कम्युनिस्ट-इस्लामिक साज़िशों का हौवा* *(आलेख : एम.ए. बेबी)*
कम्युनिस्ट-इस्लामिक साज़िशों का हौवा*
*(आलेख : एम.ए. बेबी)*
जे टी न्यूज
कम्युनिस्ट हमेशा से दक्षिणपंथ के लिए कांटे की तरह रहे हैं। इसलिए यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि आरएसएस के मुखपत्र, ‘ऑर्गनाइज़र’ के 11 अक्टूबर, 2026 के अंक में एक बार फिर इतिहास को गलत साबित करने और अपने सांप्रदायिक एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए कम्युनिस्टों पर हमला करने की जानी-पहचानी तरकीब अपनाई गई है।
इस साप्ताहिक के संपादकीय में, अशोक सिंघल की जन्म शताब्दी पर उनकी तारीफ़ करते हुए कहा गया है कि “बुद्धिजीवियों के मोर्चे पर कम्युनिस्ट-इस्लामिक साज़िशें राम मंदिर पुनर्निर्माण में सबसे बड़ी रुकावट थीं।” जिसका बचाव नहीं किया जा सकता, उसे बचाने की कोशिश में, आरएसएस उन लोगों को बदनाम करना चाहता है, जिन्होंने उसके ऐतिहासिक दावों पर सवाल उठाए हैं, उसके सांप्रदायिक लामबंदी को चुनौती दी है और भारतीय गणराज्य की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद की रक्षा की हैं।
यह गप्प ऐतिहासिक सबूतों को आरोपों से और तर्क को सांप्रदायिक पूर्वाग्रह से प्रतिस्थापित करने की कोशिश है। कम्युनिस्ट हमेशा से कहते रहे हैं कि वे मंदिर बनाने के खिलाफ़ नहीं हैं। हमें तो मंदिर बनाने के लिए मस्जिद तोड़ने पर एतराज़ था। हम अब भी यही कहते हैं कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद वाली जगह पर मंदिर बनाने का आंदोलन, धार्मिक भावनाओं से ज़्यादा आरएसएस/भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति की ऊपज था, जिसका वे फ़ायदा उठाना चाहते थे।

धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने और किसी धार्मिक चिन्ह को बहुसंख्यक लोगों के प्रभुत्व का ज़रिया बनाने की राजनैतिक परियोजना का समर्थन करने में ज़मीन-आसमान का अंतर है। जिन शोधकर्ताओं ने वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर भारतीय इतिहास को एक आधुनिक सामाजिक विज्ञान के रूप में विकसित किया है, उन्होंने बाबरी मस्जिद स्थल से जुडे दावों की सबूतों के आधार पर जांच की और उन दावों पर प्रश्न खड़े किए, जो जांच में कहीं टिक नहीं पाये। ऐसे शोध को साज़िश बताने का मतलब यह कहना है कि ऐतिहासिक शोध तभी सही है, जब वह आरएसएस के दृष्टिकोण को मान्यता दे।
यह बताना ज़रूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2019 में अयोध्या स्वामित्व के मामले में अपने फ़ैसले में, विवादित जगह को मंदिर बनाने के लिए देते हुए भी, 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने को कानून का उल्लंघन बताया था।
कम्युनिस्टों को मुस्लिम तत्ववादियों का सहयोगी दिखाने की कोशिश उसके असली राजनैतिक रिकॉर्ड के सामने आने पर ढह जाती है। यह एक स्थापित तथ्य है कि कम्युनिस्टों ने हमेशा हर तरह के धार्मिक तत्ववाद का विरोध किया है। बहुसंख्यक की सांप्रदायिकता के अलावा, कम्युनिस्टों ने मुस्लिम तत्ववाद और खालिस्तानी अलगाववाद, दोनों का ही डटकर विरोध किया है। पंजाब में खालिस्तानी उग्रवादियों के हाथों कम्युनिस्ट पार्टी के 200 से ज़्यादा कार्यकर्ता और समर्थक शहीद हुए हैं। कश्मीर घाटी में अलगाववादियों के खिलाफ खड़े होने की वजह से हमारे कई साथी मारे गए हैं।
कम्युनिस्ट पार्टी ने कभी भी सिख पहचान को खालिस्तानी उग्रवाद से नहीं जोड़ा। उसका मकसद सामान्यतः सिखों और पंजाबियों के अधिकारों की रक्षा करना था, साथ ही उन लोगों का विरोध करना था, जो हिंसा के ज़रिए पूरे समुदाय की ओर से बात करने का दावा करते थे। कम्युनिस्टों ने कांग्रेस सरकार और पंजाब संकट से उसके अवसरवादी ढंग से निपटने का भी विरोध किया, जिसमें अल्पकालिक राजनैतिक फ़ायदे के लिए उग्रवादी तत्वों का इस्तेमाल करने की कोशिशें भी शामिल थीं।
हमने अलग-अलग समय पर मुस्लिम तत्ववादियों का गुस्सा भी झेला है। शाह बानो फैसले से जुड़ा विवाद इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। 1985 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला को आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा-125 के तहत गुजारा भत्ता पाने का दावा करने के अधिकार को सही ठहराया था। इस फैसले के खिलाफ संकीर्णतावादी मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व के अभियान ने राजीव गांधी सरकार पर मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) कानून, 1986 लागू करने का दबाव डाला। कम्युनिस्टों ने यह तर्क नहीं माना कि मुस्लिम समुदाय के हितों का प्रतिनिधित्व सिर्फ उसके संकीर्णतावादी धार्मिक नेतृत्व द्वारा किया जा सकता है। हमने विधेयक का विरोध किया और मुस्लिम तत्ववादियों के गुस्से का सामना किया।

इसी तरह, जातिगत उत्पीड़न, अस्पृश्यता, पितृसत्ता और धार्मिक कट्टरता का विरोध हिंदुओं के प्रति दुश्मनी नहीं है। बहरहाल, आरएसएस इस अंतर को मिटाना पसंद करता है। हिंदू सांप्रदायिकता की हर आलोचना को मुस्लिम-समर्थक बताकर, वह अपने राजनैतिक कार्यक्रम को जांच-पड़ताल से बचाना चाहता है।
कम्युनिस्टों के प्रति उसकी नफ़रत आज़ादी की लड़ाई के जमाने से जोड़ी जा सकती है। इस सिलसिले में आज़ादी की लड़ाई में कम्युनिस्टों की भूमिका और आरएसएस की भूमिका की तुलना करना भी ज़रूरी है।
भारत की आज़ादी की लड़ाई में कम्युनिस्ट स्वाधीनता सेनानियों की भूमिका दस्तावेजों में अच्छी तरह से दर्ज़ है। सीपीआई(एम) पोलिट ब्यूरो के सभी नौ संस्थापक सदस्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जिन्होंने कई साल ब्रिटिश जेलों में बिताए थे और बाद में कांग्रेस राज में भी जेलों में गए। कॉमरेड ए.के. गोपालन ने 15 अगस्त, 1947 को कन्नानोर (कन्नूर) जेल में राष्ट्रीय ध्वज फहराया था, जहाँ अंग्रेजों ने उन्हें कैद करके रखा हुआ था। हरकिशन सिंह सुरजीत, जो तब स्कूल में थे, को 1932 में पंजाब के होशियारपुर में यूनियन जैक उतारने और तिरंगा फहराने के लिए गिरफ्तार किया गया था। अंडमान की सेलुलर जेल कम्युनिस्टों और क्रांतिकारियों की कुर्बानियों की गवाही देती है।
इसके विपरीत, आरएसएस जान-बूझकर आज़ादी की लड़ाई से दूर रहा, और इसके बजाय उसने सांप्रदायिक लामबंदी पर ध्यान केंद्रित किया। राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े होने का उसका एकमात्र दावा वी.डी. सावरकर पर टिका है, जिनका संदिग्ध रिकॉर्ड इस दावे के खोखलेपन को सामने लाता है। इतिहासकार आर.सी. मजुमदार ने सेलुलर जेल से 14 नवंबर, 1913 को सावरकर द्वारा लिखी रिहाई की दया याचिका का दस्तावेजीकरण किया है। सावरकर ने “संवैधानिक प्रगति और अंग्रेज़ सरकार के प्रति वफ़ादारी का सबसे प्रबल समर्थक” बनने का वादा किया था, और कहा था कि उन्हें पहले इस्तेमाल किए गए हिंसा के तरीकों से नफ़रत है और वे कानून और संवैधानिक तरीकों का साथ देंगे, (पीनल सेटलमेंट इन अंडमान, पेज 211–213 ; फ्रंटलाइन, 7 अप्रैल, 1995)।
इसके बाद, सावरकर की अधिकांश राजनीति ब्रिटिश राज के बजाय कांग्रेस और वाम-नेतृत्व के आंदोलनों के खिलाफ थी। हिंदू महासभा के अध्यक्ष के रूप में, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन को उनके संगठन से कोई समर्थन न मिले और उन्होंने हिंदुओं से इसमें हिस्सा न लेने की अपील की। उन्होंने हिंदू संगठन के लोगों को निर्देश दिया कि वे नौकरी करने के लिए अपने सरकारी पदों पर बने रहे और अपने नियमित कर्तव्यों का निर्वहन करें, (अंबा प्रसाद, द इंडियन रिवोल्ट ऑफ़ 1942 ; ए.जी. नूरानी, फ्रंटलाइन, 1 दिसंबर, 1995)। बॉम्बे गृह विभाग ने खुद रिकॉर्ड किया था कि आरएसएस ने “अगस्त 1942 में हुई गड़बड़ियों में हिस्सा लेने से अपने को अलग रखा था”, (द ब्रदरहुड इन सैफ्रन, 1987)।

*आरएसएस-जिन्ना वैचारिक साम्य* :
दो-राष्ट्र का सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी), जिसने देश के विभाजन का मार्ग प्रशस्त करने में मदद की, सिर्फ़ मोहम्मद अली जिन्ना की बनाई हुई नहीं थी। सावरकर ने इस दृष्टिकोण को पहले ही सामने रखा था। 1937 में अहमदाबाद में हिंदू महासभा को संबोधित करते हुए, उन्होंने कहा था : “आज भारत को एकात्मक और समरूप राष्ट्र नहीं माना जा सकता, बल्कि इसके विपरीत, यहाँ मुख्य रूप से दो राष्ट्र हैं ; हिंदू और मुस्लिम” (समग्र सावरकर वाड्मय, खंड 6, 1963–65)।
1939 में, उन्होंने फिर कहा कि हिंदू अपने आप में एक राष्ट्र हैं। जब मार्च 1940 में, जिन्ना ने इसी तरह का तर्क दिया कि हिंदू और मुस्लिम दो राष्ट्र हैं, जिनके एक राज्य में मिलने से असंतोष पैदा होगा और आखिरकार टूटन होगी, तो सावरकर ने इसके बाद घोषणा की कि उनका “श्रीमान जिन्ना के दो-राष्ट्र के सिद्धांत से कोई झगड़ा नहीं है”, और इस बात पर ज़ोर दिया कि हिंदू और मुसलमान दो राष्ट्र हैं, (इंडियन एनुअल रजिस्टर, 1939 और 1943)।
एम.एस. गोलवलकर ने अपनी किताब ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ में भारत को मुख्य रूप से एक हिंदू राष्ट्र के रूप में देखा था, जहाँ राष्ट्रीय पहचान संवैधानिक नागरिकता से कम और सांस्कृतिक जुड़ाव से ज़्यादा मिलती थी। यह फ़र्क करना बहुत ज़रूरी है। अंबेडकर ने इस दावे का आलोचनात्मक विश्लेषण किया कि क्या हिंदू और मुस्लिम अलग-अलग राष्ट्रों का निर्माण करते हैं और धार्मिक पहचान के ज़रिए राष्ट्र को परिभाषित करने के राजनैतिक परिणामों पर विचार किया। अंबेडकर ने साफ़ कहा कि :
“यह अजीब लग सकता है, लेकिन श्री सावरकर और श्री जिन्ना, एक राष्ट्र बनाम दो राष्ट्र के मुद्दे पर एक-दूसरे के खिलाफ होने के बजाय, इस पर पूरी तरह से सहमत हैं। दोनों सहमत हैं, सिर्फ सहमत ही नहीं हैं, बल्कि इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि भारत में दो राष्ट्र हैं — एक मुस्लिम राष्ट्र और दूसरा हिंदू राष्ट्र। वे सिर्फ़ उन शर्तों और नियमों को लेकर मतभेद रखते हैं, जिन पर दोनों राष्ट्रों को रहना चाहिए।”
असल में, अक्टूबर 1947 में बॉम्बे में आरएसएस के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए, गोलवलकर ने कहा था : “संघ के लिए मेरा प्यार श्री जिन्ना की देन है”। उन्होंने इस संबंध को स्वीकार किया और माना कि वे कैसे एक-दूसरे के पूरक हैं। (शम्सुल इस्लाम : गोलवलकर की ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ : ए क्रिटिक)।
गांधी की हत्या के बाद, सरकार ने 4 फरवरी, 1948 को आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया। बातचीत के बाद, आरएसएस सीधे राजनीति में हिस्सा लेने के बजाय एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में काम करने के लिए राज़ी हो गया और 10 जुलाई, 1949 को उस पर लगा प्रतिबंध हटा लिया गया। इसके बाद इसने अपने प्रभाव से एक राजनैतिक पार्टी बनाने में मदद की। 1951 में, भाजपा से पहले, भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई।

जनसंघ की राजनैतिक उत्तराधिकारी और आरएसएस का मुख्य राजनीतिक हथियार, भाजपा, राज्य की सत्ता हासिल करने के बाद, भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य को एक असहिष्णु हिंदुत्व राष्ट्र में बदलना चाहती है, और आज़ादी, समानता और भाईचारे के संवैधानिक सिद्धांतों को कमज़ोर करना चाहती है।
बाबरी मस्जिद गिराए जाने से यह प्रदर्शित होता है कि धार्मिक गोलबंदी को संवैधानिक ज़िम्मेदारियों से ऊपर रखने के क्या खतरे हैं। इसके बाद बहुसंख्यक की राजनीति के सामान्य होने से राज्य और धार्मिक बहुसंख्यकवाद के बीच का फ़र्क और कमज़ोर हो गया है।
भारतीय धर्मनिरपेक्षता कभी भी धर्म को उसकी जगह न देने पर आधारित नहीं था। यह धर्म और राज्य को अलग करने पर आधारित था। विविधता से भरे इस देश को, हिंदुत्व की परियोजना, बहुसंख्या के ज़रिए फिर से परिभाषित करना चाहती है, जिसमें मुस्लिमों और ईसाइयों को बार-बार अपनी देशभक्ति साबित करनी पड़ती है।
आरएसएस कम्युनिस्टों पर बार-बार झूठे और बेबुनियाद आरोप लगाकर भारतीय राजनीति में अपनी विभाजनकारी भूमिका को नहीं छिपा सकता। लेकिन जोसेफ गोएबल्स के कट्टर अनुयायियों से कुछ और की उम्मीद करना बेवकूफी होगी।
(लेखक माकपा के महासचिव, पूर्व सांसद और केरल के पूर्व शिक्षा मंत्री हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*

