साधना शिविर में स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज ने समझाया संसार की नश्वरता का मर्म
साधना शिविर में स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज ने समझाया संसार की नश्वरता का मर्म
समस्तीपुर, 4 अक्टूबर। समस्तीपुर में आयोजित आध्यात्मिक साधना शिविर में जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के प्रचारक स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संसार की नश्वरता, सांसारिक मोह तथा मानव जीवन की क्षणभंगुरता का मर्म समझाते हुए भक्ति और आत्मचिंतन का संदेश दिया। 3 से 6 अक्टूबर तक आर.वी. पैलेस, आदर्श नगर गली, समस्तीपुर में आयोजित इस साधना शिविर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आध्यात्मिक प्रवचन और साधना का लाभ उठा रहे हैं।
प्रवचन के दौरान स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज ने जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के प्रसिद्ध पद—“यह जग सेमर का फूल रे…” का भावार्थ करते हुए कहा कि संसार बाहर से जितना आकर्षक दिखाई देता है, उसकी वास्तविकता उतनी ही क्षणभंगुर है। मनुष्य धन, सुख-सुविधा, परिवार और विषय-वासनाओं में स्थायी सुख तलाशता रहता है, जबकि संसार की प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है।

उन्होंने पद की व्याख्या करते हुए कहा कि सेमर का फूल देखने में अत्यंत सुंदर और आकर्षक होता है, लेकिन उसका स्वरूप स्थायी नहीं होता। इसी प्रकार संसार की चमक-दमक मनुष्य को आकर्षित करती है, लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल जाता है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सेमर के फल को देखकर तोता उसमें भोजन की आशा से चोंच मारता है, लेकिन भीतर केवल रूई पाकर अपनी भूल समझता है, उसी प्रकार मनुष्य भी सांसारिक पदार्थों में सुख की तलाश करता है और अंततः उसे निराशा का अनुभव होता है।
स्वामी जी ने कहा कि विषय-वासनाओं में आसक्त मनुष्य बार-बार दुःख और निराशा का अनुभव करने के बावजूद मोह-माया के आकर्षण से मुक्त नहीं हो पाता। आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य अपने जीवन में आत्मचिंतन करे और यह समझे कि वास्तविक सुख बाहरी भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि ईश्वर की भक्ति और आंतरिक शांति में निहित है।
मानव जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि नदी के किनारे खड़ा वृक्ष जिस प्रकार जल के कटाव से कभी भी गिर सकता है, उसी प्रकार मानव जीवन भी अनिश्चित और क्षणभंगुर है। मृत्यु निश्चित है, लेकिन उसका समय निश्चित नहीं है। इसलिए जीवन रहते ही मनुष्य को अपने वास्तविक उद्देश्य को पहचानकर ईश्वर की भक्ति और साधना की ओर उन्मुख होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पुत्र, परिवार, धन और अन्य सांसारिक संबंध जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन इन्हें स्थायी सहारा मानकर उनमें अत्यधिक मोह और अहंकार करना उचित नहीं है। मनुष्य को अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों का पूरी निष्ठा से निर्वहन करते हुए भी अपने मन को परमात्मा की भक्ति से जोड़े रखना चाहिए।
साधना के मूल संदेश को स्पष्ट करते हुए स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज ने कहा कि संसार की नश्वरता को समझना ही वैराग्य का आधार है और मन को श्रीहरि की भक्ति के अनुकूल बनाना ही जीवन की सार्थकता है। स्थायी आनंद सांसारिक पदार्थों में नहीं, बल्कि भगवान के प्रेम, भक्ति और स्मरण में प्राप्त होता है।

उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता का अर्थ संसार से भाग जाना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए उसके वास्तविक स्वरूप को समझना है। मनुष्य अपने परिवार और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी अपने मन को भगवान के चरणों में समर्पित कर सकता है। यही संतुलित आध्यात्मिक जीवन का मार्ग है।
साधना शिविर में श्रद्धालुओं ने प्रवचन के साथ भक्ति-साधना में भी सहभागिता की। शिविर के दौरान भक्ति, साधना, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों पर स्वामी डॉ. युगल शरण जी महाराज द्वारा मार्गदर्शन दिया जा रहा है।
