रूबियो की यात्रा : नीति निर्माण का जिम्मा अब बड़े व्यापारियों को (आलेख : सवेरा, अनुवाद : संजय पराते)
रूबियो की यात्रा : नीति निर्माण का जिम्मा अब बड़े व्यापारियों को
(आलेख : सवेरा, अनुवाद : संजय पराते)

जे टी न्यूज़
पिछले सप्ताह, कुछ अजीबोगरीब घटनाएँ घटीं हैं, जो इस गंभीर और खतरनाक दिशा का संकेत देती हैं कि भारत किधर जा रहा है। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो मुंबई में उतरे, ताबड़तोड़ बैठकें कीं और जामनगर के लिए रवाना हो गए, “रिलायंस के लोगों से मिलने”, जैसा कि भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने बताया। रुबियो ने नई दिल्ली की यात्रा को पूरी तरह छोड़ दिया और इस दौरे को ‘व्यापार-केंद्रित’ बताया। मुंबई में, रुबियो ने अपने भारतीय समकक्ष, एस. जयशंकर के साथ एक औपचारिक बैठक की, जहाँ उन्होंने कथित तौर पर “व्यापार, रक्षा, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा सुरक्षा” पर चर्चा की। दूसरे शब्दों में, यह एक औपचारिकता थी, जिसका कोई विशेष महत्व नहीं था। रुबियो ने गौतम अडानी और टाटा समूह के अध्यक्ष एन. चंद्रशेखरन से भी मुलाकात की।
उनकी इसी यात्रा के दौरान, भारतीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी की एक फ़ोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई, जिसमें वे बच्चों के बलात्कारी, यौन तस्कर और सत्ता के दलाल सजाप्राप्त दिवंगत जेफ़री एप्स्टीन के साथ बातचीत कर रहे थे। यह तस्वीर नई नहीं है – इसे जनवरी 2026 में अमेरिका के न्याय विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस) ने ‘एप्स्टीन फ़ाइल्स’ के हिस्से के तौर पर जारी किया था। इसमें दोनों को एक कमरे जैसी जगह पर बैठे हुए दिखाया गया था, जहाँ कोई और मौजूद नहीं था – यह पुरी की इस साल की शुरुआत में दी गई उस श्रमसाध्य सफाई के ठीक उलट था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह सिर्फ़ एक प्रतिनिधिमंडल के साथ एप्स्टीन से मिले थे। अजीब बात यह थी कि यह फिर से बड़े पैमाने पर सामने आया, ठीक उसी समय जब रुबियो, जामनगर में मौजूद दुनिया के सबसे बड़े तेल शोधन संयंत्र के मालिक अंबानी से मिलने गए थे, और बताया जा रहा था कि वे अमेरिका को डीज़ल की आपूर्ति करने और जामनगर में वेनेज़ुएला के कच्चे तेल के शोधन पर बात करने जा रहे हैं। ये ऐसे विषय हैं, जिन पर पेट्रोलियम मंत्री को आम तौर पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन हाल ही में पुरी गायब से लग रहे हैं। साफ़ है कि कोई उस शर्मनाक बैठक की तस्वीर को दोबारा साझा करके भारतीय सरकार को ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहा था।
इन घटनाओं और उनकी पृष्ठभूमियों के वास्तविक अर्थ को समझने से पहले, यह गौर करने की आवश्यकता है कि ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी अपने ही देश में हाशिए पर जा रहे हैं, क्योंकि वैश्विक कुलीन वर्ग और अमेरिकी अधिकारी सीधे-सीधे स्थानीय बड़े व्यापारिक घरानों से संपर्क साध रहे हैं। वास्तव में, रुबियो ने यह घोषणा की कि अमेरिका-भारत मुक्त व्यापार समझौता लगभग अंतिम रूप ले चुका है – जो कि भारतीय सरकार के लिए चिंता का विषय है – किंतु विदेश मंत्रालय ने केवल ‘प्रगति’ का उल्लेख किया। या तो मोदी को परवाह नहीं है, या फिर अधिक संभावना यह है कि सत्ता के इन दलालों को परवाह नहीं है। स्थिति चाहे जो भी हो, यह एक खतरनाक रुख है, जो देश की नीति-निर्माण प्रक्रिया और हितों को कॉर्पोरेट एकाधिकारवादियों को सौंप रहा है। यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि सत्ता के शीर्ष स्तरों से इन तमाम गतिविधियों पर कोई टिप्पणी नहीं हुई है। तकनीकी-दिग्गज अरबपति मस्क का एक्स पर किया गया व्यंग्यात्मक पोस्ट, जिसमें उन्होंने मुकेश अंबानी को प्रधानमंत्री संबोधित किया और उन्हें “भारत का असली बॉस” बताया, उसमें कुछ हद तक सच्चाई है।

रुबियो की यात्रा के दौरान वास्तव में क्या हो रहा था? आइए, इसका पता लगाने का प्रयास करते हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता
हमारे पाठकों को याद होगा कि भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता जाहिर तौर पर रुका हुआ है, हालांकि बीच-बीच में बातचीत में प्रगति के दावे किए जाते हैं। एक साक्षात्कार में, रुबियो ने कहा कि दोनों देश एक समझौते के “बेहद करीब” थे, और यह भी जोड़ा कि, “…मुझे लगता है कि हम इसे अंतिम रूप देने से महीनों नहीं, बल्कि कुछ हफ़्ते ही दूर हैं। मुझे लगता है कि 99 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है… इसकी प्रगति को लेकर मैं बेहद सकारात्मक अनुभव कर रहा हूँ।” इससे पहले जून में, सर्जियो गोर ने लगभग यही बात कहते हुए समझाया था कि भारत चाहता है कि अमेरिका को होने वाले उसके निर्यातों पर लगने वाले शुल्क प्रतियोगियों की तुलना में कम किए जाएं। इसी साल फरवरी में, दोनों पक्षों ने काफी जश्न के बीच एक रूपरेखा समझौते की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य आगे की चर्चाओं और समझौते को अंतिम रूप देने की नींव रखना था। भारत की ओर से महत्वपूर्ण रियायतें दी गईं, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका से पांच वर्षों में 50 करोड़ डॉलर मूल्य के सामान का आयात करने की प्रतिबद्धता शामिल है, इसके अलावा “सभी अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और अमेरिकी खाद्य एवं कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर शुल्क को समाप्त या कम करने” की दिशा में कदम उठाना भी शामिल है। इस आत्मसमर्पण का ब्योरा लोकलहर के पुराने अंकों में दिया जा चुका है। वार्ता के मुद्दों के अलावा, मोदी सरकार को इस सौदे को लेकर किसानों, ट्रेड यूनियनों और वामपंथी दलों के भारी और आक्रामक विरोध का सामना करना पड़ा है, क्योंकि इससे कृषि के साथ-साथ उद्योगों, खासकर एमएसएमई क्षेत्र में भारी तबाही मचेगी।
रुबियो भारत के बड़े उद्यमों को एकजुट कर इस गतिरोध को खत्म करने का प्रयास कर रहे थे, ताकि वे इस समझौते को अंतिम रूप देने में हाथ बँटा सकें। यही कारण है कि समझौते के मार्ग की बाधाओं को तवज्जो नहीं दी गई और अमेरिका में निवेश के अवसरों के आश्वासन दिए गए। उन्हें पता है कि देश में मोदी की कमज़ोर हालत और उनकी सरकार का बड़े उद्यमों के आगे पूरी तरह झुक जाना, अमेरिका के लिए फ़ायदेमंद सौदा पाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। ध्यान दें कि उन्होंने इस मौके का फ़ायदा “अमेरिकी तकनीक और प्रणाली” के आयात पर ज़ोर देने के लिए उठाया, जो अपेक्षाकृत हथियारों के लिए एक आसान शब्द है। रुबियो ज़्यादा से ज़्यादा मछलियाँ पकड़ने के लिए दूर-दूर तक जाल फैला रहे थे।
अपनी ओर से, इन दिग्गजों को किसानों और मजदूरों की बिल्कुल परवाह नहीं थी। वे उन तीन कृषि कानूनों के समर्थन में खड़े थे, जो कृषि का कॉर्पोरेटीकरण कर देते, लेकिन किसानों के बहादूरीपूर्ण प्रतिरोध के आगे मोदी सरकार को झुकना पड़ा। ये दिग्गज श्रम सुधारों के भी पैरोकार रहे हैं, जिन्होंने उन चार संहिताओं का स्वागत किया है, जो मजदूरों को गुलाम जैसी स्थिति में ला देते हैं। इसलिए, इस बात की बहुत संभावना है कि अंबानी और अन्य लोग सरकार के सामने अमेरिका का पक्ष रखने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

तेल सौदे
तेल और उसके उत्पादों के संबंध में रूबियो की जामनगर यात्रा के कई उद्देश्य थे। एक तात्कालिक और अति-आवश्यक उद्देश्य अंबानी को अमेरिका के लिए डीजल का निर्यात बढ़ाने के लिए राजी करना था, जहां पिछले एक वर्ष में खुदरा डीजल की कीमतों में 77 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। यह जीवन-यापन की लागत को बढ़ाने वाला एक प्रमुख कारक है, जो अमेरिकी कांग्रेस के आगामी मध्यावधि चुनावों में एकमात्र सबसे बड़ा मुद्दा है। जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार ट्रंप के नेतृत्व वाले रिपब्लिकन काफी पीछे चल रहे हैं, और रॉयटर्स/इप्सोस के सर्वेक्षण में ट्रंप की लोकप्रियता की दर मात्र 31 प्रतिशत बताई गई है। इसलिए, बाजारों में डीजल की आपूर्ति बढ़ाने से असंतोष कुछ हद तक शांत हो सकता है।
रिलायंस का जामनगर शोधन संयंत्र दुनिया में डीजल के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है। मीडिया खबरों के अनुसार, इसने वर्ष 2025 की पहली छमाही में 2.166 करोड़ टन परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया है। इसमें से 98.1 लाख टन के साथ डीजल की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही, उसके बाद 61.4 लाख टन पेट्रोल और 20.6 लाख टन जेट ईंधन का स्थान रहा है। फ़िनिश थिंक टैंक सीआरइए द्वारा उद्धृत आंकड़ों के अनुसार, रिलायंस ने सितंबर 2026 में अमेरिका को 14.3 करोड़ डॉलर के तेल उत्पाद निर्यात किए हैं। रिलायंस के तेल उत्पादों के अमेरिकी निर्यात को सुगम बनाने के लिए, ट्रंप ने हाल ही में रूसी कच्चे तेल का उपयोग करने वाले उन आपूर्तिकर्ताओं पर लगे 100 प्रतिशत शुल्क में ढील दी है, जिसे पिछले ही महीने अमेरिकी कांग्रेस द्वारा कानून का रूप दिया गया था। वर्ष 2025 तक रिलायंस के आयात में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, किंतु अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों के पश्चात इसमें गिरावट दर्ज की गई। वास्तव में, ट्रम्प ने अब डीजल के आयात की अनुमति प्रदान करने हेतु स्वयं रूस के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह सब आसन्न मध्यावधि चुनावों के कारण है।
किन्तु तेल की यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। अंबानी और अडानी जैसे दिग्गजों के नेतृत्व वाले समूह विदेशों में मुनाफे की तलाश कर रहे हैं, जबकि वे भारत में और निवेश करने से इंकार कर रहे हैं, क्योंकि यहाँ मुनाफा बहुत कम है। इसलिए, रुबियो ने टेक्सास की एक तेल शोधन संयंत्र में रिलायंस द्वारा 300 अरब डॉलर तक के निवेश और उसके उत्पादों की खरीद व्यवस्था से जुड़े पिछले सौदे की भी पुष्टि की थी। यह भी ध्यान रखें कि अडानी पर लगे रिश्वत के आरोप खारिज होने के बाद उन्होंने हाल ही में अमेरिका में 10 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था।
एप्स्टीन विवाद
बहरहाल, ऐसे समय में जब हरदीप पुरी रुबियो-अंबानी बातचीत में शामिल हो सकते थे, पुरी-एप्स्टीन तस्वीरों का फिर से मीडिया मे आना, पुरी (और भारत सरकार) की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाकर फायदा उठाने की कोशिशों की ओर इशारा करता है। लेकिन इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि मोदी सरकार ने एक ऐसे मंत्री को इतने महीनों से अपने पद पर कैसे और क्यों बने रहने दिया है, जो साफ़ तौर पर एक यौन अपराधी के साथ शामिल था। हाल ही में भाजपा द्वारा घोषित राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची में उनका नाम शामिल नहीं है। इसलिए, संभवतः उन्हें पदमुक्त कर दिया जाएगा। लेकिन अमेरिका-इज़राइल द्वारा फरवरी में ईरान पर आक्रमण के बाद जब पूरी दुनिया तेल संकट से जूझ रही थी, ऐसे संवेदनशील दौर में भी उन्हें पद पर बने रहने की अनुमति देना न केवल एक अनुचित कृत्य था, बल्कि इसने ठीक उसी तरह की ब्लैकमेलिंग का खतरा पैदा कर दिया, जिसका प्रयास आज किया जा रहा है। आखिरकार, दस देशों में कम से कम सोलह सार्वजनिक हस्तियों को एप्स्टीन के साथ अपने संबंधों के कारण सार्वजनिक पद से इस्तीफा देना पड़ा है (या उन्हें हटाया गया है) या उन्हें आपराधिक जांच का सामना करना पड़ रहा है, जबकि सैकड़ों अन्य लोग अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं, क्योंकि उन तीस लाख दस्तावेजों में कहीं न कहीं उनका उल्लेख है।
क्या मोदी यह सब संभाल सकते हैं?
प्रधानमंत्री मोदी दावा करते रहे हैं कि वह और उनकी पार्टी ‘इंडिया फर्स्ट’ को मानते हैं ; कि वे सच्चे राष्ट्रवादी हैं ; कि वे ‘विश्व गुरु’ (दुनिया के शिक्षक) हो सकते हैं ; कि वे सबसे ज्यादा कुशल और सबसे ज़्यादा जन-केंद्रित हैं – संक्षेप में, सबसे अच्छे हैं।
बहरहाल, महत्वपूर्ण आर्थिक फैसले अरबपतियों को सौंपना, ट्रंप जैसे उपद्रवियों और नेतन्याहू जैसे भ्रष्ट विक्षिप्तों के आगे नतमस्तक होना, बड़े उद्यमों और वैश्विक कुलीनों के याचक बनना, ये सब इस बात के संकेत हैं कि – दुर्भाग्य से – हमारी सरकार आम जनता के हित में काम नहीं कर रही है। इसकी आर्थिक नीतियों से देश का दोबारा उपनिवेशीकरण होगा, जबकि इसकी सामाजिक सांस्कृतिक विचारधारा भारत को मध्यकालीन ज़माने के अंधेरे में धकेल रही है। मोदी आधुनिक दुनिया को नहीं संभाल सकते, और उनसे और भाजपा/आरएसएस से आज भारत को बचाने की ज़रूरत है।

(लेखक शोध अध्येता हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)


