विपक्ष को दुश्मन समझना लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी — हृदयानंद मिश्र, अधिवक्ता

विपक्ष को दुश्मन समझना लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी
— हृदयानंद मिश्र, अधिवक्ता

जे टी न्यूज, पटना: भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि असहमति को सम्मान देने की परंपरा में रही है। कभी सत्ता और विपक्ष के बीच वैचारिक संघर्ष बेहद तीखा होता था, लेकिन राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को व्यक्तिगत शत्रु समझने की प्रवृत्ति आज जितनी दिखाई देती है, वह लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक मतभेद जगजाहिर थे। फिर भी 1971 की भारत की विजय पर अटल जी ने संसद में इंदिरा गांधी के नेतृत्व की प्रशंसा की। आपातकाल जैसी कड़वी राजनीतिक स्मृतियों के बावजूद व्यक्तिगत सम्मान की परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। बाद में नरसिम्हा राव सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के महत्वपूर्ण मंच पर देश का पक्ष रखने के लिए विपक्ष के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा। यह उस दौर की राजनीतिक परिपक्वता का उदाहरण था।


आज सवाल है—क्या हमारी राजनीति ने उस परंपरा को खो दिया है?
2014 के बाद भाजपा के नेतृत्व में केंद्र की राजनीति में सत्ता का अभूतपूर्व केंद्रीकरण दिखाई देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को मजबूत जनादेश मिला है और सरकार को शासन करने का पूरा अधिकार है। लेकिन जनादेश का अर्थ यह नहीं हो सकता कि विपक्ष की आवाज कमजोर कर दी जाए या असहमति को राजनीतिक अपराध की तरह देखा जाए।
विपक्षी नेताओं पर केंद्रीय जांच एजेंसियों की लगातार कार्रवाई, संसद में विपक्षी सांसदों के निलंबन, विरोध-प्रदर्शनों पर पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक भाषणों में बढ़ती कटुता ने इस धारणा को मजबूत किया है कि आज सत्ता और विपक्ष के बीच लोकतांत्रिक संवाद की जगह टकराव बढ़ रहा है।
सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है। संसद में जवाब मांगना राष्ट्र-विरोध नहीं है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र का अधिकार है। सरकार की आलोचना देश की आलोचना नहीं हो सकती।
दुर्भाग्य से आज राजनीतिक विमर्श में असहमति को कई बार राष्ट्र-विरोध, विकास-विरोध या सत्ता-विरोध के रूप में पेश करने की कोशिश होती है। सत्ता पक्ष के नेताओं की भाषा में व्यक्तिगत कटाक्ष और विपक्ष के प्रति तीखे हमले लोकतांत्रिक मर्यादा को कमजोर करते हैं। भाजपा जैसी बड़ी राजनीतिक पार्टी से तो अपेक्षा और भी अधिक है कि वह अपनी विशाल राजनीतिक शक्ति के साथ उतनी ही बड़ी लोकतांत्रिक उदारता भी दिखाए।
लेकिन जिम्मेदारी केवल सत्ता पक्ष की नहीं है। विपक्ष को भी संसद की गरिमा बनाए रखते हुए तथ्य, तर्क और वैकल्पिक नीतियों के साथ सरकार को चुनौती देनी चाहिए। लोकतंत्र में मजबूत सरकार के साथ मजबूत विपक्ष भी जरूरी है।
बहुमत सरकार बनाने का अधिकार देता है, लोकतंत्र पर एकाधिकार का नहीं।
आज जरूरत है कि भाजपा सरकार यह समझे कि आलोचक लोकतंत्र के दुश्मन नहीं, बल्कि सत्ता को जवाबदेह रखने वाले प्रहरी हैं। जांच एजेंसियों की कार्रवाई हो या संसद में राजनीतिक टकराव—हर कदम ऐसा होना चाहिए जिससे निष्पक्षता और संस्थागत स्वतंत्रता पर जनता का विश्वास मजबूत हो, कमजोर नहीं।


राजनीति में विजय महत्वपूर्ण है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्कार उससे भी महत्वपूर्ण हैं। चुनाव पांच वर्ष बाद फिर आते हैं, मगर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़ा अविश्वास लंबे समय तक बना रहता है।
भारत ने नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह जैसे नेताओं के दौर में सत्ता और विपक्ष के बीच तीखे मतभेदों के बावजूद संवाद की परंपरा देखी है। आज उसी परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
सरकार मजबूत हो, लेकिन निरंकुश नहीं। विपक्ष मुखर हो, लेकिन जिम्मेदार। संसद में बहस हो, बदले की राजनीति नहीं। चुनाव में संघर्ष हो, व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं।


लोकतंत्र में सरकार को पांच साल के लिए सत्ता मिलती है, लोकतंत्र का मालिक बनने का अधिकार नहीं।
यही बात सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों को याद रखनी होगी। क्योंकि लोकतंत्र किसी एक दल की संपत्ति नहीं, बल्कि एक सौ चालीस
करोड़ से अधिक भारतीयों की साझा संवैधानिक विरासत है।
लेखक हृदयानंद मिश्र, एडवोकेट एवं स्तंभकार।

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