“कुर्सी गई तो क्रांति जागी!” बी एन एम यू में ट्रांसफर पर ‘सुविधा वाली राजनीति’ का बड़ा खुलासा
“कुर्सी गई तो क्रांति जागी!” बी एन एम यू में ट्रांसफर पर ‘सुविधा वाली राजनीति’ का बड़ा खुलासा
जे टी न्यूज, मधेपुरा :

भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय इन दिनों ट्रांसफर विवाद को लेकर सुलग रहा है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने विश्वविद्यालय की अंदरूनी राजनीति का ऐसा चेहरा उजागर कर दिया है, जिसने सिस्टम की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला अब सिर्फ तबादले तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि “कुर्सी-केन्द्रित सोच” और “सुविधा की राजनीति” का प्रतीक बनता जा रहा है। वर्षों तक पद और प्रभाव का लाभ उठाने वाले कुछ प्राध्यापक और उनका कुनबा अब अचानक विरोध की अग्रिम पंक्ति में खड़ा नजर आ रहा है—हाथों में बैनर, जुबान पर नारे और मंच से तीखे भाषण।
*चुप्पी से चीख तक: बदलता तेवर, उठते सवाल*
सूत्रों के अनुसार, जब तक संबंधित प्राध्यापक प्रशासनिक कुर्सी पर आसीन थे, तब तक उनके परिवार और करीबी किसी भी संगठन के बैनर तले विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ एक शब्द बोलने से बचते रहे। उस समय हर निर्णय “व्यवस्था” और हर आदेश “नियम” माना जाता था।
लेकिन जैसे ही ट्रांसफर हुआ और पद छिना, वही लोग अब “अन्याय” और “शोषण” के खिलाफ सबसे मुखर आवाज बनकर सामने आ गए हैं। यह अचानक बदला रुख विश्वविद्यालय में “चयनात्मक विरोध” और “स्वार्थ आधारित सक्रियता” की ओर इशारा कर रहा है।
*कैंपस में हंगामा पर हुआ कामकाज प्रभावित*
विरोध के नाम पर विश्वविद्यालय परिसर में बैनर-पोस्टर, नारेबाजी और भाषणबाजी से आरोप है कि इससे प्रशासनिक कार्यों में बाधा उत्पन्न हुई और विश्वविद्यालय का सामान्य कामकाज प्रभावित हुआ।
*“संघर्ष नहीं, स्वार्थ का शोर”*
इस पूरे घटनाक्रम पर युवा सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर रंजन ठाकुर ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा—
“यह कोई वैचारिक आंदोलन नहीं, बल्कि स्वार्थ के चोटिल होने की प्रतिक्रिया है। पद रहते खामोशी और पद जाते ही हंगामा—यह दोहरा चरित्र विश्वविद्यालय की गरिमा के खिलाफ है।”
एक सवाल के जवाब में उन्होंने तीखा तंज कसते हुए कहा—
“यहां एक कहावत प्रचलित है— ‘बापे पूते पंच, बरद के दाम…’।
विश्वविद्यालय में कई शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मियों के बेटे-बेटियां इस पूरे प्रकरण को हवा दे रहे हैं, पुत्र पुत्री भी उसी संगठन में है और पिता उस संगठन के बड़े पदाधिकारी
जिससे माहौल और अधिक प्रदूषित हो रहा है।”
*कार्रवाई की मांग, सख्ती की दरकार*
प्रो. ठाकुर ने सरकार, कुलाधिपति और विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि:
विश्वविद्यालय परिसर में अवैध प्रदर्शन और अवरोध पर तत्काल रोक लगाई जाए
प्रशासनिक कार्यों में बाधा डालने वालों पर सख्त कार्रवाई हो,दबाव बनाकर निर्णय बदलवाने की प्रवृत्ति पर सख्ती से अंकुश लगाया जाए
*सिस्टम पर बड़ा सवाल*

इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या विरोध सिर्फ तब ही “वैध” होता है, जब व्यक्तिगत हित प्रभावित हो?
अगर ऐसा है, तो यह न सिर्फ विश्वविद्यालय बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय प्रशासन “सुविधा की राजनीति” पर लगाम लगाकर सख्ती दिखाएगा, या फिर यह शोर आगे भी शिक्षा व्यवस्था पर भारी पड़ता रहेगा।


