संत पॉल टीचर्स’ ट्रेनिंग कॉलेज में दो दिवसीय भारतीय सांस्कृतिक महोत्सव का भव्य शुभारंभ
झिझिया, जट-जटिन, लोकनृत्य और छठ पर्व की प्रस्तुतियों से जीवंत हुई भारतीय लोकसंस्कृति; प्रशिक्षुओं ने गीत-संगीत और नृत्य से बांधा समां
संत पॉल टीचर्स’ ट्रेनिंग कॉलेज में दो दिवसीय भारतीय सांस्कृतिक महोत्सव का भव्य शुभारंभ
झिझिया, जट-जटिन, लोकनृत्य और छठ पर्व की प्रस्तुतियों से जीवंत हुई भारतीय लोकसंस्कृति; प्रशिक्षुओं ने गीत-संगीत और नृत्य से बांधा समां

जे टी न्यूज,
वीरसिंहपुर। स्वायत्त एवं नैक बी++ ग्रेड प्राप्त संत पॉल टीचर्स’ ट्रेनिंग कॉलेज, वीरसिंहपुर में बुधवार को सांस्कृतिक समिति के तत्वावधान में दो दिवसीय ‘भारतीय सांस्कृतिक महोत्सव’ का भव्य शुभारंभ हुआ। झिझिया, जट-जटिन, लोकनृत्य और छठ पर्व के मंचन पर केंद्रित इस महोत्सव का उद्घाटन दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य भावी शिक्षकों को भारतीय लोकसंस्कृति, परंपराओं और समृद्ध कलात्मक विरासत से जोड़ना तथा इनके संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति जागरूक करना है।
कार्यक्रम की शुरुआत संगीत के सहायक प्राध्यापक रोहित कुमार द्वारा प्रस्तुत गणेश वंदना से हुई। सांस्कृतिक समिति की समन्वयक डॉ. प्रतिभा राय ने स्वागत संबोधन में कहा कि ऐसे आयोजन प्रशिक्षुओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ लोकपरंपराओं के महत्व को समझने का अवसर प्रदान करते हैं। बीएड प्रशिक्षु अभिषेक कुमार ने मंच संचालन किया।
महोत्सव के प्रथम दिन प्रशिक्षुओं ने गीत-संगीत और नृत्य की आकर्षक प्रस्तुतियों से दर्शकों का मन मोह लिया। प्रीति कुमारी, अर्पिता, शैलवी, खुशबू, खुशी एवं अंजलि की सामूहिक नृत्य प्रस्तुति विशेष आकर्षण का केंद्र रही। अस्मिता ने झूमर नृत्य प्रस्तुत कर लोकसंस्कृति की छटा बिखेरी। मनीष कुमार ने गायन प्रस्तुत किया, जबकि प्रशिक्षु मणिकांत ने ‘ओ साथी रे’ गीत के माध्यम से खूब तालियां बटोरीं। चांदनी, आकाश सहित अन्य प्रशिक्षुओं ने भी अपनी सांस्कृतिक प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया।

इन प्रस्तुतियों को सफल बनाने में सहायक प्राध्यापक नरेन्द्र कुमार एवं रोहित कुमार का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने पिछले कई दिनों से प्रशिक्षुओं को नियमित अभ्यास कराया था।
कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कॉलेज की प्राचार्या डॉ. रोली द्विवेदी ने कहा कि लोककलाएं भारतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान और परंपरागत विरासत की संवाहक हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध करने और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पहचानने में ऐसे आयोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षक-शिक्षा में सांस्कृतिक गतिविधियों का समावेश प्रशिक्षुओं में रचनात्मकता, आत्मविश्वास, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक चेतना का विकास करता है। उन्होंने भावी शिक्षकों से लोकपरंपराओं के संरक्षण और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।




