जबकि निर्यात उतनी तेजी से नहीं बढ़ पाया। इसका सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की कीमत पर पड़ता है। जब डॉलर की मांग बढ़ती है, तो रुपया कमजोर होने लगता है।
रुपये के कमजोर होने का असर सबसे पहले आम लोगों की जिंदगी पर पड़ता है। पेट्रोल-डीजल महंगा होता है, परिवहन खर्च बढ़ता है, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं और महंगाई धीरे-धीरे हर घर के बजट को प्रभावित करने लगती है। यानी डॉलर के मजबूत होने और रुपये के कमजोर पड़ने का बोझ अंततः आम जनता को ही उठाना पड़ता है।
यद्यपि वर्तमान स्थिति 1991 जैसी आर्थिक आपदा नहीं है। उस समय भारत के पास सिर्फ कुछ हफ्तों का विदेशी मुद्रा भंडार था, जबकि आज देश के पास लगभग 700 अरब डॉलर का रिजर्व है। इसका मतलब है कि भारत पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में है, लेकिन दबाव लगातार बढ़ रहा है।
इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री द्वारा देशवासियों से तेल बचाने, सोने की खरीद कम करने, स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने और अनावश्यक विदेशी खर्च घटाने की अपील को समझना जरूरी है। यह केवल एक सामान्य सलाह या देशभक्ति का संदेश नहीं है, बल्कि देश की आर्थिक स्थिरता से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। सरकार यह समझाना चाहती है कि यदि लोग अनावश्यक तेल की खपत कम करें, विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता घटाएँ, स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें और बचत की आदत बढ़ाएँ, तो इससे देश से बाहर जाने वाले डॉलर को काफी हद तक रोका जा सकता है।
भारत को सिर्फ “उपभोग करने वाली अर्थव्यवस्था” नहीं बल्कि “उत्पादन और निर्यात करने वाली अर्थव्यवस्था” बनना होगा। जब तक देश अपनी आवश्यकताओं की अधिकतम वस्तुओं का उत्पादन स्वयं करने और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक रूप से उनका निर्यात बढ़ाने की क्षमता विकसित नहीं करेगा, तब तक रुपये पर विदेशी मुद्रा का दबाव बना रहने की संभावना बनी रहेगी ।
देश की अर्थव्यवस्था केवल सरकारों से नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की आदतों, खर्च करने के तरीके और स्वदेशी सोच से भी मजबूत होती है। आज जरूरत केवल सरकारी नीतियों की नहीं, बल्कि आम नागरिकों की आर्थिक जिम्मेदारी की भी है।

