मदन मोहन झा के पिछ्ले तीन वर्षों में 11 प्रश्न, शिक्षक-शिक्षा से जुड़ा एक भी नहीं!
दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में पुनः चुनाव से पहले उठे गंभीर सवाल—शिक्षक प्रतिनिधित्व का रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है?
मदन मोहन झा के पिछ्ले तीन वर्षों में 11 प्रश्न, शिक्षक-शिक्षा से जुड़ा एक भी नहीं!
दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में पुनः चुनाव से पहले उठे गंभीर सवाल—शिक्षक प्रतिनिधित्व का रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है?

जे टी न्यूज, दरभंगा:
दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में एक बार फिर चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है। वर्तमान विधान परिषद सदस्य मदन मोहन झा पुनः शिक्षकों के बीच पहुंचकर समर्थन और वोट की अपील कर रहे हैं। ऐसे समय में उनके पिछले कार्यकाल के विधान परिषद में प्रदर्शन को लेकर शिक्षकों के बीच सवाल उठना स्वाभाविक है।
बिहार विधान परिषद की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मदन मोहन झा ने अपने पिछले तीन वर्षों में कुल 11 प्रश्न पूछे। चौंकाने वाली बात यह है कि उपलब्ध विवरण के अनुसार इन 11 प्रश्नों में शिक्षक अथवा शिक्षा से संबंधित एक भी प्रश्न शामिल नहीं है। यह आंकड़ा अपने आप में एक गंभीर सार्वजनिक प्रश्न खड़ा करता है।
जिस निर्वाचन क्षेत्र से एक व्यक्ति विधान परिषद में इसलिए भेजा जाता है कि वह शिक्षक समुदाय और शिक्षा जगत की आवाज बने, यदि उसके द्वारा पूछे गए प्रश्नों में शिक्षक एवं शिक्षा से संबंधित प्रश्नों की संख्या शून्य हो, तो शिक्षक मतदाताओं को अपने प्रतिनिधित्व का मूल्यांकन करने का पूरा अधिकार है।
सवाल यह नहीं है कि किसी प्रतिनिधि ने हर शिक्षक समस्या का समाधान क्यों नहीं कराया—क्योंकि हर समस्या का समाधान अकेले किसी विधायक या विधान परिषद सदस्य के अधिकार क्षेत्र में नहीं होता।
बिहार के संबद्ध महाविद्यालयों के शिक्षक वर्षों से वेतन, अनुदान, सेवा शर्तों, नियुक्ति, पदोन्नति, आधारभूत सुविधाओं और अन्य समस्याओं का सामना करते रहे हैं।
ऐसे में शिक्षक समाज यह जानना चाहता है कि इन समस्याओं को विधान परिषद में प्रश्न के रूप में कितनी बार उठाया गया?
यदि विधान परिषद की वेबसाइट पर उपलब्ध रिकॉर्ड में पिछले तीन वर्षों के 11 प्रश्नों में शिक्षक एवं शिक्षा से संबंधित एक भी प्रश्न नहीं है, तो यह आंकड़ा निश्चित रूप से सार्वजनिक चर्चा और आत्ममंथन का विषय बनता है।
अब जबकि पुनः चुनाव सामने है और वोट मांगने का दौर शुरू हो रहा है, शिक्षक मतदाताओं के सामने कुछ सीधे सवाल हैं—
• पिछले पांच वर्षों में शिक्षक एवं शिक्षा से संबंधित एक भी प्रश्न क्यों नहीं?

• संबद्ध महाविद्यालयों की समस्याएँ सदन में कितनी बार उठाई गईं?
• शिक्षकों की सेवा संबंधी समस्याओं पर विधान परिषद में क्या पहल हुई?
• शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को लेकर सरकार से कितनी बार जवाब मांगा गया?
• यदि समस्याएँ सदन में उठाई गईं, तो उनका विवरण सार्वजनिक क्यों न किया जाए?
वोट मांगने से पहले रिपोर्ट कार्ड भी दिखाइए
लोकतंत्र में हर जनप्रतिनिधि को पुनः चुनाव लड़ने और मतदाताओं से समर्थन मांगने का अधिकार है। उसी प्रकार मतदाताओं को भी यह पूछने का अधिकार है कि पिछले कार्यकाल में उनका प्रतिनिधि उनके मुद्दों के लिए कितना सक्रिय रहा।
इसलिए इस बार बहस केवल इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि “अगले कार्यकाल में क्या करेंगे?”
बहस का पहला सवाल होना चाहिए— “पिछले कार्यकाल में क्या किया?” और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के संदर्भ में इससे भी सीधा सवाल—
“तीन वर्षों में 11 प्रश्न पूछे गए, लेकिन शिक्षक और शिक्षा से संबंधित एक भी प्रश्न क्यों नहीं?”
यह किसी व्यक्ति के निजी जीवन या व्यक्तिगत योग्यता का प्रश्न नहीं है। यह सार्वजनिक पद और सार्वजनिक जवाबदेही का प्रश्न है। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता यह जानना चाहते हैं कि उनके प्रतिनिधि ने विधान परिषद के मंच का उपयोग उनके मुद्दों को उठाने के लिए किस प्रकार किया

अब चुनाव के समय केवल आश्वासन नहीं, पिछले कार्यकाल का तथ्यात्मक रिपोर्ट कार्ड भी सामने आना चाहिए। “वोट मांगने आइए, लेकिन अपने कार्यकाल का हिसाब लेकर आइए। 11 प्रश्नों की सूची बताइए—और यह भी बताइए कि शिक्षक एवं शिक्षा का सवाल उनमें एक भी क्यों नहीं था?”
क्योंकि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में प्रतिनिधित्व की सबसे पहली कसौटी यही है कि शिक्षक और शिक्षा की आवाज सदन में कितनी मजबूती से सुनाई दी।


