भारतीय सांस्कृतिक महोत्सव का भव्य समापन, छठ पर्व की पारंपरिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन
लोकगीत, लोकनृत्य और छठ के पारंपरिक अनुष्ठानों के मंचन से जीवंत हुई बिहार की सांस्कृतिक विरासत
भारतीय सांस्कृतिक महोत्सव का भव्य समापन, छठ पर्व की पारंपरिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन
लोकगीत, लोकनृत्य और छठ के पारंपरिक अनुष्ठानों के मंचन से जीवंत हुई बिहार की सांस्कृतिक विरासत
प्रशिक्षुओं ने अपनी प्रस्तुतियों से बांधा समां

जे टी न्यूज,
वीरसिंहपुर: स्वायत्त एवं नैक बी++ ग्रेड प्राप्त संत पॉल टीचर्स’ ट्रेनिंग कॉलेज, वीरसिंहपुर में सांस्कृतिक समिति के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय भारतीय सांस्कृतिक महोत्सव का भव्य समापन हुआ। समापन दिवस पर लोकगीत, संगीत और छठ महापर्व के पारंपरिक अनुष्ठानों की आकर्षक प्रस्तुतियों ने दर्शकों का मन मोह लिया। प्रशिक्षुओं ने अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से बिहार की समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपराओं को मंच पर जीवंत कर दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत लोकगीत एवं संगीत प्रस्तुतियों से हुई। सपना कुमारी ने ‘रंगीलो म्हारो ढोलना’ गीत प्रस्तुत कर दर्शकों का मनोरंजन किया। वहीं, अस्मिता ने ‘पटना के घाट पर बाजे बजनवा’ और चांदनी ने कजरी की प्रस्तुति से लोकसंगीत की मधुर छटा बिखेरी।
महोत्सव का मुख्य आकर्षण छठ पूजा के विभिन्न अनुष्ठानों का मंचन रहा। प्रशिक्षुओं ने गंगा स्नान, खरना, छठ घाट की तैयारी, संध्या अर्घ्य और प्रातःकालीन अर्घ्य की पारंपरिक प्रक्रियाओं को सामूहिक रूप से प्रस्तुत किया। बीएड एवं डीएलएड प्रशिक्षुओं ने पारंपरिक वेशभूषा, पूजन सामग्री और लोकाचार के माध्यम से छठ महापर्व की आस्था, पवित्रता और सामाजिक सहभागिता को मंच पर साकार किया। डीएलएड प्रशिक्षुओं की टीम ने आयोजन की व्यवस्थाओं में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
इस अवसर पर प्राचार्या डॉ. रोली द्विवेदी ने कहा कि छठ महापर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, अनुशासन, स्वच्छता, त्याग, तपस्या और सामूहिक एकजुटता का अनुपम संदेश भी देता है। हमारी लोकसंस्कृति में ऐसे जीवन मूल्य निहित हैं, जो व्यक्ति को संवेदनशील, जिम्मेदार और समाज के प्रति प्रतिबद्ध बनाते हैं।

उन्होंने कहा कि शिक्षक-शिक्षा का उद्देश्य केवल विषयगत ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि ऐसे भावी शिक्षकों का निर्माण करना भी है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें और आने वाली पीढ़ियों में मानवीय मूल्यों एवं सांस्कृतिक चेतना का संचार कर सकें। इस प्रकार के आयोजन प्रशिक्षुओं को अपनी विरासत को जानने, समझने और रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से संरक्षित करने का अवसर प्रदान करते हैं। संस्कृति और शिक्षा का समन्वय ही जागरूक, संस्कारित एवं समावेशी समाज के निर्माण का आधार है।
