मंडल मसीहा बीपी मंडल की जयंती 25 जुलाई को मनाई गई

मंडल मसीहा बीपी मंडल की जयंती 25 जुलाई को मनाई गई

जे टी न्यूज, मधुबनी :बिस्फी प्रखंड के खंगरैठा चौक पर मंडल मसीहा बीपी मंडल की जयंती 25 जुलाई को मनाई गई। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो इस्तियाक अहमद ने की। मंच संचालन राजद बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ के निवर्तमान जिला सचिव विजय चंद्र घोष ने किया। वहीं इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता राम सुदिष्ट यादव समाजवादी विचारक थे।
इस जयंती के अवसर पर गणमान्य व्यक्तियों ने ली पी मंडल जी के प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए सादर नमन किये।
विजय चंद्र घोष ने मंच संचालन करते हुए कहा कि मंडल मसीहा बीपी मंडल जी आजाद भारत में पिछड़े, शोषित, पीड़ित एवं वंचित समाज के बीच मसीहा के रूप में युग युगांतर तक अमर रहेंगे। उन्होंने कहा कि आज जो केन्द्रीय स्तर पर पिछड़ों की भागीदारी सरकारी नौकरी, रोजगार , शिक्षा में मिल रही है उस में बीपी मंडल की बहुत बड़ी देन है।
वहीं इस कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो इस्तियाक अहमद ने अपने संबोधन में मंडल कमीशन लागू करने हेतु आंदोलन के संबंध में विस्तार से जनता को बताएं।
इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता समाजवादी विचारक, राम सुदिष्ट यादव ने वी पी मंडल जी के प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कोटि-कोटि सादन नमन करें। साथ ही वे अपने संबोधन में ओबीसी द्वारा आरक्षण की शुरुआती मांग, संघर्ष, कमीशन गठन से लेकर आरक्षण लागू होने तक की घटनाक्रम पर विस्तार से जनता को जानकारी दी।

ज्ञातव्य है कि प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (जिसे काका कालेलकर आयोग कहा जाता है) की स्थापना 29 जनवरी 1953 को राष्ट्रपति के आदेश पर की गई थी। प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर को (काका कालेलकर) इस कमीशन के अध्यक्ष बनाए गए थे।

इस आयोग को संविधान के आधार पर सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) की पहचान करने एवं उसके उत्थान केलिए सुझाव देने हेतु निर्देश दिया गया था।
यह आयोग पिछड़े वर्गों की पहचान कर एवं उसके उत्थान केलिए सुझाव के साथ 30 मार्च 1955 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी।

काका कालेलकर आयोग की रिपोर्ट अस्वीकार होने का सबसे बड़ा कारण यह था कि खुद आयोग के अध्यक्ष, काका कालेलकर ने रिपोर्ट सौंपते समय सरकार को एक असहमति पत्र (Dissent Note) लिख दिया। उन्होंने कहा कि पिछड़ापन तय करने के लिए केवल ‘जाति’ को आधार मानना देश के लिए ठीक नहीं होगा, बल्कि ‘आर्थिक स्थिति’ (गरीबी) को मुख्य आधार बनाया जाना चाहिए।

आयोग ने 1951 की जनगणना के आधार पर रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें जातिवार (Caste-wise) आंकड़े नहीं थे। सरकार का मानना था कि बिना पुख्ता आंकड़ों के जातियों की इतनी बड़ी सूची को स्वीकार करना मुश्किल है।

तत्कालीन सरकार को लगा कि जाति के आधार पर आरक्षण देने से समाज में विभाजन और जाति विवाद बढ़ सकता है।

गृह मंत्रालय और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी इस रिपोर्ट पर सहमति नहीं जताई। उन्होंने ने राज्य सरकारों से कहा कि वे अपने स्तर पर पिछड़े वर्ग की सूचियां बनाकर मदद कर सकते हैं। लेकिन केंद्र सरकार ने काका कालेलकर आयोग के अनुशंसा को लागू नहीं किया।

मंडल आयोग का गठन 1 जनवरी 1979 को जनता पार्टी की सरकार में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा किया गया था। इस आयोग के अध्यक्ष बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल (बी.पी. मंडल) को बनाया गया था।
मंडल आयोग ने संविधान के अनुरूप सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (ओबीसी – OBC) की पहचान की थी।

आयोग की मुख्य सिफारिशें 27% आरक्षण सरकारी नौकरियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण दिया जाए।

देश के सभी विश्वविद्यालयों विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में भी पिछड़े वर्गों के छात्रों के लिए सीटें आरक्षित की जाएं।

पिछड़े वर्गों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए प्रभावी भूमि सुधार कानून लागू किए जाएं।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि देश की कुल आबादी में लगभग 52% हिस्सा ओबीसी वर्ग का है। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट एवं सिफारिशें 31 दिसम्बर 1980 को सरकार को दिया।

इस आयोग की रिपोर्ट को 7 अगस्त 1990 में जनता दल के तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) की सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर 27% आरक्षण OBC वर्ग केलिए लागू किया गया।

प्रधानमंत्री वीपी सिंह द्वारा अगस्त 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा के बाद लोकसभा में और राजनीतिक स्तर पर मुख्य विरोधी दल कांग्रेस पार्टी के नेता और उस समय के विपक्ष के नेता राजीव गांधी तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं द्वारा तीखा विरोध किया गया था।

लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में राजीव गांधी ने लगभग ढाई घंटे का लंबा भाषण दिया था और वीपी सिंह के इस कदम की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह फैसले से देश भर में जातिगत हिंसा भड़क उठेगी। कांग्रेस पार्टी के सदन में इस रुख से पार्टी के सवर्ण जातियों से जुड़े और पारंपरिक सांसद आरक्षण के खिलाफ मुखर हो गये।

भारतीय जनता पार्टी शुरू में इस फैसले को लेकर असहज थी, क्योंकि उसे अपने सवर्ण वोट बैंक खिसकने का अंदेशा था। इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने बाद में आरक्षण का राजनीतिक काउंटर करते हुए ‘कमंडल’ की राजनीति (राम जन्मभूमि आंदोलन) को आगे बढ़ाया। और वी.पी. सिंह की जनता दल सरकार को भाजपा बाहर से समर्थन दे रही थी, भाजपा ने जनता दल सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इस प्रकार वी.पी. सिंह की इमानदार और न्यायप्रिय सरकार को भाजपा ने गिरा दिया।

जनता दल और राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के भीतर भी कुछ मंत्री और नेता (जैसे देवी लाल के खेमे से जुड़े कुछ सांसद) इस फैसले से असहज थे और वीपी सिंह सरकार को अंदरूनी व बाहरी राजनीतिक उठापटक का सामना करना पड़ा था। संसद के भीतर वीपी सिंह के इस निर्णय का समर्थन शरद यादव, रामविलास पासवान, मुलायम सिंह यादव, मधु दंडवते आदि जैसे नेताओं ने किया था।
जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सवर्ण सांसदों का रुख आरक्षण के खिलाफ देखा गया था।
ज्ञातव्य है कि इस भारत के आधे से अधिक आबादी वाले जनता ओबीसी वर्ग को संवैधानिक अधिकार आरक्षण मिलने में 36 साल लग गए। ओबीसी आरक्षण केन्द्र सरकार में लागू करने के कारण 1990 में ईमानदार एवं न्यायप्रिय विश्वनाथ प्रताप सिंह की जनता दल सरकार को कुर्बानी देनी पड़ी थी।
वहीं सामान्य वर्ग को EWS समाज को 10% आरक्षण मात्र तीन दिन में लागू हो गया था। इसके लिए किसी प्रकार के आयोग बनाने, सर्वेक्षण करने, संसद में चर्चा करने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ी। संकलन कर्ता – राम सुदिष्ट यादव समाजवादी विचारक मधुबनी बिहार।

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