राष्ट्र के नाम संबोधन या सरकारी खर्च पर चुनावी भाषण
राष्ट्र के नाम संबोधन या सरकारी खर्च पर चुनावी भाषण

जे टी न्यूज, दिल्ली: यह राष्ट्र के नाम संबोधन नहीं, सरकारी खर्च पर चुनावी भाषण था.
प्रधानमंत्री होने के नाते नरेंद्र मोदी जी को यह अधिकार तो है कि वे जब चाहें राष्ट्र को संबोधित कर लें.
लेकिन यह राष्ट्र से जुड़े किसी संकट, किसी समस्या या किसी उपलब्धि पर ही होता आया है.
पहली बार हुआ है कि एक प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन के नाम पर विपक्षी दलों को कोसने के लिए इस विशेषाधिकार का दुरुपयोग किया.
टेलिप्राम्टर लगाकर विपक्ष को कोसना था तो इसे राष्ट्र के नाम संदेश का नाम नहीं दिया जाना चाहिए था.
लेकिन समस्या यह है कि अगर इसे वे ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ का नाम नहीं देते तो सरकारी खर्च पर इतना बड़ा चुनावी भाषण नहीं दे पाते.
और विपक्षी दलों को कोसना भी था तो थोड़ा तथ्यपरक बातें कर लेते.
यह तो झूठ का पुलिंदा था.
बेसिरपैर की बातें थीं. अनर्गल प्रलाप था. एक ही वाक्य का दर्जनों बार दोहराव था.
ठीक है कि आपके विधेयक के गिर जाने से आपको सदमा पहुंचा है प्रधानमंत्री जी. लेकिन यह तो आप जानते थे कि आपकी मंशा दरअसल महिलाओं को आरक्षण देने की नहीं थी, अगले चुनाव में भाजपा के लिए बिसात बिछाने की थी.
आप बता क्यों नहीं रहे हैं कि महिलाओं को संसदीय चुनाव में आरक्षण देने का विधेयक तो दरअसल 20 सितंबर, 2023 को ही पारित हो चुका है.
न देश का संविधान यह कहता है न संसदीय नियम क़ायदे कहते हैं कि किसी पारित विधेयक को फिर से पारित करना पड़े.

आप किसी पारित विधेयक में संशोधन चाहे कर सकते हैं लेकिन यह तो उस विधेयक में संशोधन करने वाला विधेयक भी नहीं था.
आप झूठ बोल रहे हैं प्रधानमंत्री जी, अमित शाह जी झूठ बोल रहे हैं, आपकी पूरी पार्टी झूठ बोल रही है.
आपकी मंशा महिलाओं को अधिकार देने की नहीं है.
महिलाओं को बरगलाने और बहलाने की है.
महिलाएं इस बात को बखूबी समझती हैं.

