स्नेहसिंचित शब्द
स्नेहसिंचित शब्द

जे टी न्यूज
शब्दों से ही समा जाएंगे मन में तुम्हारे,
अब मुझे वो मुलाकात की जरूरत ही नहीं।
मेरे मनोनयन में बस गई है सूरत तुम्हारी,
अब जमाने की इजाजत की जरूरत ही नहीं।
मन के क्षितिज पर अनुरागमयी स्वप्न तुम्हारा,
समर्पण है आत्माओं का,सुंदर है मिलन हमारा।
मन के कोरे कैनवास पर तुम्हारी तस्वीर बनाई हूँ,
परिकल्पना में रंग भरकर अपनी तकदीर सजाई हूँ।
तुम्हें निज अंतर्मन में पा लेती हूँ, मौन को सुन लेती हूँ,
मधु स्वप्न बुन लेती हूँ,वो हँसी रात की जरूरत ही नहीं।
स्नेहसिंचित शब्द तुम्हारा,मुझको स्पर्श कर लेती है,
प्रेमरस घोलती है हिय में रुहानी एहसास जगाती है।
हम कल्पनाओं में मिल लेते है यर्थाथ सा लगता है।
प्रतीक्षारत नयनों को,अब प्रत्यक्ष की जरूरत ही नहीं।
स्वरचित
*अनुपमा सिंह सोनी* (पटना)

