ग्लानि, भय और हीनता के भँवर से निकलना ही आत्मविश्वास की पहली जीत : बिमल सर्राफ

ग्लानि, भय और हीनता के भँवर से निकलना ही आत्मविश्वास की पहली जीत : बिमल सर्राफ


जे टी न्यूज, रक्सौल, पूर्वी चंपारण : मनुष्य के भीतर छिपी प्रतिभा और क्षमता को सबसे अधिक नुकसान बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उसके भीतर जन्म लेने वाली ग्लानि, भय, हीनता और नकारात्मक सोच पहुँचाती है। ये भाव धीरे-धीरे एक ऐसे भँवर का रूप ले लेते हैं, जिसमें फँसकर व्यक्ति अपनी वास्तविक क्षमताओं को पहचानना और उनका उपयोग करना भूल जाता है।

ग्लानि व्यक्ति को अतीत की गलतियों में बाँधे रखती है, भय उसे भविष्य की आशंकाओं से घेरता है और हीनता का भाव वर्तमान में उसके आत्मविश्वास को कमजोर करता है। जब ये तीनों भाव एक साथ मन पर हावी हो जाते हैं, तो व्यक्ति का सामाजिक, पारिवारिक और पेशेवर जीवन प्रभावित होने लगता है। वह स्वयं पर संदेह करने लगता है और धीरे-धीरे उसकी निर्णय लेने की क्षमता भी कमजोर पड़ने लगती है।

उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।

इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए सबसे पहला कदम है—स्वयं को स्वीकार करना। अपनी कमजोरियों को स्वीकार करना हार नहीं, बल्कि सुधार की शुरुआत है। हमें यह समझना होगा कि अतीत की गलतियाँ हमारी पूरी पहचान नहीं हैं और असफलताएँ हमारे भविष्य का अंतिम निर्णय नहीं करतीं।

नकारात्मक आत्मसंवाद भी व्यक्ति की मानसिक शक्ति को भीतर से कमजोर करता है। इसलिए स्वयं से बात करने का तरीका बदलना आवश्यक है। “मैं नहीं कर सकता” की जगह “मैं प्रयास कर सकता हूँ” और “मैं असफल हूँ” की जगह “मैं अपनी गलतियों से सीख रहा हूँ” जैसी सकारात्मक सोच व्यक्तित्व में नई ऊर्जा पैदा करती है।

हालाँकि वर्षों से चली आ रही नकारात्मक सोच को बदलना आसान नहीं होता। इसके लिए धैर्य, निरंतर प्रयास और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है। जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव, अच्छे लोगों का साथ, रचनात्मक कार्य और आत्मचिंतन इस परिवर्तन को मजबूत आधार प्रदान कर सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण है अपने प्रति सम्मान और विश्वास विकसित करना। जब व्यक्ति दूसरों की स्वीकृति से अधिक अपने अंतर्मन की स्वीकृति को महत्व देने लगता है, तब उसके भीतर वास्तविक आत्मसम्मान जन्म लेता है। यही आत्मसम्मान धीरे-धीरे भय को साहस में, हीनता को आत्मविश्वास में और ग्लानि को आत्मबोध में बदलने की शक्ति देता है

जीवन में परिस्थितियाँ हमेशा हमारे अनुकूल हों, यह आवश्यक नहीं; लेकिन परिस्थितियों का सामना किस मानसिकता से करना है, यह हमारे हाथ में है। इसलिए ग्लानि, भय और हीनता को अपनी पहचान नहीं, बल्कि बदलने योग्य मानसिक अवस्थाएँ समझना चाहिए।

जिस दिन इंसान अपने भीतर के भय और हीनता के भँवर से बाहर निकलकर स्वयं पर विश्वास करना सीख जाता है, उसी दिन उसकी वास्तविक क्षमताओं के विकास की यात्रा शुरू हो जाती है।

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