सुरों से संवरता भविष्य: कस्तूरबा की बेटियों को नई उड़ान देती मंगलेश कुमार की अनूठी साधना
सुरों से संवरता भविष्य: कस्तूरबा की बेटियों को नई उड़ान देती मंगलेश कुमार की अनूठी साधना

जे टी न्यूज़, समस्तीपुर : बिहार के समस्तीपुर जिले की 25 कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालयों (KGBV) में इन दिनों एक मूक क्रांति जन्म ले रही है। यह क्रांति किसी नारे या आंदोलन की नहीं, बल्कि शास्त्रीय सुरों, तानपूरे की झंकार और लोकधुनों की है। इस सुरमयी बदलाव के केंद्र में हैं उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय, बेला पंचरुखी के संगीत शिक्षक मंगलेश कुमार। समाज के सबसे उपेक्षित और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली एक हज़ार से अधिक बेटियों के जीवन में वे आत्मविश्वास, स्वाभिमान और सशक्तिकरण के सशक्त संवाहक बनकर उभरे हैं।
1. डिजिटल सेतु: अभावों के बीच कला और नवाचार का मिलन
कस्तूरबा विद्यालयों में पढ़ने वाली अधिकांश छात्राएं आर्थिक तंगी, सामाजिक विषमता और सीमित संसाधनों से जूझते परिवारों से आती हैं। ऐसे परिवेश में शास्त्रीय संगीत की व्यवस्थित और शास्त्रीय तालीम पाना किसी दूर के सपने जैसा था।
भौगोलिक सीमाओं और भौतिक साधनों की कमी को मंगलेश कुमार ने कभी बाधा नहीं बनने दिया। उन्होंने आधुनिक तकनीक को अपनी साधना का माध्यम बनाया। एक लैपटॉप, इंटरनेट कनेक्शन और हेडफोन के सहारे शुरू हुई यह ‘वर्चुअल संगीत पाठशाला’ आज जिले भर के 25 कस्तूरबा विद्यालयों के लिए उम्मीदों की प्रयोगशाला बन चुकी है।
वे प्रतिदिन छात्राओं को न केवल राग यमन, भूपाली और बिहाग जैसे गंभीर शास्त्रीय रागों का गहन अभ्यास कराते हैं, बल्कि भारत की लुप्तप्राय लोक परंपराओं—विशेषकर बनारस के अखाड़े की कजरी, दादरा और चैती के आरोह-अवरोह, ताल, लय व भाव की सूक्ष्मताओं से भी समृद्ध कर रहे हैं।
2. मौन से मंच तक: झिझक का अंत और अदम्य आत्मविश्वास
हर दिन का नियमित एक घंटे का रियाज़ इन बेटियों के लिए केवल संगीत की क्लास नहीं, बल्कि मानसिक संकोचों से मुक्ति का उत्सव बन गया है:
संशय और हीनभावना से मुक्ति: कई छात्राएं जो दृष्टि दोष, शारीरिक सीमाओं या अत्यधिक अंतर्मुखी स्वभाव के कारण खुद को समाज की नजरों से छिपाए रखती थीं, वे आज सुरों की शक्ति से खिल उठी हैं। मंच के जिस खौफ से वे कभी कांपती थीं, आज उसी मंच पर बैठकर वे निर्भीक कंठ से श्रोताओं को सम्मोहित कर रही हैं।
संज्ञानात्मक विकास और शैक्षणिक उत्कृष्टता: संगीत के सात सुर और ताल की गणितीय गणना मस्तिष्क को विलक्षण एकाग्रता प्रदान करती है। निरंतर स्वर-साधना ने इन बालिकाओं की स्मरण शक्ति, धैर्य और मानसिक संतुलन को सुदृढ़ किया है। शिक्षकों का मानना है कि इस संगीत अभ्यास के बाद छात्राओं की सामान्य विषयों (जैसे गणित और विज्ञान) में रुचि और परीक्षा परिणामों में स्पष्ट सुधार आया है।
3. सामाजिक रूपांतरण: कारागार की चहारदीवारी से पर्यावरण चेतना तक
मंगलेश कुमार के जीवन-दर्शन में संगीत केवल मनोरंजन या मंच प्रदर्शन की वस्तु नहीं, बल्कि “चेतना के परिष्कार और अंतर्मन के रूपांतरण का सबसे शक्तिशाली अस्त्र” है। उनके इस दर्शन के प्रमाण उनके अतीत और वर्तमान के कार्यों में स्पष्ट दिखते हैं:
कारागार में सुरों का उजाला: कस्तूरबा की बेटियों को तराशने से पूर्व, उन्होंने समस्तीपुर मंडल कारा के बंदियों के बीच पूरे एक वर्ष तक निःशुल्क संगीत की अलख जगाई थी। अपराधबोध और निराशा में डूबे कैदियों के दिलों में सुरों के माध्यम से पश्चाताप और सकारात्मकता का संचार कर उन्होंने कई भटके हुए जीवनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा।
पर्यावरण और सामाजिक दायित्व: संगीत शिक्षक होने के साथ-साथ वे पर्यावरण संरक्षण के प्रति भी उतने ही निष्ठावान हैं। ‘मिशन लाइफ’ (इको क्लब) के राज्य स्तरीय मास्टर ट्रेनर के रूप में वे बेटियों को कला के साथ-साथ प्रकृति के संरक्षण, जल-संवर्धन और स्वच्छता के प्रति भी सजग नागरिक बना रहे हैं

4. दूरदर्शी लक्ष्य: स्वावलंबन की स्थायी वीणा
मंगलेश कुमार की यह यात्रा बेटियों को महज एक अच्छा गायक बनाने पर समाप्त नहीं होती; उनका वास्तविक संकल्प इन बच्चियों के हाथों में स्थायी आत्मनिर्भरता की बागडोर सौंपना है। उनकी स्पष्ट दूरदृष्टि है:
”मेरा प्रयास इन बेटियों को केवल मंच पर ताली बटोरने तक सीमित रखना नहीं है। मेरी साधना तब सफल होगी, जब कस्तूरबा की ये बेटियां कल संगीत प्रभाकर और विशारद की डिग्रियों के साथ स्वयं कस्तूरबा विद्यालयों, कस्तूरबा ट्रस्टों और शैक्षणिक संस्थानों में संगीत शिक्षिका बनकर पदस्थापित होंगी। जब एक वंचित बेटी अपने पैरों पर खड़ी होकर दूसरी अभावग्रस्त बेटी के जीवन में सुरों की रोशनी भरेगी, तब समाज का वास्तविक सशक्तिकरण होगा।”
अभावों की पथरीली जमीन पर उम्मीदों के सुर बोने का यह अभियान आज पूरे बिहार के लिए एक प्रेरक मिसाल बन चुका है। मंगलेश कुमार की यह अनूठी पहल साबित करती है कि अगर इरादों में निस्वार्थ सेवा का भाव हो, तो स्क्रीन की छोटी सी खिड़की से भी भविष्य का अनंत आकाश संवारा जा सकता है।



