साधना शिविर में स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज ने समझाया गुरु-सेवा और गुरु-ऋण का मर्म
साधना शिविर में स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज ने समझाया गुरु-सेवा और गुरु-ऋण का मर्म

समस्तीपुर, 5 अक्टूबर। समस्तीपुर में आयोजित आध्यात्मिक साधना शिविर में सोमवार को जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के सिद्धांतों के प्रचारक स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज ने श्रद्धालुओं को गुरु-तत्व, गुरु-सेवा, गुरु-ऋण तथा भगवद्भक्ति के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराया।
3 से 6 अक्टूबर तक आर.वी. पैलेस, आदर्श नगर गली, समस्तीपुर में आयोजित साधना शिविर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आध्यात्मिक प्रवचन, साधना एवं भक्ति का लाभ उठा रहे हैं।
स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज ने कहा कि भगवान की भक्ति के मार्ग में सद्गुरु जीव को सही दिशा प्रदान करते हैं। गुरु यह समझाते हैं कि भगवान की सेवा और भगवान के भक्तों की सेवा, दोनों ही आध्यात्मिक साधना के महत्वपूर्ण अंग हैं।
उन्होंने कहा कि केवल बाहरी धार्मिक आडंबर पर्याप्त नहीं है। भक्ति का वास्तविक स्वरूप भगवान के प्रति प्रेम, गुरु के प्रति श्रद्धा और भगवद्भक्तों के प्रति सेवा-भाव में प्रकट होता है। सद्गुरु जीव को उसके वास्तविक लक्ष्य—भगवत्प्राप्ति—की ओर ले जाते हैं।
स्वामी जी ने कहा कि गुरु यदि साधक से कोई सेवा लेते हैं तो उसे अपना उपकार या अहसान समझकर अहंकार नहीं करना चाहिए। बल्कि यह समझना चाहिए कि गुरु ने सेवा का अवसर देकर साधक पर कृपा की है।
उन्होंने कहा कि गुरु-सेवा में अहंकार का कोई स्थान नहीं है। सेवा मिलने पर साधक को अपने भीतर कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए और यह अनुभव करना चाहिए कि उसे अपने आध्यात्मिक जीवन को सार्थक करने का अवसर मिला है।

स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज ने कहा कि गुरु द्वारा जीव को प्रदान किए गए आध्यात्मिक ज्ञान और भगवत्प्राप्ति के मार्ग का मूल्य संसार की किसी भी वस्तु से नहीं चुकाया जा सकता।
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपना संपूर्ण संसार भी गुरु को समर्पित कर दे, तब भी गुरु के उपकार का पूर्ण प्रतिदान नहीं किया जा सकता। क्योंकि गुरु केवल सांसारिक वस्तु नहीं देते, बल्कि जीवन के परम लक्ष्य का ज्ञान प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि संसार में किसी व्यक्ति के प्राण बचाना बहुत बड़ा पुण्य माना जाता है, लेकिन सद्गुरु तो जीव को आध्यात्मिक अज्ञान से निकालकर परम सत्य का बोध कराते हैं। इसलिए गुरु का ऋण सामान्य सांसारिक ऋण की तरह चुकाया नहीं जा सकता।
उन्होंने कहा कि जब गुरु की कृपा से जीव को अपने आध्यात्मिक स्वरूप का बोध होने लगता है, तब उसके भीतर संसार के प्रति आसक्ति कम और भगवान के प्रति प्रेम बढ़ने लगता है।
स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज ने बताया कि गुरु के ऋण से पूर्णतः उऋण होना संभव नहीं है। इसलिए साधक को इस ऋण को चुकाने की चिंता करने के बजाय गुरु के बताए मार्ग पर चलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति सच्ची कृतज्ञता केवल शब्दों से व्यक्त नहीं होती। गुरु के उपदेशों को अपने जीवन में उतारना, भगवान का भजन करना, अहंकार और स्वार्थ को कम करना तथा सेवा-भाव विकसित करना ही गुरु के प्रति वास्तविक कृतज्ञता है।
उन्होंने कहा कि गुरु साधक को केवल पूजा-पद्धति नहीं सिखाते, बल्कि जीवन को भगवान के प्रति समर्पित करने की कला सिखाते हैं।
उन्होंने कहा कि समर्पण का अर्थ अपने सांसारिक दायित्वों से भागना नहीं, बल्कि अपने तन, मन, बुद्धि और कर्मों को भगवान की सेवा के योग्य बनाना है। गृहस्थ जीवन जीते हुए भी व्यक्ति अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से कर सकता है।
महाराज जी मार्मिक संदेश देते हुए कहा कि मनुष्य जिस धन, शरीर, बुद्धि, सामर्थ्य और प्रतिभा को अपना मानकर अहंकार करता है, वास्तव में वह सब परमात्मा की ही देन है। इसलिए जीवन में जो कुछ मिला है, उसका उपयोग केवल व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए न करके भगवान की सेवा, समाज के कल्याण और सद्कार्यों में करना चाहिए। यही वास्तविक समर्पण है।
स्वामी जी ने कहा कि गुरु साधक को ऐसा जीवन जीना सिखाते हैं जिसमें व्यक्तिगत सुख से अधिक भगवान का सुख महत्वपूर्ण हो जाता है।
उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक साधना का चरम यही है कि “मेरा सुख क्या है” के स्थान पर साधक यह विचार करे कि “भगवान को किसमें सुख है।” जब मनुष्य का जीवन इस भाव की ओर बढ़ता है, तब भक्ति में गहराई आती है और उसका अहंकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
समन्वय की जीवंत साधना हैं स्वामी युगल शरण जी महाराज
स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज के प्रवचन की विशेषता यह रही कि उन्होंने जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के समन्वय सिद्धांत को सरल और व्यावहारिक भाषा में श्रद्धालुओं के सामने रखा। उन्होंने ज्ञान, भक्ति, गुरु-सेवा, भगवद्भक्ति, कर्म और समर्पण को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ बताते हुए कहा कि आध्यात्मिक जीवन किसी एक पक्ष तक सीमित नहीं है।
साधना शिविर में उपस्थित श्रद्धालुओं ने स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज के भावपूर्ण और सरल व्याख्यान को ध्यानपूर्वक सुना। गुरु के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, समर्पण और भगवान के प्रति निष्काम प्रेम का संदेश श्रद्धालुओं तक पहुंचा। शिविर में भक्ति-साधना एवं आध्यात्मिक जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों पर निरंतर मार्गदर्शन दिया जा रहा है।


