मतदाता पहचान पत्र हाथ में, फिर भी मतदान से वंचित क्यों? लोकतंत्र में मतदाता सूची की जवाबदेही तय हो : बिमल सर्राफ

मतदाता पहचान पत्र हाथ में, फिर भी मतदान से वंचित क्यों? लोकतंत्र में मतदाता सूची की जवाबदेही तय हो : बिमल सर्राफ
जे टी न्यूज ,रक्सौल, पूर्वी चंपारण : लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास है और इस विश्वास की बुनियाद निष्पक्ष, पारदर्शी एवं विश्वसनीय चुनाव व्यवस्था पर टिकी होती है। चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद और विचार व्यक्त करने का संवैधानिक अवसर भी है। ऐसे में यदि किसी योग्य नागरिक के हाथ में मतदाता पहचान पत्र होने के बावजूद मतदाता सूची में नाम नहीं होने के कारण वह अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पाता, तो यह केवल एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि पूरी चुनावी व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल है।

आज मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर देश में व्यापक चर्चा हो रही है। मतदाता सूची को शुद्ध, अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना निश्चित रूप से आवश्यक है। मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, दोहरी प्रविष्टियों को समाप्त करना, स्थानांतरित मतदाताओं का विवरण सुधारना तथा नए योग्य मतदाताओं को सूची में शामिल करना चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि प्रशासनिक गलतियों, दस्तावेजों की कमी अथवा तकनीकी त्रुटियों के कारण कोई वास्तविक मतदाता अपने लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित न हो जाए।

सवाल यह है कि जब किसी नागरिक के पास वर्षों पुराना मतदाता पहचान पत्र है, वह नियमित रूप से मतदान करता रहा है और उसके पास अपनी नागरिक पहचान के प्रमाण भी हैं, तब अचानक मतदाता सूची से उसका नाम गायब कैसे हो जाता है? यदि किसी व्यक्ति का नाम गलती से हट जाता है, तो उसे दोबारा जुड़वाने की जिम्मेदारी और प्रक्रिया इतनी सरल क्यों नहीं होनी चाहिए कि वह बिना अनावश्यक परेशानी के अपना अधिकार वापस पा सके?

मतदाता पहचान पत्र और मतदाता सूची दोनों का अपना महत्व है। पहचान पत्र मतदाता की पहचान का प्रमाण है, जबकि मतदान के लिए संबंधित निर्वाचन क्षेत्र की अंतिम मतदाता सूची में नाम दर्ज होना आवश्यक है। यही कारण है कि केवल पहचान पत्र होना मतदान की गारंटी नहीं बन सकता। इस व्यवस्था में सुधार की जरूरत है, ताकि पहचान पत्रधारी योग्य नागरिकों के नाम सूची से हटने या छूटने की स्थिति में समय रहते उन्हें उचित सूचना, सुनवाई और समाधान मिल सके।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और 1951 तथा मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 में मतदाता सूची तैयार करने, उसमें संशोधन करने और मतदान के अधिकार से जुड़े प्रावधान मौजूद हैं। समय के साथ चुनावी व्यवस्था में अनेक तकनीकी और प्रशासनिक बदलाव हुए हैं। ऐसे में आवश्यकता है कि इन कानूनों और प्रक्रियाओं की व्यावहारिक समीक्षा की जाए। यदि कहीं कानूनी अस्पष्टता, प्रक्रिया की जटिलता या नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में कमी दिखाई देती है, तो आवश्यक संशोधन पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।

चुनाव सुधार का उद्देश्य केवल मतदाता सूची से गलत नाम हटाना नहीं, बल्कि प्रत्येक योग्य मतदाता का नाम सुरक्षित रखना भी होना चाहिए। इसके लिए कुछ ठोस कदम जरूरी हैं। मतदाता सूची से नाम हटाने से पहले संबंधित व्यक्ति को उचित सूचना दी जाए। उसे अपनी बात रखने और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर मिले। नाम हटाने या आवेदन अस्वीकार करने का स्पष्ट कारण बताया जाए। शिकायतों के त्वरित निपटारे के लिए पारदर्शी व्यवस्था बने और मतदाता सूची का ऑनलाइन सत्यापन सरल एवं सुलभ हो।

विशेष रूप से बुजुर्गों, दिव्यांगजनों, महिलाओं, गरीब परिवारों, प्रवासी मजदूरों और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों के लिए प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाना आवश्यक है। हर व्यक्ति के पास डिजिटल साधन, इंटरनेट या सरकारी कार्यालयों तक पहुंच उपलब्ध नहीं होती। इसलिए तकनीक के साथ मानवीय संवेदना और स्थानीय स्तर पर सहायता की व्यवस्था भी होनी चाहिए।

यह भी ध्यान रखना होगा कि मतदाता सूची की शुद्धता और मतदाता के अधिकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। फर्जी मतदान रोकना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी वास्तविक मतदाता को मतदान से वंचित होने से बचाना है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता केवल गलत नाम हटाने से नहीं, बल्कि सही नाम सुरक्षित रखने और हर शिकायत का न्यायपूर्ण समाधान करने से भी प्रमाणित होती है।

राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है कि वे इस विषय को केवल सत्ता और विपक्ष के विवाद तक सीमित न रखें। मतदाता सूची का प्रश्न किसी एक दल, जाति, वर्ग या क्षेत्र का नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा है। इस विषय पर आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तथ्य, संवाद और सुधार की भावना से काम होना चाहिए।

अंततः लोकतंत्र की सुंदरता केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि प्रत्येक योग्य नागरिक को बिना भय, भेदभाव और अनावश्यक बाधा के मतदान का अवसर देने में है। मतदाता का नाम सूची में होना उसकी लोकतांत्रिक भागीदारी की पहली शर्त है। इसलिए समय की मांग है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक हितैषी बनाया जाए तथा जनप्रतिनिधित्व कानून में आवश्यक सुधारों पर गंभीर पहल हो।

क्योंकि लोकतंत्र में सरकार बनाने का अधिकार जनता के पास है, तो उस अधिकार को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी चुनाव व्यवस्था की है। मतदाता की पहचान का सम्मान और उसके मताधिकार की सुरक्षा ही निष्पक्ष लोकतंत्र की असली पहचान है।

उक्त विश्लेषण लायंस क्लब इंटरनेशनल, डिस्ट्रिक्ट 322ई,जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।

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