हर जीव के सीने में
हर जीव के सीने में

जे टी न्यूज
सुलगती एक बेचैनी है—
कुछ पाने की, कुछ बचाने की,
कुछ और आगे निकल जाने की।
यह आदिम प्यास है, जो ठहरने नहीं देती,
थके पाँवों को भी ज़रा बिसरने नहीं देती।
जंगल में हिरण
हरी दूब की टोह में डोलता है,
प्यासा पक्षी क्षितिज चीरकर
दूर जलाशय का पता खोलता है।
और सेरेन्गेटी की धूल उड़ाता
लाखों जीवों का महा-कारवाँ
हर वर्ष चुपचाप निकल पड़ता है—
न कोई नक्शा, न कोई दिशा-सूचक यंत्र,
न कोई पुरस्कार, न मंज़िल का प्रमाणपत्र।
बस साँसों में गूँजता है जीने का आदिम मंत्र;
जीवन पुकारता है,
और वे चुपचाप बहते जाते हैं,
शायद आगे बढ़ना ही
प्रकृति की पहली भाषा है।
मनुष्य भी तो चलता है—
बचपन की निश्छल हँसी से जवानी की धूप तक,
एक खिलौने से शुरू होकर असीम लिप्सा के रूप तक।
छोटी चाहतों से बड़ी महत्वाकांक्षाओं तक,
एक अधूरी जीत से दूसरी विजय की आशाओं तक।
वह चलता नहीं, हाँफता है,
रास्तों को नहीं, सिर्फ़ दूरी को नापता है।
फिर एक दिन—
साँप-सीढ़ी की इस अंधी दौड़ में,
किसी अनचाहे वीरान मोड़ में,
वह अचानक ठहरकर हाँफते हुए पूछता है—
“मैं जा कहाँ रहा हूँ?
और क्या खोकर, क्या पा रहा हूँ?”
तब आईने की दरकती परतें बताती हैं,
कि ज़माने से चार क़दम आगे निकलने की ज़िद में,
वह ख़ुद से ही कई मील पीछे छूट गया।
जो हासिल किया वह महज़ मुट्ठी भर रेत थी,
और जो गँवा बैठा, वह रूह का हरा-भरा खेत था।
प्रकृति ने हमें चलना सिखाया था,
पागल हवाओं की तरह दौड़ना नहीं।
उसने हमें धूप की ओर खिलना सिखाया था,
औरों की टहनियाँ मरोड़ना नहीं।
उसने चुपचाप, पत्तों की सरसरगाहट में कहा था—
चलो, पर अपनी लय को पहचानकर,
भीड़ के पीछे नहीं, अपनी ज़मीं को जानकर।
क्योंकि हर चमकती पगडंडी मंज़िल नहीं होती,
और हर आगे बढ़ती गति प्रगति नहीं होती।
कभी-कभी जब रास्ता भटक जाए,
तो एक क़दम पीछे खींच लेना भी
सही दिशा में मुड़ना होता है।
कभी किसी दरख्त की छाँव में सुस्ताना,
थक कर हारना नहीं, ख़ुद से जुड़ना होता है।
जीवन कोई अंधी दौड़ नहीं,
न ही किसी से छीनी गई जीत का नाम है;
यह तो उस मौन, गहरी यात्रा का नाम है—
जहाँ दुनिया की फ़तह से पहले,
इंसान अपने भीतर के सूनेपन तक पहुँचे,
और ठहरकर कह सके,
“हाँ, मैं घर लौट आया हूँ।”
जीवेश कुमार मिश्रा
दरभंगा, बिहार
२७-०९-२०२६

