आधुनिक बिहार के निर्माता डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा—व्यक्तित्व, कृतित्व के मुल्यांकन के बगैर बिहार दिवस की क्या उपयोगिता सिद्ध होगी ?

मरणोपरांत भी क्या डा0 सचचिदा नंद सिन्हा जी को सरकार ",भारत- रत्न सम्मान " से विभूषित करेगी ?

आधुनिक बिहार के निर्माता डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा—व्यक्तित्व, कृतित्व के मुल्यांकन के बगैर बिहार दिवस की क्या उपयोगिता सिद्ध होगी ?

मरणोपरांत भी क्या डा0 सचचिदा नंद सिन्हा जी को सरकार “,भारत-
रत्न सम्मान ” से विभूषित करेगी ?

जे टी न्यूज, वैशाली: राष्ट्र – निर्माण के लिए किए गए कार्यों के लिए महात्मा गांधी जी को
‘राष्ट्र पिता’ की उपाधि से विभूषित किया गया ।अपना तन ,मन,धन लगाकर बिहार निर्माता डा0सच्चिदा नंद सिन्हा कोअभी तकबिहारप्रदेश- पिताश्री’की उपाधि से विभूषित नही किया जाना चाहिए था? क्या इतने सारे लोगों को ‘भारत-रत्न ‘की उपाधि मिली क्या इनकी त्याग- तपस्या भारत-रत्न पाने के ‘कराइटेररिया’ को पूरा नही कर पा रहा है।? समृद्ध इतिहास, भूगोल और तन,मन,धनके समर्पण के वाबजूद बिहार दिवस को वे उपेक्षा के शिकार बने रहते है? क्या कायस्थ होने का दुष्परिणाम हैक्या?
भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में अनेक ऐसे महान व्यक्तित्व हुए, जिनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद उन्हें वह राष्ट्रीय सम्मान नहीं मिल सका, जिसके वे वास्तव में अधिकारी थे। ऐसे ही एक युगपुरुष थे डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा, जिन्हें आधुनिक बिहार का निर्माता भी कहा जाता है। उनका जीवन त्याग, तपस्या, दूरदर्शिता और राष्ट्रभक्ति का अनुपम उदाहरण है।


डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा का जन्म 10 नवंबर 1871 को बिहार के आरा
(भोजपुर) जिले में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए, जहाँ उन्होंने विधि (लॉ) की पढ़ाई की। वहाँ रहते हुए वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के विचारों से गहराई से प्रभावित हुए। भारत लौटकर उन्होंने न केवल एक सफल वकील के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की, बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दियाऔर चलती वकालत को लात मारकर समाज,
राष्ट्र के विकास में अपने को समर्पित कर दिया । उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान बिहार को एक पृथक प्रांत के रूप में स्थापित कराने में रहा। उस समय बिहार, बंगाल प्रांत का हिस्सा था और
उसकी उपेक्षा हो रही थी। डॉ. सिन्हा ने अथक प्रयास, राजनीतिक सूझबूझ और संगठित आंदोलन के माध्यम से बिहार की अलग पहचान बनाने के लिए संघर्ष किया। उनके प्रयासों का ही परिणाम था कि 22
मार्च 1912 में बिहार को एक अलग प्रांत का दर्जा मिला। इस ऐतिहासिक उपलब्धि ने उन्हें “आधुनिक बिहार का निर्माता” बना दिया।और उस तिथिको ‘ बिहार- दिवस ‘ का दर्जा मिला ।
राजनीतिक जीवन में भी उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय रहा। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाई। वे केंद्रीय विधान परिषद (Imperial Legislative Council) के सदस्य रहे और अपने प्रभावशाली वक्तृत्व तथा तार्किक विचारों से ब्रिटिश शासन की नीतियों का विरोध करते रहे। उनके विचारों में राष्ट्रहित सर्वोपरि था।
स्वतंत्र भारत के निर्माण में भी उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही। जब संविधान सभा का गठन हुआ, तब उन्हें उसका प्रथम अस्थायी अध्यक्ष (Provisional President) चुना गया। 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक की अध्यक्षता कर उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह उनके प्रति राष्ट्र के विश्वास और सम्मान का प्रतीक था।
शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भी डॉ. सिन्हा का योगदान उल्लेखनीय है। वे शिक्षा के प्रसार के प्रबल समर्थक थे और उन्होंने अनेक शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना एवं विकास में योगदान दिया। उनकी लेखनी भी अत्यंत प्रभावशाली थी। वे एक कुशल पत्रकार और विचारक थे, जिन्होंने समाज को जागरूक करने का कार्य किया।


इतना सब होने के बावजूद यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि ऐसे महान विभूति को देश का सर्वोच्च
नागरिक सम्मान ‘भारत-रत्न’ क्यों नहीं मिला। इसके पीछे कई कारण माने जा सकते हैं। पहला, स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय स्तर पर कुछ चुनिंदा नेताओं और व्यक्तित्वों को ही प्राथमिकता दी गई, जबकि कई क्षेत्रीय नायकों का योगदान अपेक्षाकृत कम प्रचारित हुआ। दूसरा, समय के साथ नई पीढ़ी उनके योगदान से अपरिचित होती चली गई, जिससे उनके सम्मान की माँग व्यापक रूप से नहीं उठ सकी। तीसरा, राजनीति में बदलती प्राथमिकताओं और विचारधाराओं के कारण भी कई महान व्यक्तित्व उपेक्षित रह गए।
वास्तव में, डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा का योगदान केवल बिहार तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र, शिक्षा और स्वशासन की जो नींव रखी, वह आज भी प्रासंगिक है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा राष्ट्रसेवक सम्मान या पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मानता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम ऐसे महान व्यक्तित्वों को उचित स्थान दें, उनके जीवन और आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुँचाएँ और उनके योगदान का समुचित मूल्यांकन करें। यदि राष्ट्र उनके कार्यों का पुनर्मूल्यांकन करे और उन्हें ‘भारत-रत्न’ से सम्मानित करने पर विचार करे, तो यह न केवल उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी, बल्कि राष्ट्र की कृतज्ञता का भी प्रतीक बनेगा।
अंततः, डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा का व्यक्तित्व एक दीपस्तंभ की तरह है, जो हमें राष्ट्रनिर्माण, त्याग और समर्पण का मार्ग दिखाता है। उनका जीवन और कृतित्व सदैव प्रेरणा देता रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करता रहेगा।
आज उनका जन्म दिन या पुण्य तिथि नही है मगर उनके ‘
‘ बिहार का तो जन्मदिन है,’ बिहार-दिवस तो मनाई जा रही है।
मगर खेद के साथ कहना पड़ता है कि पूरे पटना शहर को जिस इंसान ने अपना तन,मन,धन सबकुछ दान दे कर बसाया ,उस व्यक्ति के व्यक्तित्व की उपेक्षा कर आज कहीं चर्चा नही,नामो निशान तक कही नही है।
मेरा कहना है कि ‘ जिंदा कौम ही अपने पूर्वजों को याद करता है,
श्रवण कुमार जैसे पुत्र ही अपनेज माता-पिता की इच्छा की पूर्ति करता है। हम सभी उनकी संतान है,हम सभी की एक ही मांग है कि उन्हे मरणोपरांत भी ‘ भारत-रत्न ‘
सम्मान मिलना। चाहिए।

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