राष्ट्रीय पुस्तक मेले में गूंजी ‘कोठेवाली कलाविनी’ की गूंज, तवायफों के अनसुने संघर्ष और कला को किया उजागर

कथक, ठुमरी और दादरा जैसी कलाओं के संरक्षण में तवायफों की भूमिका पर केंद्रित है कमल किशोर वर्मा की पुस्तक

राष्ट्रीय पुस्तक मेले में गूंजी ‘कोठेवाली कलाविनी’ की गूंज, तवायफों के अनसुने संघर्ष और कला को किया उजागर
कथक, ठुमरी और दादरा जैसी कलाओं के संरक्षण में तवायफों की भूमिका पर केंद्रित है कमल किशोर वर्मा की पुस्तक

जे टी न्यूज़, लखनऊ : स्थानीय बलराम गार्डन में आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेले में लेखक कमल किशोर वर्मा की चर्चित पुस्तक ‘कोठेवाली कलाविनी’ का लोकार्पण किया गया। दिल्ली के प्रकाशक फ्लाईड्रीम्स द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक तवायफों के जीवन, उनके संघर्ष और उनके भीतर छिपी कला प्रतिभा को केंद्र में रखती है।

पुस्तक में तवायफों से जुड़ी अनेक अनसुनी कहानियों को संकलित किया गया है। लेखक के अनुसार, इसका उद्देश्य उस दौर की उन महिलाओं के जीवन और कला पक्ष को सामने लाना है, जिनका कथक, संगीत, ठुमरी, दादरा और अन्य लोक कलाओं के संरक्षण एवं विकास में योगदान रहा।

लोकार्पण के अवसर पर लेखक कमल किशोर वर्मा ने कहा कि कथक जैसे नृत्य तथा ठुमरी, दादरा सहित विभिन्न लोक गायन और कलाओं को जीवित रखने, उनका संरक्षण करने और उन्हें आगे बढ़ाने में तवायफों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी उनकी भूमिका का उल्लेख किया।

पुस्तक पर चर्चा करते हुए लेखक ने कहा कि तवायफों की एक अलग दुनिया हुआ करती थी, जो दिन ढलने के बाद शुरू होती थी। सूर्यास्त के बाद जब लोग दिनभर की थकान के पश्चात अपने घर लौटते थे, उसी समय उनकी महफिलें सजती थीं। कला में दक्ष ये कलाविनियां अपने अभिनय, अदा और प्रस्तुति के माध्यम से दर्शकों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बनाती थीं।

उन्होंने कहा कि ‘कोठेवाली कलाविनी’ उस दौर की कहानी है, जब कला, संवेदना और आत्मसम्मान एक नाजुक संतुलन के साथ जीवन का हिस्सा थे। पुस्तक में इसी सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश के विभिन्न पहलुओं को सामने लाने का प्रयास किया गया है।

पुस्तक के लोकार्पण अवसर पर दिल्ली से मिथिलेश गुप्ता, पटना से अभिलाष दत्ता, झांसी से पुष्पेंद्र सिंह, लखनऊ से शैलेंद्र श्रीवास्तव, सिमी शैलेंद्र एवं मीरा अनुरागिनी तथा विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय संपर्क समन्वयक डॉ. नन्दकिशोर साह सहित कई वरिष्ठ साहित्यकार, लेखक, कवि और विद्वान उपस्थित रहे।

 

राष्ट्रीय पुस्तक मेले में पुस्तक के लोकार्पण के दौरान साहित्य एवं कला से जुड़े लोगों ने ‘कोठेवाली कलाविनी’ को इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा के एक ऐसे पक्ष को सामने लाने वाली कृति के रूप में चर्चा की, जो लंबे समय से व्यापक विमर्श से बाहर रहा है।

Related Articles

Back to top button