दिल थामकर बैठिए, बाकीपुर बहुत ही रोचक, रोमांचक और भयानक चुनावी जंग के गवाह बनने जा रहे

दिल थामकर बैठिए, बाकीपुर बहुत ही रोचक, रोमांचक और भयानक चुनावी जंग के गवाह बनने जा रहे


जे टी न्यूज़, पटना : दिल थामकर बैठिए, आप बहुत ही रोचक, रोमांचक और भयानक चुनावी जंग के गवाह बनने जा रहे हैं! यह सिर्फ दिन के उजाले में लड़ी जा रही लड़ाई, भाषणबाजी और आरोप-प्रत्यारोप वाली जंग नहीं होगी। सिर्फ प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी की वजह से चुनावी सरगर्मी परवान नहीं चढ़ेगी। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की चोरी, मामले की लीपापोती, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद का असली चेहरा सामने आने के बाद यह पहला चुनाव है! पटना में नीट छात्रा हत्याकांड और भरत तिवारी हत्याकांड के बाद यह पहला चुनाव है। यह उपचुनाव बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के चाल, चरित्र और चेहरे पर जनमत संग्रह भी कहा जाएगा। महंगे पेट्रोल में एथेनॉल से न सिर्फ गाड़ियों के इंजन दम तोड़ रहे हैं, लोगों का विश्वास भी टूट रहा है। इन मुद्दों पर राजनीतिक दल भले ही सशक्त विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं, सोशल मीडिया लोगों के दिल-दिमाग में असंतोष, आशंका और आक्रोश पैदा कर रही है। आग सुलग रही है। इसलिए भाजपा और खासकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए करो या मरो की स्थिति पैदा हो गई है। राजद ने भी सोच-समझकर रेखा गुप्ता को फिर से मैदान में उतारा है। राजनीतिक रणनीतिकार और कुशल चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर भी अपने हर हथियार आजमाएंगे।
इसमें घात-प्रतिघात होगा, दांव-पेंच होंगे और राजनीतिक शक्तियां हर तरह के कुकर्मों को आजमाएंगी। विपक्षी दल बांकीपुर उप चुनाव को बोचहां ( उप चुनाव, जिसमें भाजपा की करारी हार हुई थी) ले जाने की कोशिश करेंगे और भाजपा इसे पश्चिम बंगाल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। बांकीपुर में सियासी दल और उम्मीदवार पूरी निर्लज्जता से हर तिकड़म आजमाएंगे। इस उप चुनाव से न तो सरकार गिरने जा रही है और न कोई नई सरकार बनने जा रही है। इसलिए अगर आप स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रेक्षक बनकर राजनेताओं के चुनावी भाषण सुनेंगे, चुनावी मुद्दों, मसालों पर गौर करेंगे तो पता चलेगा कि ‘राजनीतिक’ नीचता की बजबजाती नाली में कितना नीचे लुढ़क चुकी है। आप अगले एक महीने तक खुद के कांग्रेसी या भाजपाई, राजद या जेडीयू कार्यकर्ता ( समर्थक) होने की बात भूलकर बांकीपुर की जंग का आनंद ले सकते हैं।


ऐसा मौका फिर नहीं।
बांकीपुर की जंग में प्रशांत किशोर के कूदने के बाद मुझे हिन्दी फिल्म ‘एन इवनिंग इन पेरिस’ का लोकप्रिय गाना ‘अजी ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा’ याद आ रहा है। आगे मैं उन बिंदुओं पर प्रकाश डालूंगा, जिनकी वजह से प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर बड़ा मौका बन गया है।
देश का जो वर्तमान राजनीतिक माहौल है, वह प्रशांत किशोर के लिए सर्वथा अनुकूल है। भले ही बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी फिसड्डी साबित हुई, परन्तु आज की तारीख में प्रशांत किशोर राष्ट्रीय स्तर के चर्चित चुनावी रणनीतिकार हैं। उनके सामने राजद प्रत्याशी रेखा गुप्ता का सियासी कद बहुत ही छोटा है। अगर हम दलों के सामाजिक समीकरणों, जातीय जनाधार पर गौर करें, तो राजद के चुनाव चिन्ह के सामने जन सुराज पार्टी का चुनाव चिन्ह कहीं टिक नहीं पाएगा। भाजपा ने अपेक्षाकृत युवा चेहरे को मैदान में उतारा है। भाजपा उम्मीदवार अभिषेक सिन्हा तो और भी नौसिखिया हैं। लेकिन चुनाव उम्मीदवार नहीं, पार्टियां लड़ती हैं। दलों के रणनीतिकार, कार्यकर्ता और अलग-अलग गठबंधन के साथ खड़ा समाज ( जातियां) चुनाव लड़ता है। कड़वा सच यह है कि अब तो पर्दे के पीछे से चुनाव आयोग और प्रशासन भी चुनाव लड़ता है। इसलिए सिर्फ उम्मीदवार का चेहरा देखकर हार-जीत की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है।
खैर, इन सब के बावजूद प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर उप चुनाव एक सुनहरा मौका है। अगर हम अतीत के उप चुनावों पर मुड़ कर देखें तो पता चलता है कि प्रायः सत्ताधारी दल की हार होती है। सरकार बनाने वाले मतदाता और सरकार समर्थक जातियां भी सत्ताधारी दल के खिलाफ खुलकर मतदान करती हैं। सरकार बनाने के बाद अलग-अलग मुद्दों पर मतदाताओं में असंतोष पनप चुका होता है। सरकार की विफलताओं, कामकाज और छवि से नाराज वोटर भले ही विपक्षी दल को सत्ता सौंपना नहीं चाहते, लेकिन वे सरकार का कान पकड़कर ऐंठना चाहते हैं। अपनी नाराज़गी का अहसास कराना चाहते हैं। उप चुनावों में मतदान के माध्यम से वोटर चेतावनी देते हैं – बच्चू अब भी मौका है संभल जाओ! यही वजह है कि बहुमत से सरकार चला रही पार्टियां उपचुनाव में धराशाई हो जाती हैं। बांकीपुर में भी मतदाताओं का एक वर्ग इसी मनःस्थिति के साथ ईवीएम का बटन दबाएगा। चुनाव परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि मतदाताओं का कितना प्रतिशत बूथ पर सबक सिखाने जाएगा?
किस मुंह से वोट मांगेंगे
प्रायः मतदाताओं के रुझान से भाजपा चुनावों में जीतती-हारती है, लेकिन हर चुनाव के बाद आरएसएस वाले अपनी ब्रांडिंग करते हैं। मसलन, जब भाजपा जीतती है, तो प्रचारित किया जाता है कि संघ ने चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी। स्वयं सेवक घर-घर पहुंचे। संघ का जमीनी नेटवर्क बहुत ताकतवर है। जहां भाजपा हारती है, वहां भी संघ की हैसियत का बखान किया जाता है – संघ के शीर्ष पदाधिकारी नाराज थे। संघ ने स्वयं सेवकों को न्यूट्रल रहने के संकेत दे रखे थे। संघ वालों ने जानबूझकर भाजपा को जंग में अकेला छोड़ा। अर्थात भाजपा जीती तो संघ की बदौलत, हार गई तो संघ की उपेक्षा, उदासीनता और नाराजगी की वजह से! श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के भ्रष्ट साबित होते ही भाजपा, आरएसएस और विहिप पर जनता का ट्रस्ट नहीं रहा!
बांकीपुर उप चुनाव की घोषणा के साथ एक सवाल पूछा जा रहा है – संघ के पदाधिकारी और स्वयं सेवक अब किस मुंह से वोट मांगने जाएंगे। संघ, विश्व हिन्दू परिषद और भाजपा की लुढ़कती हुई छवि आज प्रशांत किशोर के लिए बड़ा अवसर है।‌ भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद वालों ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए घर-घर जाकर चंदा वसूली की थी। मंदिर निर्माण की वाहवाही बटोरने के लिए चंदा वसूली महाभियान को हथियार बनाया गया। सिर्फ चंदा देने वाले ही नहीं, देश-दुनिया का प्रत्येक हिन्दू परिवार भावनात्मक रूप से अयोध्या से जुड़ा रहा है। जब देश -दुनिया के करोड़ों हिन्दुओं को पता चला है कि सरकार, संघ द्वारा तैनात ट्रस्टियों, पदाधिकारियों की मिलीभगत, संलिप्तता , उदासीनता से अयोध्या में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की लूट हुई है, हिन्दू जनभावना को बड़ा आघात हुआ है। लोग आहत हैं। ताने दिए जा रहे हैं कि चढ़ावा की गिनती में अगर कोई मुसलमान होता तो कितना बड़ा बवाल होता।‌
खासकर जब भाजपाई, संघी और विहिप वाले मामले की लीपापोती करते हैं, जब कहते हैं कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में उल्लेखनीय ( गड़बड़ी) नहीं हुई है, जब मुख्य चेहरों को बचाने की कोशिश की जाती है, जब स्वयं सेवक एवं पुराने विहिप कार्यकर्ता टिल्लू राय को अखिलेश यादव का आदमी बताने की नीचता की जाती है, तो करोड़ों देशवासियों के दिल में आग भड़कती है। सवाल उठता है कि क्या विपक्षी इस जनाक्रोश को भुना पाएंगे?


प्रशांत किशोर सियासी तीस मार खान बनते हैं। उनकी भाव-भंगिमा और भाषा बताती है कि वे चुनावी पहलवानों के गुरु हैं, तो बांकीपुर में उनकी अग्नि परीक्षा होने वाली है। हवा गर्म है। लंका में आग लगी तो उन्चास पवन बहने लगे! जो हवाएं उमड़-घुमड़ रही हैं, उससे अवसर को परिणाम में बदलने की काबिलियत दिखानी पड़ेगी। भाजपा को हवा की विपरीत दिशा में चलना है, जबकि राजद और जन सुराज पार्टी की नावों को हवा के रुख से सहूलियत होगी। देखना दिलचस्प होगा कि प्रशांत किशोर अपनी नाव के मस्तूल से पाल को मजबूती से टांग पाते हैं या नहीं!
न किसी की आंख के नूर हैं
अगर प्रशांत किशोर या रेखा गुप्ता मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की छवि को चुनावी मुद्दा बनाने में सफल रहे तो परिणाम चौंकाने वाला होगा। याद कीजिए, जब नीतीश कुमार 2005 में मुख्यमंत्री बने थे। अपराध नियंत्रण और विकास योजनाओं को गति देते हुए उन्होंने एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री की छवि अर्जित की थी। वे इंजीनियर थे और सम्राट चौधरी सातवीं फेल। नीतीश कुमार के सामने सम्राट चौधरी कहीं से नहीं टिक पा रहे। अपराध नियंत्रण इनके वश की बात नहीं है। आय दिन हत्या, बलात्कार और लूट की वारदातों से जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। विकास योजनाओं में भुगतान ठप है। कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं दिया जा रहा है। नीतीश कुमार की छवि की बदौलत बिहार में एनडीए की सरकार बनी थी। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भी नीतीश कुमार के चेहरे पर ही बहुमत मिला। एनडीए अगर सम्राट चौधरी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा होता तो लुढ़क जाता। अगर हम कोइरी समाज को अलग रखें तो सम्राट चौधरी आज न किसी की आंख के नूर हैं और न किसी के दिल के करार हैं! किसी को इस चेहरे पर भरोसा नहीं है। जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने थे, उनके चेहरे पर यादव -मुस्लिम को छोड़कर अधिकांश जातियों को भरोसा था, बल्कि मुसलमानों को भी इतना भरोसा था कि नीतीश कुमार के रहते उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी। कोई खतरा नहीं आएगा। उनकी उम्मीद पर नीतीश हमेशा खड़ा नजर आए। सम्राट चौधरी के तेवर, तल्खी से लोग चिंतित हैं।प्रशांत किशोर अगर बांकीपुर उप चुनाव को सम्राट चौधरी के नाम पर जनमत-संग्रह में नहीं बदल पाए तो यह उनकी कमजोरी होगी।
भला कैसा हथियार चाहिए
नीट छात्रा हत्याकांड के बाद जनता में संदेश गया कि निष्पक्ष जांच और कार्रवाई से एनडीए के कई बड़े चेहरे कठघरे में होंगे, इसलिए मामले की लीपापोती की गई। सवाल उठा कि पुलिस ने आखिर किन हैवान हत्यारों को
बचाने के लिए हैवान लीपा-पोती की? मंत्री, सांसद, विधायक की चुप्पी और पुलिस उच्चाधिकारियों की शिथिलता ने यह संदेश फैलाया कि बेटियों की अस्मत लूटने वालों, हत्या करने वालों को न सिर्फ मौजूदा शक्ति केंद्रों का संरक्षण प्राप्त है, बल्कि शक्ति केंद्रों की संलिप्तता भी है। प्रशांत किशोर या कोई दूसरा उम्मीदवार अगर पटना में नीट छात्रा हत्याकांड को बांकीपुर के वोटरों की जुबान पर ला सकेगा तो माजी मार लेगा। नीट छात्रा हत्याकांड ही नहीं, भरत तिवारी हत्याकांड से भी जनता में आक्रोश है। सत्ताधारी गठबंधन बैकफुट पर है। एनडीए के घटक दलों में भरत तिवारी के मुद्दे पर मतभेद हैं। प्रशांत किशोर या किसी अन्य उम्मीदवार को चुनावी जंग में इससे कारगर भला और कैसा हथियार चाहिए?
चौकीदार की लोकप्रियता ढलान पर
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता ढलान पर है। पहले विश्व राजनीति में पाकिस्तान को अलग-थलग धकेलने का दंभ भरते थे। आज खुद हाशिए पर हैं। ईरान-अमेरिका युद्ध में पाकिस्तान की मध्यस्थता सुर्खियां बटोर रही हैं। बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद जो सरकार बनी है, वह चीन के करीब है। बांग्लादेश में भारतीय उम्मीदों , योजनाओं और हितों पर चीन पानी फिर रहा है। जनाव पहले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में प्रचार करने जाते थे, आज अमेरिका इनकी बांहों को मरोड़ रहा है। सोशल मीडिया पर अटल बिहारी वाजपेई का वीडियो वायरल हो रहा है – कुत्ता अगर भौंकता नहीं है तो समझिए कि वह चोरों को जानता है! श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले में चौकीदार की चुप्पी संदेह पैदा कर रही है। ये कुछ बोलने लायक नहीं रहे। जनता तक खबर पहुंच गई है कि चंपत राय इनकी पसंद हैं।
पाटलिपुत्र लोकसभा चुनाव हार चुकी भाजपा मुगालते में न रहे। जब जनता का मन बदलता है तो बड़े-बड़े सुरमा धराशाई हो जाते हैं। प्रशांत किशोर दूल्हा बन गए हैं, लेकिन उन्हें अपनी बारात सजानी पड़ेगी। भाजपा से नाराज लोगों की कतार लंबी है, लेकिन उस कतार को प्रशांत किशोर अपनी बारात में शामिल नहीं कर पाए तो कुछ नहीं होगा।
पेट्रोल की आग
पेट्रोल की कीमत में आग लगी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल की कीमत में भारी गिरावट के बावजूद भारतीय उपभोक्ता महंगा खरीदने को विवश हैं, ऊपर से मिलावटी। इसे धंधा कहिए या वैकल्पिक उर्जा की तलाश, पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से गाड़ियों का एवरेज घट रहा है। प्रति लीटर पेट्रोल ( एथेनॉल युक्त) से माइलेज घटता जा रहा है। ग्राहक तीन तरह से मारे जा रहे हैं। पेट्रोल महंगा है, मिलावटी है, माइलेज घट रहा है और इंजन क्षतिग्रस्त हो रहा है! इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ नितिन गडकरी की छवि भी धूमिल हो गई है! देश के करीब 85000 से अधिक पेट्रोल पंपों पर ग्राहकों का शोषण हो रहा है, ठगी की जा रही है। ऊपर से कोढ़ में खाज की तरह अब बिहार में बाइक चालकों से रोड टैक्स वसूलने की बात हो रही है। बांकीपुर भी भारत से बाहर नहीं है! प्रशांत किशोर, रेखा गुप्ता और अन्य उम्मीदवारों के सियासी कौशल पर निर्भर करेगा कि वे पेट्रोल को अपना चुनावी इंधन बना पाते हैं या नहीं?
बूथ पर कौन मजबूत
भाजपा, राजद और जन सुराज की अपनी-अपनी ताकत, सीमाएं और कमजोरियां हैं। भाजपा के पास मजे-मजाए चुनावी प्रबंधकों, कार्यकताओं की फौज है। राजद के पास भी कार्यकर्ता की कमी नहीं है। हां, जैसे राजद ने कांग्रेस को उम्मीदवार खड़ा करने नहीं दिया और कांग्रेसी अंदर से आहत हैं, उससे इंडिया गठबन्धन में असहयोग और भितरघात का खतरा है। इधर सम्राट चौधरी की कार्यशैली से जेडीयू के अंत:पुर में नाराजगी है। सम्राट चौधरी को सबक सिखाने के लिए जेडीयू के कुछ वरिष्ठ नेता चाहते हैं कि भाजपा की हार हो! यह तो वक्त बताएगा कि जेडीयू कार्यकर्ता बूथ पर सहयोग करेंगे या भितरघात! चुनाव वही जीतेगा जो बूथ पर मजबूत होगा। भाजपा प्रत्येक बूथ पर मजबूत कमेटी का दावा करती रही है। मतदाता सूची के प्रत्येक पन्ने पर एक प्रमुख ( पन्ना प्रमुख) का चयन किया जाता है, जिससे बूथ कमेटी को ताकत मिलती है। राजद के पास ग्रासरूट लेवल पर भाजपा जैसा माइक्रो मैनेजमेंट सिस्टम नहीं होता है। इसका मतलब यह नहीं है कि बूथों पर राजद कमजोर है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भले ही राजद की हार हुई, लेकिन छिट-पुट अपवादों को छोड़कर अधिकांश राजद उम्मीदवार को 75000 से अधिक वोट मिले। प्रशांत किशोर भी चुनावों में माइक्रो मैनेजमेंट के आजमाए हुए कमांडर हैं। अब खुद के लिए क्या सब कर पाते हैं, यह तो बांकीपुर का परिणाम बताएगा। जन सुराज पार्टी ने बांकीपुर के प्रत्येक वार्ड में ऐसे मजे हुए प्रोफेशनल उतारे हैं, जो कल तक किसी जिले में जन सुराज पार्टी का संगठन खड़ा करते रहे हैं। उसकी मदद के लिए दो -दो वरिष्ठ रिसोर्स पर्सन को तैनात किया है। इनके अलावा भी पांच-पांच जूनियर रिसोर्स पर्सन को प्रत्येक वार्ड में तैनात किया गया है। इन वेतनभोगी प्रोफेशनल के अलावा जन सुराज पार्टी के स्थानीय व प्रदेश स्तर के नेता कार्यकर्ता भी ताकत लगाएंगे। राज्य भर से जन सुराज पार्टी में आस्था रखने वाले और प्रशांत किशोर को चाहने वाले नेता-कार्यकर्ता खुद की पहल पर बांकीपुर पहुंचने वाले हैं। परिणाम चाहे जो हो, चुनाव मैदान में जन सुराज पार्टी वाले भाजपा – राजद को नाकों दम किए रहेंगे!
कार्यकर्ता – प्रोफेशनल की औकात
जिसके पक्ष में चुनावी हवा चलती है, कार्यकर्ता और प्रोफेशनल उसी की मदद कर पाते हैं। इसे उदाहरणों से समझिए। बोचहां उप चुनाव में प्रत्येक पंचायत में भाजपा के एक विधायक या मंत्री को तैनात किया गया था। दो उप मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और राज्य सरकार के मंत्री दरवाजे-दरवाजे भटक रहे थे। किसी गांव में सुबह-सुबह राज्य सरकार के मंत्री विजय कुमार चौधरी ( वर्तमान उप मुख्यमंत्री) बैठक करते थे तो दो घंटे बाद मंत्री जीवेश मिश्रा वोटरों को मनाने पहुंच जाते थे। दोपहर बाद उप मुख्यमंत्री रेणु देवी को गरीबों की बस्ती में महिलाओं की नाराज़गी झेलनी पड़ती थी और देर शाम केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह पहुंच जाते थे, लेकिन नाराज वोटरों ने नाक पर मक्खी बैठने नहीं दी। करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए गए। वोटरों के मिजाज भांप चुके सांसद, विधायक व मंत्री दिन में प्रचार की रस्म अदायगी कर रातों को चुपके से पटना या अपने घर भागते रहे। पार्टी समझ रही थी कि नेता मुजफ्फरपुर में प्रवास कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं की फौज कहीं हताश थी तो कहीं नाराज, कहीं उदासीन थी तो कहीं भितरघात कर रही थी।
अब प्रोफेशनल की हैसियत समझ लीजिए। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 में जब ममता बनर्जी की जीत हुई, आईपैक के प्रोफेसनल ने खूब वाहवाही बटोरी। उसी आईपैक के प्रोफेसनल 2026 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की करारी हार की वजह बने। हारने-जीतने वाले नेता और कार्यकर्ता चीख-चीख कर कह रहे हैं कि अभिषेक बनर्जी आईपैक की चंगुल में फंसे रहे। नेता, कार्यकर्ता की एक नहीं चलने दी। आई पैक के प्रोफेशनल चुनाव में विरोधी दलों के हाथ पैसे पर बिक गए। गोपनीय सूचनाएं, आंकड़े बेचने लगे। विरोधी दल के इशारे पर तृणमूल कार्यकर्ताओं को हड़काया! आई पैक की भूमिका से जनता में, तृणमूल कार्यकर्ताओं में और खासकर वोटरों में अभिषेक बनर्जी व तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश फैला। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि पालिटिकल एजेंसी के प्रोफेसनल की बदौलत चुनाव जीता जा सकता है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान बिहार के अलग-अलग जिलों में उम्मीदवारों के चयन में जन सुराज की प्रोफेसनल टीम द्वारा लाखों की उगाही के आरोप लगे। विभिन्न जिलों में टिकट नहीं मिलने पर नेता सार्वजनिक रूप से चीख-चीख कर आरोप लगाते सुने गए कि टिकट दिलाने के नाम पर उनसे लाखों की ठगी की गई। पैसे पर टिकट बेचे गए! जिस देश में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा की चोरी हो रही है, उस देश में कार्यकर्ताओं और प्रोफेशनल को बिकने से भगवान भी नहीं बचा सकते हैं।
भाजपा -राजद का मास्टर स्ट्रोक
प्रत्याशी चयन के मामले में भाजपा और राजद ने जन सुराज की अपेक्षा अधिक परिपक्वता दिखाई है। राजद ने विधानसभा चुनाव 2025 की उम्मीदवार रेखा गुप्ता को ही फिर से मैदान में उतारा है। वैश्य उम्मीदवार रेखा गुप्ता जूझारू हैं। रेखा गुप्ता भाजपा के आधार वोट में सेंधमारी करेंगी। यादव और मुस्लिम के साथ वैश्य मतदाता पूर्णतया गोलबंद हुए तो परिणाम चौंकाने वाला होगा! बोचहां उम्मीदवार की तरह बांकीपुर उम्मीदवार में भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ कोई नाराज़गी नहीं है। हां, केंद्र व राज्य सरकारों से नाराजगी, मोहभंग की कई वजहें हैं।
भाजपा ने अभिषेक सिन्हा उर्फ बंटी को मैदान में उतार कर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। भाजपा ने स्थानीय और अपेक्षाकृत युवा उम्मीदवार खड़ा किया है, जिसके खिलाफ बोलने के लिए राजद और जन सुराज पार्टी को कुछ भी नहीं मिल रहा है। भाजपा ने किसी बड़े नेता के बाल-बच्चे को प्रत्याशी नहीं बनाकर आम कार्यकर्ता में से उम्मीदवार ढूंढ़ा है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा प्रायः खास-खास खानदानों में उलझी रही है। इस बार सावधानी बरती गई है। कार्यकर्ताओं को संदेश दिया गया है कि तुम मेहनत करो, एक दिन तुम्हारी भी बारी आएगी! अगर भाजपा पूर्व सांसद आरके सिन्हा के बेटे ऋतुराज सिन्हा को उम्मीदवार बनाती तो विपक्ष दोहरा आरोप लगाता। परिवारवाद के साथ-साथ श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में लूट का मामला तूल पकड़ लेता। देश भर में आवाज उठ रही है कि केंद्र सरकार के इशारे पर आरके सिन्हा की सिक्योरिटी एजेंसी को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में सलाना 12 करोड़ रुपए का व्यवसाय मिला। आरोप लग रहा है कि उनकी सिक्योरिटी एजेंसी को हर महीने एक करोड़ रुपए ( मैं अनुबंध की राशि की पुष्टि नहीं करता हूं, लेकिन मीडिया में सिक्योरिटी एजेंसी को 12 करोड़ देने के बावजूद चढ़ावा की चोरी पर सवाल उठ रहे हैं।) दिए जा रहे हैं! अगर ऋतुराज सिन्हा उम्मीदवार होते तो श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा की चोरी का मामला और तूल पकड़ सकता था। बहरहाल, चुनाव प्रचार के दौरान चढ़ावा चोरों पर चौतरफा हमला होने जा रहा है।
दीवार पर किनकी तस्वीर
प्रशांत किशोर के प्रोफेशनल जहां भी चुनावी कमान संभालते हैं, वहां सबसे पहले वर्तमान व पूर्व वार्ड पार्षद, मुखिया, सरपंच, जिला पार्षद को साधते हैं। उन्हें संगठन से जोड़कर बूथों पर व्यूह रचना करते हैं। बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में अधिकांश ( करीब 75 प्रतिशत) वार्ड पार्षद भाजपा नेता हैं। उन्हें तोड़कर जन सुराज के अभियान में शामिल करना आसान नहीं होगा। जब बोचहां उप चुनाव में जनता ने विरोध की कमान संभाली, मुखिया, जिला पार्षद और वार्ड पार्षदों ने भी राजद की मदद कर दी या घर में चुप बैठ गए। जन सुराज ने उन वार्ड पार्षदों से पराजित ( पटना नगर निगम चुनाव में) नेताओं को साधने का प्रयास किया। जब जन सुराज के प्रोफेसनल निगम चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे नेताओं से मिलने पहुंचे, तो उनके घरों की दीवार देखकर चौंक गए। बांकीपुर में वार्ड पार्षद चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे नेताओं में से अधिकांश के घरों पर दो तस्वीरें टंगी देखी। दीवारों पर टंगी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की तस्वीरें देखकर समझ में आया कि इन्हें तोड़ना आसान नहीं है।
भाजपा के पास संगठन है, संसाधन (करोड़ों रुपए) सरकार है, चुनाव आयोग है, केंद्रीय मंत्री और राज्य सरकार के मंत्री हैं, सांसद-विधायक हैं। जन सुराज पार्टी के पास सिर्फ प्रशांत किशोर हैं। हालांकि पैसा के मामले में प्रशांत किशोर कमजोर नहीं हैं। वे चुनावों में पूरे देश में पैसा के लिए, पैसा के बल पर चुनाव अभियान चलाने के लिए जाने जाते हैं। अगर इस उप चुनाव में सभी प्रत्याशियों द्वारा कुल मिलाकर 20-25 करोड़ रुपए खर्च का अनुमान लगाया जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। भाजपा हो या जन सुराज, अगर आज पता चल जाए कि 50 करोड़ खर्च करने पर जीत की गारंटी है तो रातोंरात पेटियां दी जाएंगी।
प्रोफेसनल को तोड़ने की तैयारी
भाजपा बांकीपुर में जन सुराज पार्टी द्वारा तैनात प्रोफेसनल्स को तोड़ने की तैयारी में है। जन सुराज के कुछ शीर्ष अधिकारी ( प्रोफेशनल) प्रशांत किशोर को खुश रखने के लिए प्रोफेशनल्स की हकमारी करते रहे हैं। ऐसे प्रोफेसनल्स को बताया जा रहा है कि उनकी कंपनी सैलरी तो अगले महीने के पहले सप्ताह में देगी, इस बीच अगर भाजपा को गोपनीय सूचनाएं देते रहें, मदद करते रहें तो उन्हें सैलरी से दूना एडवांस मिलेगा। यह भी प्रचारित किया जा रहा है कि चुनाव के बाद प्रशांत किशोर बिहार से बोरिया बिस्तर समेट लेंगे। अगले महीने के वेतन का इंतजार छोड़कर भाजपा को अपने अनुभव और आंकड़े का लाभ दें। अगर प्रोफेसनल्स उप चुनाव में भाजपा के लिए काम करें तो पैकेज में 40 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ भाजपा की चुनाव प्रबंधन टीम में नियुक्त किए जाएंगे। भाजपा के चुनाव अभियान की कमान संभालने वाली हजारों प्रोफेसनल्स की टीम सालों भर एक राज्य से दूसरे राज्य में काम करती रहती है। प्रशांत किशोर को उन प्रोफाइल्स की पहचान करनी पड़ेगी जो पिछले विधानसभा चुनाव में बिक गए और लाखों की सौदेबाजी किए। कुछ शीर्ष प्रोफेशनल भले ही प्रशांत किशोर के भरोसेमंद होने का नाटक कर रहे हैं, परन्तु वे अंदर-अंदर भाजपा के संपर्क में हैं। गद्दारों को किनारे कर ऐसे प्रोफेसनल्स को समय रहते पुरस्कृत करना होगा, जिन्होंने विधानसभा चुनाव 2025 और उससे पहले के उप चुनाव में इमानदारी व मेहनत से काम किया। कभी बिके नहीं!
प्रत्याशी चयन में चूक!
सवाल उठ रहा है कि क्या प्रत्याशी चयन में जन सुराज पार्टी से चूक हुई है? इस आलेख में मैंने उन सकारात्मक अवसरों पर विस्तार से चर्चा की है, जिनकी वजह से प्रशांत किशोर पर खुद चुनाव लड़ने का दबाव बढ़ता गया। प्रशांत किशोर ने जब अपने वरीय प्रोफेशनल का मन टटोलना शुरू किया तो बात लीक हो गई। प्रशांत किशोर के अंतिम निर्णय पर पहुंचने से पहले ही टीआरपी बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया ने बांकीपुर में उनकी उम्मीदवारी की घोषणा कर डाली। नीट छात्रा हत्याकांड, भरत तिवारी हत्याकांड और श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा की चोरी से उपजे जनाक्रोश के बाद प्रशांत किशोर पर दबाव और बढ़ गया! मीडिया में प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी को इतनी हवा दी गई कि उनका पीछे हटना संभव नहीं रहा। भाजपा को उसी की शैली में घेरने के लिए प्रशांत किशोर के सामने एक मजबूत विकल्प था। नीट छात्रा की मां को प्रत्याशी बनाकर बिहार में विधि व्यवस्था को चुनावी मुद्दा बनाया जा सकता था। युवाओं, महिलाओं और आम जनता के बीच जाकर नीट छात्रा की मां बता सकती थी कि उसकी बेटी की अस्मत लूटने और हत्या के मामले में भाजपा जेडीयू के मंत्रियों और पुलिस उच्चाधिकारियों ने किसके इशारे पर, किस-किस को बचाने के लिए चुप्पी साधी। जैसे भाजपा ने कोलकाता में आरजीकर मेडिकल कॉलेज की ट्रेनी डॉक्टर की अस्मत लूटने के बाद उसकी जघन्य हत्या की गई, पूरे पश्चिम बंगाल में आक्रोश फैला। बिहार में वही आक्रोश नीट छात्रा हत्याकांड के खिलाफ उभरा है। प्रशांत किशोर को कुछ लोगों ने भरत तिवारी की मां को प्रत्याशी बनाने की सलाह दी, परन्तु वे खुद नीट छात्रा की मां को उम्मीदवार बनाना चाह रहे थे। इसकी वजह थी।भाजपा ने पश्चिम बंगाल में तृणमूल सरकार को घेरने के लिए दिवंगत डाक्टर की मां को विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाया , और वे न सिर्फ चुनाव जीत गईं, बल्कि उनकी भाजपा को उनकी उम्मीदवारी का लाभ पूरे बंगाल में मिला। प्रशांत किशोर भी उसी तरह नीट छात्रा की मां को उम्मीदवार बनाकर बिहार में एनडीए उम्मीदवार को घेर सकते थे, लेकिन उन पर खुद लड़ने का दबाव बढ़ता गया।
बाहरी नेता क्या कर लेंगे
जैसे बोचहां उप चुनाव में भाजपा के बाहरी नेता और कार्यकर्ता कुछ नहीं कर पाए, वैसे सी बांकीपुर में भी बाहरी नेता और प्रचारक समां नहीं बांध पाएंगे। प्रशांत किशोर को बांकीपुर में अपनी पिछली गलतियों से परहेज करना पड़ेगा। प्रायः जब किसी जिले में जन सुराज की बड़ी रैली या प्रशांत किशोर की सभा होती है, उनके प्रोफेसनल्स बड़ी संख्या में बसों की हायरिंग कर सीमावर्ती जिलों से लोगों की भीड़ जुटा लेते हैं। रैली सभाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी कम होती है। बाहरी भीड़ से जंग नहीं जीती जा सकती है। प्रशांत किशोर के नामांकन में भीड़ जुटाने के लिए अगर उनके प्रोफेसनल्स दूसरे जिलों को आमंत्रित करते रहे तो भद पिट जाएगी। प्रशांत किशोर के नामांकन में और चुनाव अभियान में जितनी बड़ी संख्या में बांकीपुर के वोटरों को, पटना शहर के नेता कार्यकर्ता को शामिल किया जाएगा, उम्मीदवार को उतनी अधिक ताकत मिलेगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशांत किशोर और उनके शीर्ष प्रोफेशनल्स बांकीपुर के लोगों को कितने बड़े पैमाने पर अपने चुनाव अभियान की बागडोर सौंप पाते हैं। चुनाव वही जीतेगा जिसके काफिले में स्थानीय लोगों की फौज होगी।
किसका वाटरलू
प्रशांत किशोर जब चाहते किसी राज्य के कोटे से राज्यसभा की सदस्यता पा सकते थे, परन्तु उन्होंने पिछले दरवाजे से प्रवेश को अपनी शान के खिलाफ समझा। अगर वे बांकीपुर उप चुनाव में भाजपा को पटखनी देते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर लेंगे। चुनाव लड़ने और जीतने के लिए प्रशांत किशोर को बांकीपुर से बेहतर और आसान गलियारा कभी नहीं मिलेगा, लेकिन इसके लिए एड़ी-चोटी एक करनी पड़ेगी। भाजपा भी कोई असर नहीं छोड़ने जा रही है। यही वजह है कि बांकीपुर में त्रिकोणात्मक भिड़ंत होने जा रहा है। अगर प्रशांत जीत गए तो बिहार में पूरे दमखम के साथ लोकसभा चुनाव 2029 की तैयारी में जुट जाएंगे। अगर वे हार जाते हैं तो बांकीपुर उनके लिए वाटरलू साबित होगा!

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