आधुनिकता के दौर में लोक कलाओं के संरक्षण के लिए युवाओं को इससे जोड़ना आवश्यक – डॉ. काव्या, जी.के.पी.डी. महाविद्यालय, कर्पूरी ग्राम में “जीवन में लोक कला का महत्व” विषय पर संगोष्ठी आयोजित
आधुनिकता के दौर में लोक कलाओं के संरक्षण के लिए युवाओं को इससे जोड़ना आवश्यक – डॉ. काव्या, जी.के.पी.डी. महाविद्यालय, कर्पूरी ग्राम में “जीवन में लोक कला का महत्व” विषय पर संगोष्ठी आयोजित

समस्तीपुर। भारतरत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर के जन्म स्थली पर अवस्थित जी.के.पी.डी. महाविद्यालय, कर्पूरी ग्राम में “जीवन में लोक कला का महत्व” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें लोक कला को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने तथा इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सामूहिक प्रयास पर जोर दिया गया। कार्यक्रम का दीप प्रज्वलित कर उद्घाटन महाविद्यालय शासी निकाय के के सचिव डॉ.अनीसुर रहमान ने किया, जबकि शासी निकाय की अध्यक्ष नमिता कुमारी ने अतिथियों का स्वागत किया। संगोष्ठी में लोक कला के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक महत्व पर विस्तार से चर्चा हुई।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि विभागाध्यक्ष, संगीत एवं नाट्य विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा प्रो. (डॉ.) लावण्या कृति सिंह ‘काव्या’, ने कहा कि लोक कला किसी भी समाज की संस्कृति और परंपरा की पहचान होती है। लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाट्य और पारंपरिक कलाओं में आम जनजीवन की भावनाएं, संस्कार और सामाजिक सरोकार अभिव्यक्त होते हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिकता के दौर में लोक कलाओं के संरक्षण के लिए युवाओं को इससे जोड़ना आवश्यक है।
विशिष्ट अतिथि विश्वविद्यालय कार्यक्रम समन्वयक, एनएसएस डॉ. आर.एन. चौरसिया, ने कहा कि लोक कला मनोरंजन के साथ सामाजिक जागरूकता और एकता का भी सशक्त माध्यम है। शैक्षणिक संस्थानों में लोक कला आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देकर विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति और परंपरा से जोड़ा जा सकता है।

वही प्रधानाचार्य, एमआरएम. कॉलेज, दरभंगा प्रो. (डॉ.) पुष्पम नारायण, ने लोक कला को शिक्षा से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से परिचित कराने में महाविद्यालयों की महत्वपूर्ण भूमिका है। एनएसएस कार्यक्रम पदाधिकारी, डॉ. अनुपम प्रिया ने कहा कि लोक कला के माध्यम से सामाजिक संदेशों को सहज और प्रभावी तरीके से लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। इस दौरान रिटायर्ड सब-इंस्पेक्टर, उमाशंकर पासवान, नोडल पदाधिकारी, एनएसएस डॉ. लक्ष्मण यादव, ने लोक कला के सामाजिक सरोकारों और इसके संरक्षण व संवर्धन पर प्रकाश डाला। सागर सिंह ने कार्यक्रम का संचालन किया।
इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि, बदलते सामाजिक परिवेश और आधुनिक जीवनशैली के कारण कई पारंपरिक लोक कलाएं धीरे-धीरे सीमित होती जा रही हैं। ऐसे में स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन, युवाओं को प्रशिक्षण तथा विद्यालय-महाविद्यालयों में लोक कला से जुड़ी गतिविधियों का आयोजन समय की आवश्यकता है। इससे सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ कलाकारों को भी उचित पहचान और मंच मिल सकेगा। युवा कला आश्रम के लक्ष्मण कुमार के टीम द्वारा अनेकों लोक कला पर नृत्य का प्रस्तुति दी गई एवं सुश्री कोमल ने अपने सहयोगियों के साथ कला का प्र
दर्शन किया।
मौके पर प्राचार्य प्रो. राम प्रवेश ठाकुर, डॉ. स्नेहा, नित्यानंद ठाकुर, प्रो. दिनेश प्रसाद, प्रो. बसंत कुमार, प्रो. प्रमोद कुमार पासवान, प्रो. सत्य नारायण ठाकुर, प्रो. विमल कुमार चौबे, बनारसी ठाकुर, प्रो. विजय कुमार यादव, प्रो. ममता कुमारी, प्रो. एन.के. सिंह, प्रो. पुष्पा कुमारी, प्रो. शशि कुमारी बृजमोहन सारस्वत, प्रो. कुमार समर्पण प्रो. हरि प्रसाद राय सहित अनेक शिक्षाविद, गण्यमान्य शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचारी तथा छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। धन्यवाद ज्ञापन संगीत विभागाध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमारी ने किया।



