दो दशक से वेतनानुदान की प्रतीक्षा, अब स्थायी वेतनमान की उठी आवाजl

दो दशक से वेतनानुदान की प्रतीक्षा, अब स्थायी वेतनमान की उठी आवाज

जे टी न्यूज, पटना: वित्त रहित शिक्षा नीति समाप्त हुए करीब 20 वर्ष बीत जाने के बाद भी परीक्षाफल आधारित वेतनानुदान की अनिश्चितता झेल रहे माध्यमिक, इंटरमीडिएट एवं डिग्री महाविद्यालयों के शिक्षकों एवं शिक्षकेतर कर्मियों की समस्या को बिहार विधान परिषद की याचिका समिति के अध्यक्ष डॉ. संजीव कुमार सिंह ने गंभीरता से उठाया है। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर वर्षों से लंबित वास्तविक बकाया वेतनानुदान का एकमुश्त भुगतान कराने तथा परीक्षाफल आधारित वेतनानुदान की मौजूदा व्यवस्था के स्थान पर सम्मानजनक एवं नियमित वेतन-संरचना निर्धारित करने के लिए स्पष्ट और स्थायी नीति बनाने का आग्रह किया है।
डॉ. सिंह ने अपने पत्र में कहा है कि बिहार में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विस्तार में वित्त रहित माध्यमिक विद्यालयों, इंटरमीडिएट महाविद्यालयों एवं डिग्री महाविद्यालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। जिस दौर में राज्य के अनेक क्षेत्रों में सरकारी स्तर पर पर्याप्त शिक्षण संस्थानों की आधारभूत संरचना उपलब्ध नहीं थी, उस समय निजी प्रबंधन द्वारा स्थापित इन संस्थानों ने सीमित संसाधनों में विद्यालय एवं महाविद्यालय संचालित कर हजारों-लाखों विद्यार्थियों को शिक्षा उपलब्ध कराने का दायित्व निभाया।
*नीति बदली, लेकिन अनुदान की तस्वीर नहीं बदली*
पत्र के अनुसार वित्त रहित शिक्षा नीति की समाप्ति के बाद सरकार ने यह व्यवस्था स्वीकार की थी कि जिन संस्थानों में आवश्यक आधारभूत संरचना और निर्धारित मापदंडों के अनुरूप शैक्षणिक व्यवस्था उपलब्ध है, वहां रिक्ति एवं मांग के आधार पर कार्यरत शिक्षकों एवं कर्मियों को परीक्षाफल आधारित वेतनानुदान दिया जाएगा।
डॉ. सिंह ने इसे इन संस्थानों में वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों एवं कर्मियों के योगदान को सरकारी स्तर पर मान्यता देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। हालांकि, उन्होंने चिंता जताई कि करीब दो दशक गुजर जाने के बावजूद वेतनानुदान की राशि में कोई वृद्धि नहीं की गई है और वास्तविक परीक्षाफल आधारित अनुदान की राशि से भी शिक्षाकर्मी वंचित हैं।
उन्होंने अनुदान की अधिसीमा संबंधी शर्तों को शिथिल करते हुए व्ययगत सभी शैक्षणिक सत्रों से जुड़े वर्षों से लंबित वास्तविक बकाये का एकमुश्त भुगतान कराने की मांग की है।
*सेवानिवृत्त हो गए, कई शिक्षाकर्मी दुनिया से चले गए*
डॉ. सिंह ने पत्र में इस समस्या के मानवीय पक्ष को भी प्रमुखता से उठाया है। उन्होंने कहा कि अत्यल्प अथवा अनिश्चित आय के बीच वर्षों तक सेवा देने वाले अनेक शिक्षक एवं कर्मी आर्थिक कठिनाइयों से जूझते हुए सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जबकि कई असमय दिवंगत भी हो गए।
ऐसे में मामला केवल बकाया राशि के भुगतान का नहीं है, बल्कि यह वर्षों की सेवा, श्रम, सम्मान, सुरक्षा, भविष्य और मानवीय गरिमा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
उन्होंने कहा कि संसाधनों के अभाव के बावजूद इन शिक्षकों एवं कर्मियों ने कई दशकों तक राज्य की शिक्षा व्यवस्था का दायित्व निभाया है। आज जरूरत केवल लंबित अनुदान देने की नहीं, बल्कि उनके भविष्य और सेवा की गरिमा को स्थायी आधार देने की है।


*सरकार को भी मिलेगा आधारभूत संरचना का लाभ*
पत्र में समस्या का आर्थिक एवं व्यावहारिक पक्ष भी रखा गया है। डॉ. सिंह ने कहा कि इन शिक्षण संस्थानों के पास पहले से ही भूमि, भवन, खेल मैदान, प्रयोगशाला, पुस्तकालय एवं अन्य आवश्यक शैक्षणिक संसाधन उपलब्ध हैं। इनमें से अनेक संसाधन वर्षों के प्रयास और निजी प्रबंधन से विकसित किए गए हैं।
उनका तर्क है कि यदि सरकार इन संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों एवं कर्मियों के लिए सम्मानजनक एवं नियमित वेतन-संरचना निर्धारित करती है तो सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय भार जरूर आएगा, लेकिन इसके बदले राज्य को पहले से उपलब्ध विशाल शैक्षणिक आधारभूत संरचना का लाभ मिलेगा। इससे नए संस्थानों के निर्माण एवं आधारभूत संरचना के विकास पर होने वाले भारी खर्च की आवश्यकता भी काफी हद तक कम हो सकती है।
*समानता और सामाजिक न्याय का भी सवाल*
डॉ. सिंह ने मामले को समानता एवं सामाजिक न्याय से भी जोड़ा है। पत्र में कहा गया है कि बिहार में समान अथवा मिलती-जुलती प्रबंधकीय व्यवस्था के तहत संचालित अल्पसंख्यक विद्यालयों, मदरसा एवं संस्कृत विद्यालयों के शिक्षकों एवं कर्मियों को नियमित शिक्षकों की तरह वेतनमान एवं अन्य सुविधाएं दी जा रही हैं।
ऐसी स्थिति में वर्षों से राज्य की शैक्षणिक व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दे रहे माध्यमिक, इंटरमीडिएट एवं डिग्री महाविद्यालयों के शिक्षकों एवं कर्मियों के लिए परीक्षाफल आधारित वेतनानुदान की व्यवस्था का स्थायी समाधान क्यों नहीं हो, यह स्वाभाविक और न्यायसंगत सवाल है।
*पांच दशक से सेवा, फिर भी भविष्य अनिश्चित*
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि कई शिक्षक एवं कर्मी लगभग पांच दशकों से उन्हीं संस्थानों में रहकर विद्यार्थियों को शिक्षित करते आ रहे हैं। इन अनुदानित शिक्षण संस्थानों का राज्य के सकल नामांकन अनुपात (GER) में भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
डॉ. सिंह ने कहा कि ऐसे अनुभवी शिक्षाकर्मियों का भविष्य अनिश्चित वेतनानुदान व्यवस्था पर अनंतकाल तक निर्भर रखना न मानवीय दृष्टि से उचित है और न ही शिक्षा व्यवस्था के दीर्घकालिक हित में। इससे शिक्षकों एवं कर्मियों में असुरक्षा की भावना पैदा होती है तथा योग्य एवं अनुभवी शिक्षाकर्मियों के मनोबल पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
*2007 के बाद नियुक्त शिक्षकों के नियमितीकरण की मांग*
डॉ. सिंह ने संबद्ध डिग्री महाविद्यालयों में 19 अप्रैल 2007 के बाद विधिवत नियुक्त एवं अद्यतन कार्यरत शिक्षकों के सेवा नियमितीकरण के लिए विभाग को आवश्यक कार्रवाई का निर्देश देने की मांग की है। साथ ही 19 अप्रैल 2007 के पूर्व के शेष वंचित शिक्षकों के नियमितीकरण की कार्रवाई पूरी कराने का भी आग्रह किया है।
*तीनों कोटि के गैर-वित्त अनुदानित संस्थानों के लिए नीति की मांग*
पत्र में वित्त रहित शिक्षा नीति समाप्त होने के बाद मान्यताप्राप्त एवं संबद्ध गैर-वित्त अनुदानित तीनों कोटि के शिक्षण संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों एवं कर्मियों की स्थिति का भी उल्लेख किया गया है। डॉ. सिंह के अनुसार स्पष्ट वेतनानुदान नीति के अभाव में ये संस्थान और उनमें कार्यरत शिक्षक-कर्मी नीति-विहीन स्थिति का सामना कर रहे हैं।


उन्होंने इनके हित में भी न्यायपूर्ण वेतनानुदान नीति अविलंब लागू करने की आवश्यकता बताई है, ताकि राज्य की शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया जा सके।
*शिक्षक दिवस पर घोषणा की उम्मीद*
डॉ. संजीव कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि वर्षों से लंबित इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति के माध्यम से समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। उन्होंने उम्मीद जताई है कि आगामी 5 सितंबर, शिक्षक दिवस के अवसर पर सरकार इस नीति के स्थायी समाधान को लेकर स्पष्ट एवं सकारात्मक घोषणा करेगी।
उन्होंने कहा कि ऐसी पहल से संबंधित शिक्षकों एवं कर्मियों को वर्षों से चली आ रही आर्थिक अनिश्चितता से मुक्ति मिलेगी और ‘सबका साथ, सबका विकास’ एवं ‘न्याय के साथ विकास’ की भावना को वास्तविक रूप में सार्थक किया जा सकेगा।
*डॉ. सिंह की प्रमुख मांगें*
वर्षों से लंबित वास्तविक परीक्षाफल आधारित बकाया वेतनानुदान का एकमुश्त भुगतान।
अनुदान की अधिसीमा संबंधी शर्तों को शिथिल करना।
परीक्षाफल आधारित व्यवस्था के स्थान पर सम्मानजनक एवं नियमित वेतन-संरचना की स्थायी नीति।
19 अप्रैल 2007 के बाद विधिवत नियुक्त शिक्षकों का सेवा नियमितीकरण।
19 अप्रैल 2007 के पूर्व के शेष वंचित शिक्षकों के नियमितीकरण की कार्रवाई पूरी करना।
गैर-वित्त अनुदानित तीनों कोटि के शिक्षण संस्थानों के लिए न्यायपूर्ण वेतनानुदान नीति लागू करना।
वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों एवं कर्मियों के सम्मान, सुरक्षा, भविष्य और सेवा की गरिमा को स्थायी आधार प्रदान करना।

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